Tue. Oct 16th, 2018

मधेश समस्या, समाधान की प्रतीक्षा में

संविधान संशोधन की प्रस्तावना पर एमाले का रुख सामने आ चुका है । एमाले संविधान संशोधन के विपक्ष में है और इसी नीति के तहत वो जनता के सामने हाजिर होने वाली है । बावजूद इसके सरकार ने घोषणा की है कि वो संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद में लाएगी ।


एमाले के विरोध का कोई स्पष्ट आधार नहीं है क्योंकि एमाले का भारत मोह भी कोई गोप्य बात नहीं है । भले ही आज महाकाली संधि के प्रखर प्रवर्तक और बारबार दिल्ली दौड़ने वाले केपी ओली भारत के विरोध में खड़े हों ।


परन्तु आज जब मधेश के सवाल पर भारत की ओर से कोई सवाल किए जाते हैं तो वह दखल हो जाता है । मधेश में भारत की दिलचस्पी लाजिमी है क्योंकि दो देशों की खुली सीमाओं की वजह से भारत की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो जाता है ।madheshi julus

डा. श्वेता दीप्ति
प्रधानमंत्री प्रचण्ड की सम्भावित भारत यात्रा से सम्बन्धित कई कयास लगाए जा रहे हैं । इस यात्रा से जहाँ उम्मीदों की कई सम्भावनाएँ हैं, वहीं आन्तरिक तौर पर देश के मुख्य पार्टी एमाले की असंतुष्टि भी । एक महीने के कार्यकाल में किसी महत्वपूर्ण कार्य की उपलब्धि प्रचण्ड सरकार के हिस्से में नहीं आई है । प्रदेश सीमांकन के मसले पर असंतुष्ट मधेश की अवस्था ज्यों की त्यों है । संविधान संशोधन की प्रस्तावना पर एमाले का रुख सामने आ चुका है । एमाले संविधान संशोधन के विपक्ष में है और इसी नीति के तहत वो जनता के सामने हाजिर होने वाली है । बावजूद इसके सरकार ने घोषणा की है कि वो संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद में लाएगी । सरकार का कहना है कि विपक्षी को मनाने का प्रयास जारी है । अगर विपक्षी नहीं मानते हैं, तो भी संविधान संशोधन विधेयक व्यवस्थापिका संसद में पंजीकृत करायी जाएगी ।

एमाले अध्यक्ष केपी ओली स्वास्थ्य लाभ के लिए बाहर हैं, जिसकी वजह से भी इस कार्य में कोई प्रगति नहीं हो पा रही है । वैसे संविधान संशोधन विधेयक निर्माण और सहमति के लिए दलीय विचार विमर्श एक ही साथ आगे बढ़ने की सम्भावना दिख रही है । इस विषय में प्रधानमंत्री प्रचण्ड के राजनीतिक सलाहकार चक्रपाणि खनाल ने जानकारी दी है कि, प्रधानमंत्री की भारत भ्रमण से पहले ही संविधान संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी परन्तु यह दावा किस आधार पर किया जा रहा है यह स्पष्ट नहीं है ।

आज भी यहाँ जो सत्ता से बाहर होते हैं, उनकी नीति भारत विरोधी वक्तव्यों में सिमट कर रह जाती है और सत्ता प्रवेश के साथ ही यह सुर बदल जाते हैं । क्योंकि सत्ता चलाने के लिए देश की ही नहीं विदेशी सहयोग की भी आवश्यकता होती है ।

दूसरी ओर संविधान संशोधन के विषय को लेकर एमाले माओवादी सरकार पर आक्षेप लगा चुकी है कि, वत्र्तमान सरकार बाहरी हस्तक्षेप के दवाब में यह विधेयक लाना चाह रही है यह गलत है और यह देश का आन्तरिक मामला है । एमाले के विरोध का कोई स्पष्ट आधार नहीं है क्योंकि एमाले का भारत मोह भी कोई गोप्य बात नहीं है । भले ही आज महाकाली संधि के प्रखर प्रवर्तक और बारबार दिल्ली दौड़ने वाले केपी ओली भारत के विरोध में खड़े हों । इधर अधिकार की लड़ाई लड़ रहे मधेश आन्दोलन पक्ष फिलहाल वत्र्तमान सरकार के प्रति आशावादी हैं । एक उम्मीद है उन्हें कि माओवादी सरकार मधेश की माँग को अवश्य सम्बोधित करेगी । हालाँकि सरकार ने इस ओर पहल शुरु कर दी है । किन्तु इसमें तीव्रता नहीं आ पाई है । प्रधानमंत्री कार्यालय का सारा ध्यान फिलहाल भारत यात्रा और उसके एजेन्डे पर टिका है ।
नेपाल–भारत सम्बन्ध और प्रचण्ड नीति
नेपाल भारत सम्बन्धों की चाहे कितनी भी आलोचना हो जाय । इस सम्बन्ध पर बोलने या लिखने वालों को चाहे कितनी भी गालियाँ दी जाय या राष्ट्रविरोधी माना जाय, किन्तु यह अकाट्य सत्य है कि पड़ोस में भारत की जगह अमेरिका भी होता तो रिश्ते बनाने की बात होती बिगाड़ने की नहीं । भारत में चाहे सरकार किसी की भी हो, भारतीय दिलचस्पी नेपाल में कायम रहने वाली है । नेपाल और भारत दोनों लोकतांत्रिक देश हैं । आज की स्थिति में भारत यह अच्छी तरह जानता है कि किसी भी देश में अनावश्यक दखल न तो की जा सकती है और न ही की जानी चाहिए । किन्तु नेपाल की राजनीति की धार बदल नहीं पाई है ।

आज भी यहाँ जो सत्ता से बाहर होते हैं, उनकी नीति भारत विरोधी वक्तव्यों में सिमट कर रह जाती है और सत्ता प्रवेश के साथ ही यह सुर बदल जाते हैं । क्योंकि सत्ता चलाने के लिए देश की ही नहीं विदेशी सहयोग की भी आवश्यकता होती है । ज्यादातर नेपाली नेताओं की यह धारणा है कि भारत उनके आन्तरिक मामले में दखल देता आया है और दे रहा है । सच तो यह है कि जब सहयोग प्राप्ति के लिए नेपाल भारत से आशान्वित होता है तो वह सिर्फ सहयोग होता है किन्तु, वक्त के साथ ही यह भावना किनारे लग जाती है और इसी सहयोग को दखल का नाम दे दिया जाता है । नेपाल के इतिहास में जब भी कोई ऐतिहासिक परिवत्र्तन हुआ है तो भारतीय सहयोग अपेक्षित रहा है । विगत में माओवादी को राजनीति की मूलधार में लाने में भी भारत ने ही मध्यस्थता की थी ।

मसला तो यह भी नितांत आन्तरिक था, किन्तु उस वक्त भारत का हस्तक्षेप मध्यस्थता मानी गई, दखल नहीं । परन्तु आज जब मधेश के सवाल पर भारत की ओर से कोई सवाल किए जाते हैं तो वह दखल हो जाता है । मधेश में भारत की दिलचस्पी लाजिमी है क्योंकि दो देशों की खुली सीमाओं की वजह से भारत की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो जाता है । जहाँ तक चीन के साथ सम्बन्धों की बात की जाय तो, जाहिर है कि नेपाल का सहयोग चीन भी कर रहा है । उसकी नेपाल में दिलचस्पी का कारण भी जगजाहिर है ।

भारत के बढ़ते कद से चिंतित चीन खुले तौर पर पाकिस्तान की सहायता कर रहा है और नेपाल में अपना विस्तार खोज रहा है और यही वजह है कि यहाँ की सरकार में दिलचस्पी उसकी भी है । क्योंकि माना जा रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री ओली का सत्ता से बाहर जाना चीन के पक्ष में नहीं है क्योंकि पर्दे के पीछे से कहीं ना कहीं चीन का सहयोग एमाले को प्राप्त था । परन्तु मजे की बात यह है कि यह सहयोग है, दखल नहीं । वैसे नेपाल में चीन के लिए तुरुप का पत्ता सम्भवतः अभी भी मौजूद है क्योंकि राजधानी में चीनी राजदूत वू चुनताई और प्रधानमंत्री प्रचण्ड की मुलाकात में उन्हें यह आश्वासन दिया गया है कि एमाले सरकार ने जो भी सहमति चीन से की है उसे कार्यान्वय किया जाएगा । यह वत्र्तमान सरकार की दूरदर्शिता मानी जाएगी । क्योंकि नेपाल के लिए उसके दोनों पड़ोसी महत्वपूर्ण हैं ।

बस खयाल यह रखना है कि, इन दोनों को एक दूसरे के विरोध में या किसी की भावना को भड़का कर विकल्प के तौर पर प्रयोग ना किया जाय । प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि “पहली बार जब मैं प्रधानमंत्री बना था तो मुझे ज्यादा अनुभव नहीं था और तब मैंने गलतियाँ की होंगी, लेकिन अब स्थितियाँ अलग हैं ।” इस उक्ति से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रधानमंत्री की विदेश नीति पूर्वाग्रह से प्रेरित नहीं होगी और वो एक सफल कूटनीतिज्ञ के रूप में स्वयं को स्थापित कर पाएँगे ।
भारत भ्रमण और सम्भावित ऐजेण्डा
आगामी १५ सितम्बर से १८ सितम्बर को प्रधानमंत्री प्रचण्ड की भारत यात्रा तय हो चुकी है । भारत यात्रा के दौरान किन विशेष मुद्दों पर नेपाल भारत का ध्यान आकर्षित करेगा इस पर गृहकार्य शुरु हो चुका है । किन्तु स्वयं प्रधानमंत्री प्रचण्ड का कहना है कि यह यात्रा सद्भावना यात्रा है जिसमें दोनों देशों के बीच विगत में हुई तल्खी को दूर करते हुए दोनों देश के सरकारों के बीच विश्वास का वातावरण बनाने की कोशिश और भारत के सहयोग में देश के विकास हेतु सहकार्य बढ़ाने की पहल की जाएगी ।

कुछ विषय हैं मसलन, ऊपरी कर्णाली अरुण जलविद्युत आयोजन की अवस्था, पूर्व–पश्चिम विद्युतीय रेलमार्ग की सम्भाव्यता अध्ययन सम्बन्धी विषय का कार्यान्वयन, नौमुरे जलविद्युत योजना निर्माण या इसका विकल्प खोजने का प्रस्ताव, पंचेशवर के डीपीआर में अन्तिम निर्णय, दो देशों के बीच विद्युतीय प्रसारण लाइन निर्माण की प्रगति, हुलाकी सड़क निर्माण की अवस्था, भूकम्प पीड़ितों के घर पुनर्निर्माण सम्बन्धी भारतीय सहयोग का कार्यान्वयन और अधिक सहयोग की अपेक्षा, सीमावर्ती क्षेत्र में भारत द्वारा बनाए गए बाँध से सृजित समस्या समाधान के लिए संयुक्त रूप से टीम का गठन और भारत के सहयोग से बनने वाले प्रहरी एकेडमी के निर्माण की बातों पर भारत का ध्यानाकर्षण इस यात्रा के दौरान कराए जाने की सम्भावना है ।

प्रधानमंत्री फिलहाल किसी दीर्घकालीन विषय में जाने के इच्छुक दिखाई नहीं दे रहे हैं । उन्हें पता है कि वत्र्तमान में जो चुनौतियाँ उनके सामने हैं फिलहाल उनका निवारण ही ज्यादा आवश्यक है, क्योंकि समय कम है और काम अधिक । जनता के समक्ष उदाहरण बनने के लिए महज बातों की नहीं बल्कि कार्यान्वयन की आवश्यकता है इस सच्चाई से प्रधानमंत्री पूरी तरह से अवगत हैं ।

मधेश समस्या, समाधान की प्रतीक्षा में

मधेश की नजरें सरकार की कार्यदिशा पर टिकी हुई हैं । गुजरे समय में इस वक्त मधेश की मिट्टी लहुलुहान हो रही थी । इस दर्द को आज भी वहाँ की जनता भूली नहीं है । आज भी एक तबका है जो पूरी तरह काँग्रेस, एमाले और माओवादी को मधेश की मिट्टी से बहिष्कृत करने के मिजाज में है । क्योंकि इन तीनों बड़ी पार्टियों ने संविधान निर्माण के नाम पर जो पीड़ा मधेश को दिया है उसे नजरअंदाज करना मधेश की मिट्टी के साथ बेईमानी होगी ।

एमाले अपनी नीति को बदलने के मूड में नहीं है यह तो स्पष्ट हो चुका है, किन्तु यही वह समय है जब काँग्रेस और माओवादी, मधेश को पूरी तरह तो नहीं किन्तु आंशिक तौर पर अपने पक्ष में ला सकती है । मधेशी, थारु, मुस्लिम, आदिवासी इनके अधिकार और पहचान के लिए लम्बे समय से मधेश आन्दोलनरत है और वर्षों से सरकार की विभेद नीति का शिकार भी होता आया है । मधेश की मुख्य माँग प्रदेश का सीमांकन, जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र का पुनर्निधारण, न्यायपालिका का प्रादेशिक व्यवस्था के अनुसार अधिकार का निक्षेपण तथा आर्थिक अधिकार है । कई विरोधाभास हैं जिनका निवारण आवश्यक है ।

वत्र्तमान संविधान के अनुसार सम्पूर्ण राजस्व या कर के प्रयोग का अधिकार केन्द्र में निहित है । इसी तरह शान्ति सुरक्षा के विषय में भी सशस्त्र प्रहरी का नियन्त्रण और व्यवस्थावन केन्द्र के ही जिम्मे है । स्थानीय निकाय को प्रदेश के समानान्तर अधिकार देने की व्यवस्था होने पर प्रदेश निष्प्रभावी हो जाता है, इस अवस्था में प्रदेश के पास कोई शक्ति ही नहीं रह जाती है । ऐसे ही कई मसले हैं जिनपर गहनता के साथ चर्चा और कार्यान्वयन की आवश्यकता है ।
वैसे सतही तौर पर आज के परिप्रेक्ष्य में मधेश राह देख रहा है, विकास की । अगर सत्ता मधेश की समृद्धि के लिए पुख्ता योजना लाए उसका कार्यान्वयन करे, देश के हर निकाय में समानता का अधिकार दे और मधेशी भी इस देश के ही नागरिक हैं यह अहसास करा दे तो असंतुष्ट मधेश इन्हें फिर से अपनाने में गुरेज नहीं करेगा ।
फिलहाल तो यह देखना है कि दो विभिन्न धार की गठबन्धन सरकार देश को किस ओर लेकर जाती है । अल्प अवधि में किसी क्रांतिकारी परिवत्र्तन की अपेक्षा तो नहीं की जा सकती है, क्योंकि यह देश और इस देश के नेता राष्ट्रीय हित से अधिक व्यक्तिगत हित को महत्त्व देते रहे हैं । इस वजह से नयी गठबन्धन की नाजुकता चिंता को जन्म देती है क्योंकि भले ही माओवादी पार्टी संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उसे ५९६ सदस्यों वाली संसद में बचे रहने के लिए उसकी शक्ति से दोगुनी से भी ज्यादा संख्या रहने वाली नेपाली काँग्रेस की साथ और सहमति की आवश्यकता हर क्षण है ।

इसका फायदा काँग्रेस जरुर लेना चाहेगी और बिना जवाबदेही के ज्यादा अधिकार जाहिर कर सकती है । सरकार के सर पर तलवार लटकी हुई है क्योंकि, कभी भी किसी बहाने से काँग्रेस समर्थन का हाथ खींच सकती है । लेकिन प्रचण्ड इन सारी चुनौतियों का सामना करने के मिजाज में नजर आ रहे हैं । देश के विकास के लिए स्थायीत्व की आवश्यकता है इस सच्चाई को देश के भविष्य को तय करने वाले नेताओं को शीघ्र ही समझ लेना चाहिए । तभी नेपाल की नियति बदल सकती है । व्

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गजेन्द्र पाटीदार

बहुत सटीक लिखा है, मधेशी अंचल को सदैव उपेक्षित रखे जाने के कारण नेपाल मुख्य धारा से तोड़कर प्रगति ननही कर सकता!