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मधेश की संतति के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है : श्वेतादिप्ती

श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति

श्वेतादिप्ती ,काठमांडू,२० जुलै२०१५| चार दलों के १६ सूत्रीय समझौते के पश्चात् नेपाली जनता के सामने आठ वर्षों के लम्बे इंतजार के बाद उनके सपनों का दस्तावेज संविधान के प्रारम्भिक मसौदे के रूप में आया है । जो आरम्भ से ही विवादित है । अब ये मसौदा संविधान सभा के सभागार से निकल कर जनता के घर आँगन तक पहुँच चुकी है । उनकी सलाह और सुझाव के लिए । परन्तु सवाल यह है कि जब किसी भी हालत में संविधान बना लेने की जिद सत्ता की है, जो स्वयं सर्वोच्च के फैसले को न मानकर कानूनन गलत कर रहे हैं उनके सामने जनता की सलाह और सुझाव का क्या अस्तित्व ? हालत ये है कि जनता ये जान रही है कि उनकी बात या सलाह सत्ता के गलियारों में कोई मायने नहीं रखती है, फिर भी किसी उम्मीद के सहारे अपनी सुझाव दिए जा रहे हैं । संविधान की धाराओं को आम जनता सहजता से समझ नहीं सकती । आज भी कई दुर्गम प्रदेश देश में हैं जो विकास और शिक्षा से कोसों दूर हैं, ऐसे में वहाँ की भोली और अशिक्षित जनता संविधान की बारीकियों और धाराओं में उलझे शब्दों को कहाँ तक समझ पायेगी ? और ऐसे में वो भला क्या सलाह देंगे ? और रही बात सभासदों की भूमिका की तो, वो भला जनता को कितनी पारदर्शिता के साथ मसौदे के गुण और अवगुण से परिचित करा पाएँगे । उनपर तो यह यकीन किया ही नहीं जा सकता कि वो मसौदे के कमियों से जनता को अवगत कराएँगे । ऐसे में आखिर यह ढकोसला क्यों किया जा रहा है ? जनता तो इतनी नादान है कि वो सुझाव देने की अपेक्षा सभासदों को अपनी समस्या सुना रहे हैं । आखिर वो भी क्या करें इन सभासदों के चेहरे भी तो कभी कभी देखने को मिलते हैं और यही जनता के प्रतिनिधि हैं, ऐसे में समस्या सुनाने के लिए भी सम्भवतः यही उपयुक्त समय है उनके लिए । संविधान मसौदे के बड़े बड़े पांडित्यपूर्ण भाषाओं में उलझे नियम और कानून भला इनकी समझ में कहाँ से आएगी ? किन्तु, सरकार को इससे क्या वास्ता वो तो औपचारिकता निर्वाह करने में लगे हुए हैं और madhesh22इसी बहाने एक बार फिर भत्ता और पैसों का खेल जारी है । उन्हें क्या परवाह कि आज भी त्रिपाल में रह रहे बच्चे मौनसून की इस मार को कैसे झेल रहे हैं ? दोलखा, सिन्धुपाल चौक आदि जगहों से आए भूकम्प पीड़ित कैसे जी रहे हैं ? इन बातों से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता । इनका तो निर्माण की बातों और बजट निर्धारण करने तथा दातृसंगठनों से आए राहत सामग्री में ही दिमाग उलझा हुआ है और जनता को तो इन्होंने संविधान के मसौदे में उलझा दिया है ।

अंतरिम संविधान में जनता की जो आशा निहित थी जब उसे ही चार दलों ने दाँव पर लगा दिया, विरोधों के बावजूद संघीयता के बिना संविधान लाया जा रहा है, नागरिकता के मुद्दे पर मधेश की संतति के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, शक्तिविहीन बनाने की पूरी तैयारी की जा रही है, जिसकी वजह से मधेश सुलग रहा है अगर सरकार को इसकी परवाह नहीं है तो ऐसे में सुझाव संकलन कर के सरकार क्या दिखाना चाह रही है ? खुले तौर पर सरकार के इस कदम पर टिप्पणी हो रही है और सरकार को, पेश किए हुए मसौदे की कमियों से अवगत कराया जा रहा है, इस पर जब काबिल सरकार के कानों पर जूँ नहीं रेंग रही है, तो ऐसे में इस सुझाव संकलन का क्या औचित्य ? क्या ये महज दिखावा नहीं है ? सबसे बड़ी बात तो यह है कि कई क्षेत्र में संविधान मसौदे की कॉपी ही नहीं पहँुच पाई है, जिसे कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग गहनता के साथ पढ़ पाते और उसकी कमियों या खूबियों से अवगत हो पाते । जनता भी यह जानने के लिए इच्छुक है कि आठ वर्षों के पश्चात् जो मसौदारूपी जिन निकला है वो कहाँ तक उनकी आशाओं और उम्मीदों को पूरा करने में सक्षम है ? परन्तु यह भी सम्भव नजर नहीं आ रहा क्योंकि सरकारी तंत्र इसमें भी असफल है । नेपाल की सम्पूर्ण जनता के हाथों में एक तो मसौदा पहुँचा नहीं है और अगर पहुँच भी गई तो इसका कोई अर्थ नहीं है । क्योंकि इन सुझावों पर कार्यान्वयन होने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं पड़ती । एक मुहावरा है हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और । बस कुछ यही जलवा है अभी के परिदृश्य में । फिर भी उम्मीद पर दुनिया टिकी है, शायद नकारात्मकता में भी कुछ सकारात्मक हो जाय ।

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