Sun. Nov 18th, 2018

भ्रष्टाचारी को आतंकवादी का पर्यायवाची मानना होगा : अजय कुमार झा

जलेश्वर नगरपालिका में वैठे अनसन पर

जलेश्वर | आज मधेश के अधिकाँश पालिकाओं में भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा बनने लगा है। न मधेश आन्दोलन की कोई गरिमा है न शहीदों के बलिदानी का महत्व ही। वर्षो के भूखे शेर की तरह जन प्रतिनिधि और सम्बंधित अधिकारी लोग बजट चट करने को टूट पड़े हैं। उन में से एक जलेश्वर नगरपालिका भी है। जहाँ कुछ दिनों से बार्ड अध्यक्ष लोग धरना दिए हुए हैं। करोरो भ्रष्टाचारी का आरोप लगाया जा रहा है।
स्थानीय सरकारों के द्वारा षडयंत्र पूर्वक अनेक प्रकार के अनावश्यक कर का बोझ किसानों और सभ्य नागरिकों के ऊपर जबरदस्ती थोपा जा रहा हैं। स्थानीय सरकार से लेकर केन्द्रीय सरकार तक में भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है। और दुहाई जनता को दिया जा रहा है। जनता ने भ्रष्ट नेता को चुनाव किया इसलिए वो भ्रष्टाचारी कर रहे हैं। अतः उन्हें कौन रोकेगा ? इसका यही मतलब हुआ की यहाँ न न्यायालय है न प्रशासन। सब मिलकर जनता और देस को लुटने में अपने को गरिमावान समझते हैं। वे मूढ़ लोग ए नहीं संज्ञान कर पा रहे हैं की जब राज संस्था के गरिमा को उखाड़ कर नागार्जुन के जंगलों में फेका जा सकता है और महिमा ढाह कर दया का पात्र बनाया जा सकता है। तो तुम आधारहिन् राजनीति कर्मियों की हैशियत कितने दिनों का मेहमान हो सकता है ?
स्थानीय स्तर में असार महिना के अन्त में बिकास का कार्य में दिख रहे तीब्रता और एनजीओ के द्वारा अंधाधुंध हो रहे महिला जनचेतना के नामपर बजेट स्वाहा कार्यक्रम के षडयंत्र से लोग भलिभाति परिचित हैं। लेकिन वो कुछ भी नहीं कर सकते। क्युकी इसमे पियन से प्रधान तक का सहमति और सहयोग है।अभी स्थानीय स्तर में हो रहे सार्वजनिक विकास निर्माण के कार्यों का विवरण और नेपाल सरकार द्वारा निर्देशित सामान्य सूचना तक को हक़ को भी कई नगरपालिकाओं के अधिकारी और जनप्रतिनिधियो ने व्यक्तिगत लाभ और स्वार्थ के कारण नजर अंदाज कर दिया है। जिससे नागरिको के सूचना का हक़ छीन चूका है।आम नागरिक किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में नजर आ रहे हैं। सरकार मौन है। जब किसी पालिका के सभी जिम्मेवार अंग लूटने में एक जुट हो जाय और केंद्र का आशीर्वाद हो तो कौन उसे रोकेगा ? डेग डेग पर नागरिक आन्दोलन नहीं होता है। अगर आम नागरिक को कदम कदम पर आन्दोलन के लिए तैयार रहना पड़े; अपनी नेताओं और अधिकारियों के कु कृत्यों के ऊपर अंकुश लगाने के लिए तो ऐसे नेता और कर्मचारी की क्या आवश्यकता रह जाती है ? इन जहरीले सर्पों का भार क्यों उठाया जाय ? या फिर ऐसी सरकार की क्या आवश्यकता रह जाती है ! 33 किलो सोना के तस्करी में पकडे गए अपराधी को इतनी निर्भयता और गर्व के साथ आँख में आँख डालकर प्रशासन से बात करना क्या दर्शाता है ? अपराधी खुलेआम सान के साथ घूमना किस चीज का द्योतक है ? भ्रष्ट को संरक्षण और सम्मान मिलना किस संस्कार और नैतिकता का प्रतिक है ?
क्या फरक पड़ा तंत्र के बदलने से ? हजारों नागरिको की जनयुद्ध और जन आन्दोलन के नाम पर बलि चढाने से ? अधिकार दिलाने के नामपर हजारों परिवार को उजारने से ?
अगर हालत यही रही तो आम नागरिक को विकल्प खोजने में जादा समय नहीं लगेगा। झूठे राष्ट्रीयता के नामपर लोगों को अब और धोखे में नहीं रखा जा सकता। डा. गोविन्द के सी के साथ किए गए समझौते का क्या मुल्य हुआ ? क्या वो देश को बाटने की बात कर रहे हैं ? क्या उनका कदम राष्ट्रहित में नहीं है ? यदि वो जनहित की बात करतें हैं तो उनके साथ यह दुर्व्यवहार क्यों ? क्या सरकार उनकी बातों  को समझना नहीं चाहती है ? या फिर सरकार किसी बाहरी दवाव के कारण मजबूर है ? अब इन तीनों में से कोई एक कारण तो होगा ही। अगर सरकार गंभीरता को समझने में असमर्थ है तो ऐसे नपुंसक और तिथिवाह्य सरकार से देश दिशाहीन हो जाएगा। अगर सरकार समझना नहीं चाहती है तो यहाँ गुण्डा राज स्थापित होने की संभावना की ओर संकेत करता है। और यदि विदेशी दवाव के कारण सरकार गुटने टेक रही है तो तिब्बत की तरह नेपाल और नेपालियो के गरिमा, इतिहास और संस्कृति को मिटने में देर नहीं लगेगी। वैसे भी यहाँ नेपालीपन तो अब रहा नहीं। हिन्तुत्व, जो हमारी पहचान है; हमें घृणा होने लगा है। क्योंकि हमें अब विदेशियों से प्रेम हो गया है। पाश्चात्य विद्वान् कार्लमार्क्स जिनका व्यक्तिगत जीवन सतप्रतिशत असफल, दुखी और दारुण रहा आज वो हमारी भाग्य निर्माता हो गए हैं। जिनका प्रतिनिधि आज नेपाल पे राज कर रहा है। नेपाल को नेपाली समाजवाद का शुत्र देने बाले स्व. वि पी कोइराला को कांग्रेसियों ने भुलाकर राजनीति से पथभ्रष्ट होकर गतिहीन हो गए हैं। इस परिस्थिति में जनता यदि नए तंत्र की बात करती है तो उसमे जनता की मजबूरी और वाध्यता है। आम नागरिक शान्ति और सुख से जीना चाहती है। जबकि स्वार्थी और भ्रष्ट लोग उनकी सहज जीवन शैली में अबरोध उत्पन्न करते हैं। फिर सुरु होता है संघर्ष। और ध्वंस होता है जीवन और संस्कृति। आज नेपाल उस कागार पर पहुचने लगा है। अतः केंद्र सरकार में क्षमता है तो भ्रष्टाचारियों पर निर्दयतापूर्वक नियंत्रण करे अन्यथा भविष्य में भीषण आन्दोलन के लिए तैयार रहे। क्योंकी समाज में सिर्फ भ्रष्ट और मूढ़ लोग ही नहीं वल्कि इमानदार,सृजनशील और विवेकशील लोग भी रहतें हैं। भले ही उनका संगठन नहीं है। उनकी संख्या बहुत कम है। उनको राजनैतिक संरक्षण और वैदेशिक आशीष नहीं है। लेकिन याद रहे ! जिस प्रकार हीरे गहरे खादान में मिलते हैं और सर्वाधिक मूल्यवान होते हैं। वैसे ही अच्छे लोग संख्या में कम होने के वावजूद भी वो बहुत हीं मुल्यवान होते हैं। और उन्ही के चारित्रिक महानता के कारण उल्लुओं को मौज करने का मौका मिल जाता है। बुद्ध और जनक,सीता और भृकुटी के नाम को बेचकर नेपाली राजनीतिकों ने अबतक अपना पेट पालने के शिवाय और किया ही क्या है!
वह दिन दूर नहीं जब अच्छे लोग, संत और महात्मा को लोग राजनीति में आने के लिए बाध्य करेंगे और उन्हें ससम्मान अपना नेतृत्व सौपेंगे। फिर सुरु होगा नेपाल में योगी राज। बस सदाचारी और स्वच्छ लोगों का एक संगठन हो जाय।
*भ्रष्टाचारी को आतंकवादी का पर्यायवाची मानना होगा।
*जनता को लूटने बालों को देश को डुबोने बाला के प्रतिक जानना होगा।
*देश विकास के अवरोधक को देसद्रोही का संज्ञा देना होगा।
*हिंसक, भ्रष्टाचारी और अपराधियों के साथ शून्य सहिष्णुता और पूर्ण निष्ठुरता का भाव अपनाना होगा।
*जाली,फरेबी और ठगी प्रवृत्ति के साथ कठोरता से निपटना होगा।
*गलत का प्रोत्साहन समाज को शमशान की ओर गतिमान करता है।
अतःसमय रहते सावधान होना बुद्धिमानी होगा।

हाँ, एकबात और अनसन या विरोध होना चाहिए लेकिन भ्रष्टाचार रोकने के लिए नाकि भ्रष्टाचार करने के लिए |

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