Mon. Oct 22nd, 2018

भारतीय प्रधानमंत्री माेदी द्वारा जनकपुर सम्बाेधन के कुछ अंश

जनकपुरधाम में पधारे भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र माेदी ने अपने भाषण से सबकाे अाकर्षित किया । सबसे पहले अापने मैथिली में सम्बोधन करते हुए कहा कि राजर्षि जनक आ जगत् जननी मॉ जानकी के पवित्र भूमि, गौरवशाली इतिहास भेल मिथिलाक सांस्कृतिक राजधानी यी जनकपुरधाम में हमरा न्योत द क बजेलौं आ यी सम्मान देलौं एकरा लेल हम सम्पूर्ण मिथिलावासी, जनकपुरवासी, आ प्रदेश नम्बर दु के सम्पूर्ण जनता के नमन करैत हार्दिक आभार व्यक्त करै छी। उसके बाद मैथिली में दो पंक्ति पग पग पोखैर माछ मखान, सरस बोल मुस्की मुख पान विद्या वैभव शान्ति प्रतीक, सरस क्षेत्र मिथिलांचल थिक मिथिला की संस्कृति, मिथिला का लोक कला, मिथिला का स्वागत सम्मान सब अद्भुत है। पूरी दुनियां में मिथिला संस्कृति का स्थान बहुत ऊपर है। राजा जनक की राजधानी और जगत् जननी सीता की पवित्र भूमि पर आने की सोच तो बहुत पहले से थी पर इस बार इस पावन भूमि पर आने और सीता मैया के दर्शन का सौभाग्य मिला। जनकपुरधाम आकर आपलोगों का अपनापन देख कर ऐसा लगा जैसे मैं अपने मामा के यहां नाना नानी के घर आ गया। और वैसे भी भगवान राम और मॉ सीता के संबंध पर कहूं तो मैं सचमूच अपने आपको यहाँ का भगिना ही समझ रहा हूं। भगवान श्री राम ने जनकपुरधाम में आकर धनुष को तोडा था ये बात तो सबलोग जानते हैं। लेकिन पूरी दुनियां में यह पहली बार हुआ जब शस्त्र रूपी धनुष को तोड कर एक नयां संबंध जोडा गया था। अयोध्या और जनकपुरधाम का संबंध या यूं कहें कि अब के नेपाल और भारतवर्ष का संबंध उसी युग से चला आ रहा है। धनुष तोड कर प्रेम संबंध को जोडा था। धनुष का टूटना शस्त्र का टूटना है और राम सीता का मिलन प्रेम का द्योतक है। यह सिर्फ दो आत्माओं का मिलन नहीं था, यह दो राजघराना का मिलन नहीं था बल्कि दो संस्कृतियों का मिलन था। भारत की अयोध्या और इस समय नेपाल में रहे मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी जनकपुरधाम का संबंध तब से है। दोनो देशों के बीच पारिवारिक संबंध, वैवाहिक संबंध तब से ही बंधें है। यह युगों युगों से चला आ रहा संबंध है। रामायण काल में जनकपुर का, महाभारत काल में विराटनगर का, उसके बाद सिम्रौनगढ का, बुद्ध काल में लुम्बिनी का यह संबंध युगों युगों से चलता आ रहा है। राजनीतिक रूप से भले ही हम सीमाओं में बंटे हों, लेकिन पारिवारिक रूप से, धार्मिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से हममें कोई अन्तर नहीं है और यही कारण है कि दो देशों का संबंध पूरी दुनियां में अद्वितीय और अतुलनीय है। राजा जनक के दरबार में अष्टाबक्र जैसे विद्वान और गार्गी जैसी विदुषी का होना यह साबित करता है कि शासन के साथ साथ विद्वता, आध्यात्म को भी महत्व दिया जाता था। राजा जनक के दरबार में लोक कल्याणकारी नीतियों पर विद्वानों के बीच बहस होता था। राजा जनक स्वयं उस बहस में सहभागी होते थे और वहां से जो नतीजा निकलता था उसको प्रजा के हित में जनता के हित में और देश के हित में लागू करते थे। यानि कि सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया, लोकतंत्र का यह अभ्यास उसी समय से होता आया है और जनता के हित में तभी निर्णय लिया जा सकता है जब शासन व्यवस्था में सबको सहभागी कराया जा सके। राजा जनक चाहते तो खुद वही सारे निर्णय ले सकते थे, सिर्फ परिवार से सलाह कर निर्णय ले सकते थे। पर वह प्रजा के हित में नहीं होता इसलिए वह सामूहिक निर्णय, सामूहिक संवाद को मान्यता देते थे। लोकहित में शासन व्यवस्था को चलाना है तो आज के सभी शासक वर्ग को राजा जनक से प्रेरणा लेनी चाहिए। मैं स्वयं उनसे प्रेरणा लेता हूं। राजा जनक को विदेह भी कहा जाता है। विदेह का अर्थ होता है जिसको अपने देह यानि शरीर से भी कोई मतलब ना हो और सिर्फ लोकहित में अपने आप को खपा दे, लोक कल्याण में अपने को समर्पित कर दे। राजा जनक के लिए उनकी प्रजा ही सबकुछ थी। उन्हें अपने परिवार रिश्ते नाते भाई भतीजा, जीजा साला किसी से कोई मतलब नहीं था बस दिन रात बस अपने प्रजा की चिन्ता करने को ही उन्होंने अपना राजधर्म बना लिया था। यह मिथिला का क्षेत्र उसी समय से कृषि प्रधान देश रहा है। रामायणकालीन कथाओं में हमने सुना है कि देश में अकाल सूखा पडने पर राजा जनक स्वयं हल उठा कर खेतों की जुताई के लिए निकल पडे थे। यह एक अच्छे शासक की निशानी होती है जनता के दर्द को अपना दर्द समझना। आज पूरी दुनियां वातावरण को लेकर चिंतित है। करोडों अरबों रूपये खर्च कर दिए जाते हैं सिर्फ इस बात पर चर्चा करने के लिए कि वातावरण का संतुलन कैसे बनाया जा सके। लेकिन हमारे पूर्वजों की सोच उसी समय कितनी विकसित और वैज्ञानिक होती होंगी कि चारों ओर पेड पौधे हरियाली, नदी तालाब सबकुछ की व्यवस्था करते थे। राजा जनक भी इसके उदाहरणीय हैं। जनकपुर और आसपास के क्षेत्र में सैकडों तालाब का निर्माण करना वातावरण को संतुलित करने और पानी, सूखे अकाल की समस्यों को नहीं आने देने के लिए ही तो था। राजा जनक के दरबार में रही विदुषी गार्गी उस समय की महिला सशक्तीकरण की प्रतीक है। वैसे भी मिथिला की महिलाएं समाज के अन्य क्षेत्रों की महिलाओं की तुलना में काफी आगे है। कहा जाता है दुनियां की अन्य व्यवस्थाओं में पितृ सतात्मक परिवार और समाज होता है परन्तु मिथिला में आपको मातृ सतात्मक की बहुल्यता मिल जाएगी। मिथिला की महिलाएं अपने संस्कृति के प्रति अपनी भाषा के प्रति अपने मूल्य मान्यताओं के प्रति, अपने संस्कारों के प्रति बहुत ही सजग व सचेत होती हैं। समाज के अन्य वर्ग की माताएं बहने उनसे प्रेरणा लेती हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना होने के पहली बार किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री के रूप में जनता के द्वारा चुनी गई प्रादेशिक सरकार का आतिथ्य ग्रहण करने का सौभाग्य मिला है। इसके लिए मैं प्रदेश सरकार को बहुत बहुत अभिनन्दन करता हूं। साथ ही मैं सभी सातों प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को भी बधाई देता हूं। दशकों तक संघर्ष करने और सैकडों लोगों की बलिदानी के बाद यह दुनियां का सर्वोत्तम शासन व्यवस्था को आपने अपनाया है। अब नेपाल के विकास का समय है जिसमें भारत का पूरा सहयाेग रहेगा । जनकपुर के विकास के लिए नेपाल सरकार जाे भी याेजनाएँ लाएँगी भारत सरकार उसमें पूरा सहयाेग करेगी  । जनकपुर के अासपास अाैर जनकपुर के विकास के लिए भारत साै कराेड की सहयाेग राशि देने की घाेषणा करता है पर यह सच है कि यह हम नहीं दे रहे यह ताे माँ जानकी की कृपा है ।

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