Sat. Nov 17th, 2018

मधेश को संचार से दूर रखना ही राज्य अपना राष्ट्रवाद समझता है : कैैलाश महतो

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खुल्ले स्थान में सैकडों लोगों के सामने हुए सवाल जबाव का सही वार्तालाप बी.बी.सी जैसे शुद्ध और निष्पक्ष कहे जाने बाले विश्व प्रसिद्ध न्यूज कलेक्टर और मेकर संस्था भी लोगों के आवाज, भावना और विश्वास के साथ धोकाधरी और छेडखानी कैसे कर सकता है ?
मधेशी सहभागी प्रश्नकर्ताओं द्वारा उनके नागरिकता का औचित्य, राज्य में उनकी पहँुच और सहभागिता तथा डा.सि.के राउत के स्वतन्त्र मधेश अभियान के सम्बन्ध में पूछे गए प्रश्नों के जबाव में मधेश को वे अपने जीवन काल में नेपाल से अलग नहीं होने देने के दाबों को काट दी गयी ।

कैैलाश महतो,परासी, ११ फरवरी | संचार संदेश प्रवाहक होता है । समाज में घट रहे हर घटनाओं के बारे में सत्य तथ्य समाज और उसके सदस्यों को उपलब्ध करना, करबाना ही संचार का कला और कर्म होता है । सत्य चाहे जैसा भी हो ः सकारात्मक या नकारात्मक – उसके बारे में जानकारी देना ही संचार क्षेत्र का सही धर्म है । और हकिकत यही है कि कोई सत्य अपने आप में पूर्णतः सत्य नहीं होता, न कोई असत्य अपने आप में पूर्ण असत्य । कई ऐसे भी सत्य होते हैं जो सत्य को ही निगल जाते हैं तो कई ऐसे असत्य भी होते हैं जो सत्य के सहायक होकर उसे मजबूत बनाते हैं ।
नेपाली मीडिया अगर यह मानती है कि नकारात्मक समाचारों का प्रसारित होना संचारद्रोह, समाजद्रोह तथा राजद्रोह है तो खत्म हो चुके राजतन्त्र और उसके भूतपूर्व व्यतित्वों का चर्चा क्यूँ होता है ? तीन तिहाई के बहुमत से पारित धर्म निरपेक्षता को पराजित करने के उद्देश्य से हिन्दु धर्म का वकालत तथा उसपर जनमत संग्रह करने-करबाने की बात मीडिया द्वारा प्रचार प्रसार क्यूँ हो रहा है ? उदण्डों के भी मास्टर माइण्ड बिजेता ओली, गौतम, रावल, भट्ट, पोख्रेल आदि जैसे अन्ध राष्ट्रवाद के पाखण्डियों द्वारा मधेशियों को देशद्रोही, काले, बिहारी, पाकिस्तानी, विदेशी कहने बालों का समाचार सम्पे्रषण क्यूँ होता है ? नेपाली राज के गोली से मरने बाले मधेशियों को पेडों के सुक्खे पत्ते और मधेशियों के मानव श्रृंखला को “माखे साङ्गलो” नामक बेहुदे मन्तव्यों को संचार ने जगह क्यूँ दी ? दश वर्षे माओवादी जनयुद्ध के दौरान हुए असंख्य क्रुर हत्यायों का तस्वीरपूर्ण समाचार सम्प्रेषण क्यूँ हुए ? नेपाल के ही कुछ जिलों में आए आतंककारी भूकम्पों की तस्वीरपूर्ण समाचारों का फैलाव का कारण क्या रहा ? वे सब के सब नकारात्मक थे । लेकिन बढाचढाकर उन्हें प्रचार किया गया । क्यूँ… ? क्यूँकि वे नकारात्मक होते हुए भी लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में जागरुक करबाये ।
१७वीं शदी के चौथे दशक में ब्रिटेन के संसदीय सैनिक अधिकारी रहे ओलीवर क्रमवेल ने ब्रिटेन में फैले तानाशाही राजतन्त्र के खिलाफ बगावत कर दी । वे पूर्ण राजतन्त्र के विरोधी थे । राजतन्त्र का ही पूर्ण राज्य मानने बाले तत्कालिन राजा चाल्र्स प्रथम को सन् १६४९, जनवरी ३० के दिन सार्वजनिक स्थल पर फाँसी चढा दी गयी और लोकतान्त्रिक अभ्यास की शुरुवात हुई । चाल्र्स प्रथम को मौत की सजा के पिछे उनके अप्रजातान्त्रिक चरित्र के साथ संचार और साहित्य पर अनावश्यक रोक लगाने की थी ।

चाल्र्स के उन कदमों के विरोध और सत्य बातों के सम्प्रेषण के पक्ष में रहे ब्रिटेन के नामुद साहित्यकार जोन मिल्टन ने १६४४ में “एरोपेजटिका” नामक एक निबन्ध लिखा था । उस निबन्ध ने प्रजातन्त्रपे्रमी सरकार प्रमुख रहे क्रमवेल और मिल्टन के बीच नजदिकियाँ बढा दी, जिसके कारण क्रमवेल ने मिल्टन को सन् १६४९ के मार्च मेेंं विदेश विभाग का अधिकारीय जिम्मेवारी दी । लेकिन सन् १६५८ के अक्टूबर में हुए क्रमवेल के मृत्यु पश्चात् प्रजातान्त्रिक शासन के असफलता के कारण चाल्र्स द्वितीय को सन् १६६० मई ३० के दिन पूनः राज्यरोहण कराया गया ।
३१ जनवरी, २०१७ के दिन बी.बी.सी नेपाली सेवा द्वारा नवलपरासी के कावासोती में रखे गए साझा सवाल कार्यक्रम में मुख्य अतिथियों के रुप में सहभागी रहे जिला के चर्चित कहे जाने बाले दो नेता द्वय ह्रृदयेश त्रिपाठी और शशांक कोइराला से मधेशी और नेपाली दोनों समुह के समान्य लोगों द्वारा अनेक सवाल की गयी थी । बी.बी.सी नेपाली सेवा के खुल्ले उस कार्यक्रम में मधेश के तरफ से सहभागी लोगों के सवालों का वहाँ मौजुद दोनों नेताओं ने गैरजिम्मेबार और पाखण्डपूर्ण जो जबाव दिया था, बी.बी.सी साझा सवाल कार्यक्रम चलाने बालों ने सारे जबावों को हटाकर अगले आइतबार और सोमबार फेब्रुअरी ४ और ५ कोे प्रसारित किया ।
खुल्ले स्थान में सैकडों लोगों के सामने हुए सवाल जबाव का सही वार्तालाप बी.बी.सी जैसे शुद्ध और निष्पक्ष कहे जाने बाले विश्व प्रसिद्ध न्यूज कलेक्टर और मेकर संस्था भी लोगों के आवाज, भावना और विश्वास के साथ धोकाधरी और छेडखानी कैसे कर सकता है ?
मधेशी सहभागी प्रश्नकर्ताओं द्वारा उनके नागरिकता का औचित्य, राज्य में उनकी पहँुच और सहभागिता तथा डा.सि.के राउत के स्वतन्त्र मधेश अभियान के सम्बन्ध में पूछे गए प्रश्नों के जबाव में मधेश को वे अपने जीवन काल में नेपाल से अलग नहीं होने देने के दाबों को काट दी गयी । उन नेताओं के अभिव्यति तथा जबावों को काटकर बेअर्थ का साझा सवाल बाले कार्यकम को सार्वजनिक करना बी.बी.सी जैसे मीडिया के आदर्श के खिलाफ है ।
आश्चर्य की बात है कि जिसने कभी कोई नयाँ चीज बनाया ही नहीं, वो दावा करता है कि वह यह और वह होने ही नहीं देंगे ।
नेपाली समाज को खुश करने के उद्देश्य को जिवित रखते हुए मधेशी समाज को उल्लू बनाने को ही अपना जित मानने बाले मधेशी नेताओं को मधेशी अब बखुबी समझ रही है । उन्हीं नेताओं के मिली भगत में साझा सवाल कार्यकम संचालकों ने मधेश विरोधी उनके धारणाओं को डिलिट किए जाने की मधेश में शंका हो रही है ।
वैसे वे नेता महाशय ने हमेशा दूसरों के आन्दोलन में ही अपना किस्मत को खोजने में बुद्धि लगायी है । संयोग से सिधे सादे मधेशी जनता उन्हें नेता भी मानती आयी है । उन्होंने न तो कभी कोई आन्दोलन की शुरुवात की, न कभी किसी मधेश आन्दोलन के दिक्कत भरी समयों में सहभागी ही हुए । वे हमेशा मधेश आन्दोलन को पहले गालियाँ देत हैं । जब मधेशी आगे बढने लगते हैं तो वे यह कहकर आन्दोलन में सुलभ यात्रा कर लेते हैं कि वे अपने काठमाण्डौं के संसद में मधेशियों के लिए लडते रहे । और बेचारे मधेशी जनता उनकी पंडित्याई और चतुराइयों में पडकर उनके नापाक इरादों के शिकार होते रहे हैं । आने बाले कल्ह में वे फिर वही करने बाले हैं ।
उनकी मजबुरी भी है कि वे मधेशियों के हित्त में नहीं लग सकते । क्यूँकि उनके सारे परिवार में मधेशी चेहरे के नाम पर केवल वे ही बाँकी रह गए हैं । उनको कहीं न कहीं डर यह जरुर है कि मधेश के आजादी के साथ कहीं उनके परिवार की बर्बादी न शुरु हो जाये । उनके अपने शरीर और चेहरे के अलावा उनके आन्तरिक तन, मन, वंश, संस्कृति आदि सब नेपाली जो हो चुके हैं–जिसे अब मधेशी समझने के करीब में हैं ।
हुलाकी न्यूज डटकम लगायत के संचार क्षेत्रों को उसके निष्पक्ष कर्म, धर्म और कार्यशैलियों के प्रति अनाहक के सवाल खडे करना उनके निष्पक्ष पत्रकारिता पेशा के साथ नाइन्साफी है । संयुत राष्ट्रसंघीय मानव अधिकार के बडापत्र, राष्ट्रिय तथा अन्तर्राष्ट्रिय संचार एवं पत्रकारिता क्षेत्र एवं पेशा, नेपाल के संविधान समेत द्वारा प्रदत्त मौलिक हक अधिकारों को कुण्ठित करना और अभिव्यति स्वतन्त्रता के विरुद्ध खडा होना पे्रस काउन्सिल जैसे लोकतान्त्रिक संस्था के मर्यादा विपरीत कार्य है । मधेश के साथ संचार में भी धोखा होना एक तरफ परम्परा सा बन गया है तो दूसरी तरफ मधेश को संचार से दूर रखना ही नेपाल अपना राष्ट्रवाद समझता है । जो यह थप प्रमाणित करता है कि मधेश और मधेशी नेपाल के नहीं हैं । इन आधारों पर भी मधेश को स्वतन्त्र होना अब अनिवार्य है ।
क्रमवेल द्वारा प्रतिपादित अभिव्यति स्वतन्त्रता, प्रेस स्वतन्त्रता, संसदीय स्वतन्त्रता तथा मतदान की स्वतन्त्रता के राजनीतिक विचारधाराओं को जर्ज तक स्वीकार किया था और अपनाया था । Oliver Cromwell के अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता, प्रेस स्वतन्त्रता, राजनीनितक सवतन्त्रता जैस विचारधाराओं को जर्ज वासिङ्गटन और नेपोलियन तक ने अपने राजनीति तथा व्यवहारों में उतारा था ।

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सर ! यह फोटो हमारे @aapanbirgunj के वाल से लिया गया है, यह हमारा एडिट किया हुआ फोटो है, शब्द हम भरे है फोटो पर । कुछ फोटो पर क्रेडिट दिए होते तो दिल खुस हो जाता ॥