Thu. Nov 15th, 2018

भविष्य की सोच का फिल्मकार बिमल रॉय

कुछ अपनी कहानी छोड़ जा…कुछ तो निशानी छोड़ जा….

                             कौन कहे फिर इस ओर तू….. आये न आये।

आठ जनवरी 1965 को वो जो गए तो फिर आये ही नहीं। बस उनकी यादें हैं, जो अक्सर आती रहती हैं। ख़ासकर तब जब समाज के लाचार आदमी की आवाज़ बनना हो, तब  जब प्रेम के सौंदर्य में सिर्फ़ सम्बोधन नहीं भावनाओं के शालीन चुप्पी भी और तब भी जब सिर पर बॉक्स ऑफ़िस कमाई का बुखार नहीं सामाजिक सारोकार को निभाने की ज़िम्मेदारी हो।

उन्हें पैसे मिलते। फिल्म से कमाई होती  तो वह सपने देखने लगते कि अगली फिल्म की कहानी क्या होगी। अपने ठौर-ठिकाने की तलाश की जगह वह कहानियां टटोलने में लग जाते। उनकी कहानियों में जोर-जोर से बजने वाले लाउडस्पीकर नहीं थे। चकाचौंध भी नहीं थी लेकिन फिर भी उस दौर की ग्लैमरस अभिनेत्रियां हर हाल में अपनी क्रेडिट लिस्ट में इस जादूगर फिल्मकार का नाम जोड़ लेना चाहती थीं। मधुबाला से लेकर वहीदा रहमान और शर्मिला टैगोर जैसी हसीन अभिनेत्रियां इस बात का ग़म खाती थीं कि कभी उन्हें इस शख्यिसत के कैमरे के सामने अपना रुआब दिखाने का मौका नहीं मिला। वर्तमान दौर में जहां निर्देशक मतलबी सोच के नीचे इतने दब जाते हैं कि उन्हें अपने मुनाफे के अलावा कुछ नहीं दिखता। सेल्फी में प्यार दर्शाने वाले, ट्विटर पर 140 वर्ड्स में अपने सारे इमोशंस की नुमाईश करने वाले उस दौर की मोहब्बत और सोहबत के ख़ुमार को क्या समझेंगे, कि जब भी इस शख्स को  नये मौके मिले, वह अपने शार्गिदों को साथ लेकर बढ़ना नहीं भूले। चूंकि वह दौर सेल्फी नहीं संवेदनाओं का था और उसी दौर में ऐसे शख़्स ने जिसने जन्म लिया।

जमीं पर पैर रखा तो जमींदारों की धरती पर। मगर ठाठ-बाट से रहने और अकड़ कर चलने की बजाय दिल से हमेशा आह निकली उन निचले वर्ग के किसानों, मजदूरों के लिए। ताउम्र खड़े रहे अपने सिनेमाई आंदोलन के साथ। तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद हाथ में कैमरा मिला तो रौंधा और झकझोरा उन मठाधीशों को ही, जो शोषण करना अपनी शान समझते थे। वह जब भी बोले कैमरे से बोले। शायद ही किसी ने परिकल्पना भी की होगी कि अपनी फिल्मों से बिना भाषणबाजी, लाग-लपेट करने वाला वह शख्स असल में मैन आॅफ फ्यू वर्ड्स है। तभी तो दिलीप कुमार जैसे सुपरस्टार, जिन्हें संभालना उस दौर में किसी निर्देशक के हाथों में नहीं थी, लेकिन उनके लिए भी इस शख्स की बोलीं-बातें पत्थर की लकीर हो जाया करती थी। उनका सिनेमा सालों में नहीं, दशकों में याद किया जाता रहेगा। बंदिनी, सुजाता, मधुमती, देवदास, दो बीघा जमीन जैसी फिल्मों को बनाने वाले ये उस दिग्गज फिल्मकार की कहानी है , जिसे हम साइलेंट डायरेक्टर ऑफ़ इंडियन सिनेमा कह सकते हैं। नाम है बिमल रॉय।

आठ जनवरी यानि सोमवार को बिमल रॉय की 52वीं पुण्यतिथि है। साल 1909 में बांग्लादेश के ढाका में जन्में हिंदीं सिनेमा के इस बेहतरीन फिल्मकार ने सिनेमा को जो सौगात दी है, वो कभी भुलाये से भी नहीं भूली जा सकती। बिमल रॉय की 52वीं पुण्यतिथि पर उनकी बेटी रिंकी भट्टाचार्य से हुई बातचीत और बिमल रॉय  पर लिखी किताबों के माध्यम से उनकी फिल्मों और जीवन से जुड़े कुछ किस्सों की अनसुने किस्सों की जानकारी मिली है , जिसे इस लेख के जरिये हम आप तक पहुंचा रहे हैं।

जमींदार परिवार में पहला कदम, मगर दिल में बसा रहा शंभू महतो

जब 1953 में फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ आयी, तो उस वक्त शायद ही लोगों के ध्यान में यह बात आयी होगी कि एक ऐसा निर्देशक, जिसका जन्म जमींदारों के खानदान में हुआ, वह दिल से दर्द तो शंभू महतो का महसूस करता है, जो मात्र 300 रूपये का कर चुकाने के लिए ताउम्र लड़ता रहा। दरअसल, यह बिमल रॉय सिनेमा की खासियत रही कि उनकी फिल्में हुक्मरानों के हमेशा विपरीत ही खड़ी रहीं। रिंकी भट्टाचार्य कहती हैं ” बिमल दा ने बचपन से अपने आसपास के जो हालात देखे, उन्होंने उस दौर में मजदूरों का कष्ट को देखा। महसूस किया। किसानों का शोषण होते देखा। वो विजनरी थे। उनके ज़हन में कहीं न कहीं वो बातें रह गयी होंगी। यही वजह है कि उन्होंने हमेशा अपनी फिल्मों में जमींदारों को या तो नेगेटिव या ग्रे शेड में दिखाया। गौर करें तो ‘देवदास’ में देव के पिता की वह अकड़, वह रुआब जो निचले वर्ग की पारो को देख कर आता है। परख फिल्म में भी जमींदार की वह कहानी। ‘बिराज बहू’ का जमींदार किरदार उनकी इसी सोच का कमाल था। यहां तक कि मधुमती में भी जमींदार को लेकर उन्होंने वही अप्रोच रखा था।”

… और निरुपा रॉय फिर से जी उठीं

रिंकी भट्टाचार्य , दो बीघा जमीन की कहानी से जुड़ी एक रोचक कहानी सुनती हैं। बताती हैं कि इस फिल्म का क्लाइमेक्स दो बार बदला गया। वह भी रिलीज के बाद। यह वह दौर था जब सिनेमा देख कर दर्शक थियेटर से बाहर आते तो उनकी आंखें नम हुआ करती थीं। दो बीघा जमीन का यह प्रभाव रहा कि निरुपा राय के किरदार की मृत्यु दिखाई गयी तो लोगों ने रोना शुरू कर दिया। थियेटर से बाहर लोगों में अलग ही दुख था। वह इस अंत को सह नहीं पा रहे थे। रिंकी का मानना है कि इस फिल्म में शंभू महतो को पूरी फिल्म में संघर्षरत ही दिखाया गया लेकिन चूंकि भारतीय जनता अपने संघर्षरत हीरो को हमेशा विजयी देखना चाहती थी। इसलिए सब दुखी थे । तब ऋषिकेश मुखर्जी ने बिमल रॉय को फोन पर कहा कि दर्शक इस अंत को नहीं ले पा रहे हैं। अंत बदलना ही होगा। तब जाकर बिमल रॉय ने इसका अंत कुछ और सोचा और निरुपा राय और बलराज सहानी को मिलते हुए दिखाया।

दिलीप कुमार को संभालना हर किसी के बस की बात नहीं थी रिंकी भट्टाचार्य की स्वीकारती हैं कि उस दौर में बिमल रॉय ही उन निर्देशकों में से एक रहे, जिन्होंने दिलीप कुमार के साथ अपने अंदाज वाली फिल्म बनाने में कामयाबी हासिल की। रिंकी कहती हैं कि दिलीप कुमार को संभालना उस दौर में हर निर्देशक के वश की बात नहीं थी। कारण ये था कि दिलीप कुमार की यह आदत थी कि वह अपनी फिल्म की हर स्क्रिप्ट में खूब दखल देते थे। फिल्म मधुमती का किस्सा सुनाते हुए हुए रिंकी कहती हैं कि दिलीप कुमार घर पर आते थे और मुझे याद है, बाबा से कहते थे कि दादा इसमें यहां पर बिल्ली वाला म्यूजिक डाल देते हैं। बिल्ली के रोने की आवाज डाल देते हैं लेकिन बिमल रॉय कभी किसी एक्टर्स की ऐसी बातें बात नहीं सुनते थे। वजह यह नहीं थी कि वह सलाह लेना पसंद नहीं करते थे। बिमल रॉय की फिल्मों की खासियत रही थी कि उनकी फिल्मों में हमेशा बाउंड स्क्रिप्ट के साथ शुरू होती थीं।

रिंकी बताती हैं कि दिलीप कुमार को लेकर ये बातें उस दौर में खूब होती थीं कि दिलीप कुमार सिर्फ बिमल रॉय और महबूब खान से ही हैंडल हो सकते हैं लेकिन दिलीप कुमार बिमल रॉय की फिल्मों की बेहद इज्जत करते थे। यही वजह थी कि जब उन्हें पहला आॅफर मिला था तो उन्होंने फ़ौरन हां कर दी थी। रिंकी बताती हैं कि उस वक़्त दिलीप कुमार की आग आ चुकी थी। वह ट्रेजडी किंग बनने के रास्ते पर थे। ऐसे में बिमल दा के ज़हन में दिलीप कुमार देवदास के रूप में आये। देवदास ने दिलीप कुमार को हिंदी सिनेमा का ट्रेजडी किंग बना दिया। खुद दिलीप कुमार ने कई बार अपने इंटरव्यू में यह बात दोहरायी है कि बिमल दा बेहद कम बातचीत करते थे लेकिन उनकी आंखें ही बता जाती थीं कि उन्हें क्या करना है। हमसे उन्हें क्या चाहिए।

दो फिल्मों का करार, बाउंड स्क्रिप्ट, नो ब्लैक मनी , समय पर शूटिंग पूरी

आपको यह बात जान कर हैरानी हो सकती है, लेकिन यह सच है कि उस दौर में भी बिमल रॉय एक्टर्स के साथ बकायदा दो फिल्मों की डील किया करते थे और वह भी बकायदा राइटिंग कांट्रैक्ट के साथ। रिंकी भट्टाचार्य ने बताया कि आज भी उनके पास उनके पिता की फिल्मों के सारे करार वाले दस्तावेज सहेज कर रखे हैं। बिमल रॉय ने हमेशा इन बातों को तवज्जो दी कि उन्होंने कभी भी अपने साथ काम करने वाले लोगों के साथ नाइंसाफी नहीं होनेदी। तभी तो उनकी फिल्मों में भी उनकी वह छवि नज़र आती थी . रिंकी कहती हैं कि उन्होंने दिलीप कुमार , धर्मेंद्र और नूतन के साथ दो फिल्मों की डील कर रखी थी। फिल्मवालों के साथ वो उस अभियान में सबसे आगे रहे कि इंडस्ट्री में ब्लैक मनी काम नहीं होना चाहिए। सब लेन-देन पारदर्शी हो। उनके साथ काम कर रहे कलाकारों में नूतन, शर्मिला और धर्मेंद्र भी इसके तैयार हो गये थे। उस दौर में बिमल रॉय उन निर्देशकों में से एक रहे हैं, जिन्होंने कभी भी सेट पर शूटिंग के वक्त अपनी कहानियों में तब्दीली नहीं की। वह हमेशा तय स्क्रिप्ट के अनुसार ही आगे बढ़ते थे। रिंकी कहती हैं कि बिमल रॉय को उस दौर में बाकी निर्देशक इन कारणों से भी तवज्जो देते थे क्योंकि उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग का स्टाइल भी बदला था। उन्होंने थियेरिटकल मेथेड को बदल कर नेचुरल एक्टिंग पर जोर दिया था।

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