Mon. Oct 22nd, 2018

मधेश की भूमि मधेशियों को वापस मिलनी चाहिए : कैलाश महतो


कैलाश महतो, परासी | यह एक अनुसन्धान का विषय बनना चाहिए कि भूमि क्या है ? एक तरफ हमारे पूर्खों और बुजूर्गों से हम यही शिक्षा लेते आ रहे हैं कि मानव मानव भाइ भाइ है । हमें लडाई झगडे नहीं करने चाहिए । चोरी नहीं करनी चाहिए । झूठ नहीं बोलनी चाहिए । किसी को धोखा नहीं देना चाहिए । आदि इत्यादि । ये नीति की बातें और शिक्षा अव्यत समयों से चलते आ रहे हैं । मगर न चोरी हटी, न चोरों की संख्या घटी । न झगडे खत्म हुए, न झगडालूओं पर यह शिक्षा लागू हो पाया । न झूठ बन्द हुए, न झूठों ने आदत बदली । न धोखा खत्म हुआ, न धोखेबाजों की संख्या घटी । ये बढते ही रहे और बढते जा रहे हैं ।
गौर से देखें तो इस धरती ने जितने भी दार्शनिक, बुद्ध, प्रबुद्ध, शिक्षक, प्राध्यापक, नेता, राजनेता, पंडित और मौलवियों को उत्पादन की–सब के सब असफल रहे हैं । अकेले दुकेले से न हो सकने बाले कामों को बडे समूह में इकट्ठे लोग बडी आसानी से कर लेते हैं । लेकिन आश्चर्य की बात है कि ब्रम्हा, विष्णु, महेश, राम, कृष्ण, बुद्ध, जैन, मोहम्मद और जिसस लगायत के हजारों देवताओं ने मानव को मानव क्यूँ नहीं बना पाये ? धर्म जो मानवता को दर्शाता है, भावना से जुडता है और प्रेम पैदा करने का दावा करता है, वे सारे के सारे गायब कहाँ हो जाते हैं ?
धर्म, प्रेम, मानवता, इमानदारिता, नैतिकता– ये सब मानवकृत संस्कृतियाँ हैं । प्राकृतिक नहीं हैं । प्रमाणित यही होता है कि मानवकृत संस्कृत या संस्कृतियाँ जो और जितने हैं, उन सबों ने मानव के प्राकृतिक जीवन को विकृत किया है । मानव का पाकृत जीवन शैलियों को देखें तो लोग प्राकृतिक अवधारणाओं के साथ जितने स्वस्थ्य और सम्पन्न थे, उन सारे सम्पन्नता और स्वस्थता को मानव समाज के अग्रज और भला चाहने बाले लोग और उनके समूहों ने विकृत कर दिया है ।
प्राकृतिक जीवन शैलियों से असन्तुष्ट लोगों के कुछ समूहों ने हर प्राकृतिक चीज–जिससे सब सन्तुष्ट रहे, जिसमें सब समान रहे–को तोडफोड तथा भेदभाव कों पैदा करने हेतु सक्कली ईश्वर से ज्यादा नक्कली ईश्वर तथा देवी देवताओं का निर्माण कर डाला । दार्शनिकों के निश्छल दर्शनों को धर्म का एक नयाँ नाम दे डाले । नियम कानुन तथा विधी विधान बना डाले और अपने द्वारा निर्मित (संस्कृत) धारणाओं को पालन करना मानव का परम कर्तव्य बता कर बाँकी के लोगों को धर्म दास, कर्तव्य दास, मूर्ति दास, मन्दिर तथा मस्जिद दास आदि बना डाले । लोगों को जानने, सवाल करने तथा उनको समझने तक में बन्देज लगा दी गयी । और हजारों लाखों वर्षोंतक बिना कोई सवाल के चले उन संस्कृतियों को लोगों ने ईश्वर, अल्लाह, फरिस्ता, गॉड, भगवान्, धर्म आदि के नामों से अपने जीवन को जोड लिए और शनैः शनैः वे उन निर्माताओं के शिकार होत रहे, दास बनते रहे ।
धर्म न हिन्दु, न मुस्लिम होता है । न शिख, न इसाई होता हैं । धर्म तो प्राकृत होता है जो मानव के प्राकृतिक रुप, रङ्ग, आवश्यकता और भावनाओं मेें अन्तर्निहित होता है । तो फिर क्यूँ कुछ लोगों ने इतने सारे जाल बूने, भ्रम फैलाये और संस्कृति बनाये ? आयें– कुछ विचार करें ।
भूमि का सही अर्थ प्राकृतिक ही है । हिन्दु लोग अपने उत्पति काल से भूमि को अपना देवी मानते हैं । प्राकृत भाषा के अनुसार देवी का अर्थ देने बाली होता है । और ब्रम्हाण्ड में जितने भी दानी है, उनमें सबसे अधिक दान देने बाली भूमि ही होने के कारण इसे देवी कहा जाता है । और मानवकृत जितने भी धर्म, संस्कृति, रीतिरिवाज तथा संस्कारें हैं, वे सब किसी न किसी प्रकार के कल, बल, छल तथा रणनीतियाँ हंै–जिनके सहारे मानव को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा गया और उनको शोषण करने का आधार बनाया गया ।
सारे शोषणों का आधार भूमि है । भूमि ही सारे धर्मों का आधार है और भूमि के कारण ही दशरथ की रानी केकयी बनती है, राम–रावण युद्ध होता है, कौरव और पाण्डवों की महाभारत जंग होती है । ईश्वर बनने के लिए भी भमि अनिवार्य रही है । मानव युद्ध इतिहासकारों के अनुसार भी तकरीबन ४,००० ई.पू से आजतक भूमिहीनों से लेकर जमिनदारों तक और जमिनदारों से लेकर राजा महाराजा तथा बडे बडे सम्राटों तक ने युद्ध की । खून बहायी । जाने दी और जाने लीं । यहाँतक कि अपनों तक को लोगों ने धोखा दी है । हत्यायें की है । हजारों युद्ध, सैकडों लडाईयाँ, लाखों करोडों अपराध और अनगिनत धोखाधडियाँ होती रही हैं । भूमि वितण्डा मचती रहती हैं ।
उसी का क्रमबद्धता आज भी मधेश में कायम है । भूमि की ही उत्पादन शैली, उसके विशाल छाती पर विराजमान प्रगति, वैभव और सम्पन्नता को देख गोरखा के राजा कहलाने बाले पृथ्वीनारायण शाह ने पहाडों के तत्कालिन नेपाल, काठमाण्डौं, भक्तपुर और ललितपुर तथा मधेश की लहलहाती भूमियों को पाने के लिए अत्याचारपूर्ण अपराध किया था । उन्होंने उन भूमियों को एकीकरण नहीं, गोरखा राज्य का बिस्तार किया था । और आज पर्यन्त वह कायम है । मधेश के शासन, प्रशासन, राजस्व, भंसार, अर्थ, भूमि, शिक्षा आदियों पर सारा कब्जा जमा चुके नेपाली राज्य मधेश के पास बाँकी रहे भूमियों को समेत हडपने के कगार पर है । कभी बस्ती विकास तो कभी पूनर्वास के नाम पर मधेश के भमियों को दोहन कर चुके राज्य आज भू–माफिया और औद्योगिकरण के नाम पर मधेश की भूमि को अतिक्रमण करने में लगी हैं ।
एकीकरण की बात करें तो भारत से ही सिखना होगा । सन् १९४७ में भारत आजादी के बाद ५६५ राज्यों में विभक्त राज्यों को– जो भारत आजादी के बाद स्वतन्त्र राज्य ही होना चाहे–उन सबों को सरदार बल्लभभाइ पटेल ने उनके राजा महाराजों तथा राजकुमारों के दिल और दिमागों को जितकर विशाल भारत का निर्माण किया । आज वह भारत सरदार पटेल को गर्व के साथ अपना लौह पुरुषत्व का नेता मानता है । उन्होंने अत्याचार और आतंक फैलाकर नहीं, अपितु जम्मू कश्मिर, हैदराबाद और जुनागढ जैसे आजादी के जिद्द पर अडे राज्यों को भी पे्रम से जोडते हुए भारत में मिलाने का काम किया । आज उन राज्यों के लोग भी भारतीय होने में गर्व करते हैं ।
नेपाली राज्य इस भ्रम में दिख रही है कि मधेश की भूमियों को खरीद कर वह मधेशियों को अपने रणनीति के तहत मधेश से पलायन कर देगी तो दुसरी तरफ मधेश भी इसी राह और रणनीति में है कि सारे मधेश को लुटने बाले नेपाली राज्य और उसके नाम पर मधेश में अनेक दहशत और राज्य आतंक फैला रहे नेपालियों के पास गैर कानुनी रुप में चले गये उनके पैसे किसी न किसी रुप में उनके पास आ जाये और मधेश आजादी के साथ साथ अंगे्रजों से जमीन वापस लेने बाले भारतियों के तरह ही मधेश का जमीन वापस लेने का हमारा अधिकार पूर्णतः सुरक्षित है । मधेश भी इसी रणनीति में है कि उसके पैसे उसे वापस चाहिए–जिसके लिए वह बस अपना रुप सा बदला है भूमि बेचुवा बनकर ।
जो मित्र लोग चिन्तित हैं कि मधेश के किसान अपने जमीनों को बेचकर कहीं पलायन तो नहीं हो जायेंगे ? चिन्ता करने की बात नहीं है । वह भी हमारे रणनीति के अन्तर्गत ही हो रहा है । मधेश में उद्योग लगेगी, वह हमारी होगी । वह भूमि भी हमारी ही रहेगी । बस्, हम अपने खोए हुए पैसे वापस ले रहे हैं । मधेश की भूमि मधेशियों को वापस मिलना भी निश्चित है ।

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कैलाश महतो जी मदेशका नक्शा भी बनाओ जो बंगलादेश से लेकर भारतका पुरा बिहार और युपी तक और भारत-बंगलादेश सरकार से भी अपनी मदेश कि माघ रखो हम पहाडी नेपाली भी आपके साथ हैं . भै अधिकार कि वात पुरा कर्ना चाहिए…१/४ करने से क्या फाइदा , मधेशी जनताको गुमराह नही कर्ना चाहिए .