Sun. Oct 21st, 2018

बेशर्मी की भी हद है, खुले आम सौदा हो रहा है किस मंत्रालय में कितना पैसा : सुरभि






सुरभि, बिराटनगर | कुछ दिनों पूर्व जब मैंने एक व्यंग्य (भाई व्यंग्य को पचाने की तो ताकत रखिए नहीं तो हाजमोला प्रयोग कीजिए ) लिखा था कि मुझे अब इस देश पर और इस देश के नागरिक होने पर गर्व है क्योंकि यही एक ऐसा देश है जहाँ जनता के लिए यहाँ की सत्ता एक नहीं होती लेकिन अपने स्वार्थ के लिए इनके पास सारी सहमति भी होती है और बहुमत भी । वैसे मुझे यह आइना दिखाने के लिए काफी गालियाँ भी मिली । पर गालियाँ इसलिए नहीं मिली थी कि मैंने देश की वास्तविकता लिखा था गालियाँ इसलिए मिली थी कि मैंने इन्हें आइना दिखाने के लिए जिस माध्यम भाषा को अपनाया था वह हिन्दी है । इन्हें इस भाषा में सच देखने में थोड़ी कठिनाई महसूस होती है पर आज मैं फिर इसी भाषा का प्रयोग कर रही हूँ जिसे प्रयोग करने पर मुझे गाली देते हुए भारत जाने के लिए कहा गया । कई गालियाँ मुझे विराटनगर से मिली हिन्दी में लिखने के कारण । औरों को तो नहीं पर मैं बिराटनगर की हूँ इसलिए बस इनसे यही कहना है कि जरा अपनी रसोई और कपड़ों पर ध्यान दो मुझे पक्का यकीन है कि उस पर जोगबनी की मोहर लगी होगी । तो तुम्हें अगर भारत का खाने और पहनने में और रोज भारत जाकर रोजमर्रा का सामान लाने में तकलीफ नहीं है तो मैंने हिन्दी में लिख दिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा तुम्हारी राष्ट्रीयता पर कि मुझे भारत जाने की सलाह देने लगे ? अरे मेरे भाई कुछ कहने से पहले अपने गिरेबान में झाँक कर देखो जरुर । खैर, आज फिर मैं उसी भाषा के साथ आप पाठको के समक्ष हूँ ।
हमारे यहाँ एक कहावत है मिल बाँट खाएँ, राजा घर जाएँ । अक्सर माँ अपने बच्चों को यह बात कह कर बहलाया करती है । हमारे देश में यह कहावत सत्ता के लिए ही नहीं हर निकाय के लिए बहुत ही उपयुक्त है । अभी सत्ता में मिल बाँटकर खाने की ऐसी लड़ाई जारी है जिसकी वजह से डेढ महीने गुजरने के बाद भी मंत्रालय का बँटवारा नहीं हो पा रहा है । यहाँ मिलबाँट कर खाने की बात तो है, पर राजा घर नहीं बल्कि बैंक बैलेंस बढाने की बात जरुर है । बेशर्मी की भी हद होती है । खुले आम सौदा हो रहा है । किस मंत्रालय में कितना पैसा है और कहाँ खाने को ज्यादा मिलेगा बर उसे ही पाने की कसरत जारी है और बेचारे हमारे प्रधानमंत्री के पसीने छूट रहे हैं । कभी पास तो कभी दूर कभी खुशी तो कभी गम इसी उलझन में उनका समय व्यतीत हो रहा है ।


रातों की नींद उनकी गायब हो रही होगी । कभी साथी छूटते नजर आ रहे होंगे तो कभी कुर्सी हाथ से खिसकती नजर आ रही होगी । इधर माओवादी का आक्षेप और एकीकरण होने के भय ने तो उनकी जान ही साँसत में डाला होगा । पर घबराइए नहीं यह स्थिति तो इस देश में हर प्रधानमंत्री की होती रही है क्योंकि कुर्सी तक पहुँचने के लिए जो रास्ता अपना रहे हैं सभी मुख्य दल, उनकी राहों की परेशानी लगभग एक सी ही है । सबको हर पल यही चिन्ता सताती रही होगी कि कल की सुबह वो अपनी कुर्सी पर विराजेंगे या नहीं । और इसी जद्दोजहद में उनका सीमित कार्यकाल भी खत्म होता रहा है । आज भी सभी अपनी अपनी गोटी फिट करने में लगे हुए हैं । बहती गंगा में हाथ धोने के लिए सभी तैयार हैं फिर यह सुअवसर मिले या न मिले । पर यकीन मानिए आप नेताओं का भविष्य सुरक्षित है क्योंकि ज्यादा तादाद तो आपकी है नहीं (वास्तविकता तो आपको भी पता है) और जितने हैं उन सबके लिए आलरेडी मंत्रालय हैं सरकार किसी की भी हो सुख तो आप सबको मिलेगा ही और अगर खुदा ना खास्ते मंत्रालय की कमी हो गई तो भी चिन्ता मत कीजिए क्योंकि एक मंत्रालय को कई मंत्रालय में विभक्त कर कई मंत्रालयों को जन्म देने की शक्ति में हमारे प्रतिनिधियों को महारथ हासिल है आपकी सत्ता सुख का पूरा प्रबन्ध विगत में किया जाता रहा है और आगे भी इसकी निरन्तरता जारी रहेगी खुदा कसम । ओली जी ने तो उदाहरण ही पेश कर दिया था । बस राह तैयार है और वर्तमान सरकार भी उसी राह को अपनाने के लिए तैयार है । पर एक अफसोस तो है कि ओली जी ने इतने मंत्रालयों और उपप्रधानमंत्रियों को जन्म दिया फिर भी मनमर्जी के हिसाब से सत्ता का सुख भोग नहीं पाए । फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है । लगे रहिए जनता को कुछ हासिल हो या नही. आपको जरुर मिलेगा । आमीन । (व्यंग्य)

 

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