Wed. Nov 21st, 2018

मधेश की जनता की भावना, ससफो-राजपा गठबन्धन मधेश की आवश्यकता : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | स्थानीय चुनाव के बाद देश केन्द्रीय चुनाव की ओर अग्रसर है और इसके साथ ही अनैतिक गठबन्धन को भी तेजी से स्वीकार किया जा रहा है । देखा जाय तो यह कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है । यह होता रहा है और होता रहेगा पर सवाल यह है कि इसका असर देश, देश की जनता या देश के विकास पर क्या पड़ेगा ? क्या एक अनैतिक और सिद्धान्तविहीन गठबन्धन देश को स्थायित्व प्रदान कर सकता है, क्या देश की अस्थायी राजनीति देश को विकास की राह पर ले जा सकता है, क्या देश की पलायित युवाओं को देश रोजगार के अवसर प्रदान कर रोक सकता है ? जहाँ विचारों में सामंजस्य नहीं ऐेसे गठबन्धन से आई सरकार देश को किस नीति से चलाने की कूबत रख पाएगी ? या एक बार फिर बाँटी हुई कुर्सी और सत्ता बचाने के लिए देश को आर्थिक मार की ओर धकेलती हुई मंत्रीमण्डल के लगातार गठन की प्रक्रिया ही इस देश की नीति तय होने जा रही है ?

दूसरी ओर मधेशवादी दलों पर अगर नजर डाली जाय तो यहाँ भी राजपा नेपाल और ससफो द्वारा चुनाव के मद्देनजर की गई तालमेल की स्थिति देखने को मिलती है, साथ ही काँग्रेस के साथ की । इस सन्दर्भ में यह तो कहा ही जा सकता है कि मतभेदों और स्वार्थपरकता के बावजूद ससफो और राजपा का राजनैतिक केन्द्र मधेश और मधेश की समस्या ही है, परन्तु इसमें काँग्रेस का साथ इन्हें कितना रास आएगा ? क्योंकि काँग्रेस भले ही मधेश हित की बात कर मधेश की जनता के समक्ष अपनी छवि बनाने की कोशिश करे परन्तु मधेश की समस्या के समाधान में अब तक नाकाम ही रही है । भले ही वह यह दावा करे कि उसने कोशिश की पर उनकी कोशिश के दावे भी खोखले ही रहे हैंं । दूसरी ओर ससफो और राजपा का गठबन्धन का असर दूरगामी होगा या नहीं यह तो वक्त बताएगा परन्तु आज की परिस्थितियों में मधेशी इसमें मधेश हित की सम्भावनाओं को जरुर तलाश कर रहे हैं । वो यह विश्वास कर रहे हैं कि इनका साथ देश के संसद में मधेश की स्थिति को मजबूत करेगा और मधेश की समस्या का समाधान सम्भव होगा । इनका साथ मधेश की आवश्यकता थी, समय–समय पर मधेश की जनता यह भावना व्यक्त करती आई है । अब देखना यह है कि ये दोनों दल इस भावना की कितनी कद्र करते हैं वैसे इतिहास इनका भी जाना समझा ही है । टिकट बँटवारे और समानुपाती के नाम जो चयन किए जा रहे हैं, उसमें सावधानी की आवश्यकता है । क्योंकि परिवारवाद का आरोप इनपर लगता रहा है । एक अच्छी पहल जरुर हुई है कि दलबदलुओं को नकारा जा रहा है । देखना है कि अमृतकलश किसके हाथ लगता है और यह अमृत जनता के हित में प्रयुक्त होता है या स्वहित में ?

 

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