Mon. Dec 17th, 2018

मनोहर के हत्यारों को सजा कब मिलेगी ? : रणधीर चौधरी


नेपाल मे बालात्कार की घटनाओ की बढोतरी तो होही रही है । अब ‘कस्टडियल डेथ’ भी बढने लगा है । खबर अनुसार कुछ ही रोज पहले बाँके जिला के एक पुलिस हिरासत मे राम मनोहर यादव नामक युवा को चरम यातना दिया गया । समय मे उपचार न होने के कारण यादव का मौत हो गया । इसी घटना को ले कर काठमाण्डु के माइतीघर मण्डला मे बरिष्ठ पत्रकार, नागरिक समाज एवं लेखक ने इस हत्या का बिरोध जताया और घटना के छानबिन के लिए आवज बुलंद किया ।


परंतु इस घटना मे सनसनी अन्तर्य भी है जिसकी चर्चा लाजमी है । कहा जाता है की, राम मनोहर स्वतन्त्र मधेश गठबंधन से जुडे युवा थे । उनकी गिरफ्तारी से एकरोज पहले एक मधेशवादी दल के मुखिया पश्चिम मधेश गए थे । वहा पर कुछ युवाओ ने उनको प्रजातन्त्रीक मान्यताओ का लुत्फ उठाते काला झण्डा दिखाया और संबिधान संसोधन करबाने मे असफल होने का सच्चाइ उनके सामने रखदिया । उसके बाद सत्ता से प्राप्त शक्ति के उन्माद मे सुरक्षाकर्मी को कह कर गिरफतार करबाया था कुछ युवाओ को । उसी मे से एक था राम मनोहर जिसने सच बोलने का दुस्साहस किया था ।
कैसे कोइ नेता इतना तानाशाह हो सकता है खासकर गणतान्त्रिक देश मे ? कैसे कोई सुरक्षाकर्मी दरिंदगी का चरम सिमा पार कर सकता है ? गंभिर सबाल है ।
नेपाल के संबिधान जो अभी भी सर्वस्विकार्य नही हो पाया है । उसी संबिधान के धारा २२ मे लिखा गया है की किसी भी व्यक्तिको हिरासत मे ले कर यातना नही दिया जा सकता है । और इसी महिने से लागु किया गया फौजदारी संघिता के आधार पे यातना को अपराध के रुप मे परिभाषित किया गया है । तो कानुनी हिसाब से राम मनोहर के उपर अपराधिक हमला किया गया है, आमजन का बुझाई है । देखना यह है की नेपाल के न्यायिक क्षेत्र इस घटणा को कितना संबेदनशिलता से लेती है । हला की जिस तरह से अभीतक इस घटणा को ले कर कोर्ई न्यायिक छानबिना वा चार्जसिट दायर नही किया गया उस्से तो साफ पता चलता है की राम मनोहर नाम का एक ‘मधेशी का मौत’ हुवा है, न की देश के नागरिक का । वास्तव मे कहा जाय तो यह घटणा गणतान्त्रिक नेपाल मे काला धब्बा तो है की और मधेश के राजनिती मे भी इसका असर दिखेगा÷दिखरहा है । मधेश मे उदयमान एक एसी शक्ति जिस्से राज्य को परेशानी है । अब इस घटणा के बाध काठमाण्डु की परेशानी की आयतन बढना अवश्यमभावी है ।



इसी घटणा के बाध नेपाली स्थाइसत्ता का रबैया भी अजिब सा है । स्थाइसत्ता का एक अहम पहलु अर्थात अपने आपको राष्ट्रिय मिडिया कहलाने बाली पत्रिका एवे टेलिविजन के सम्पादको का कठोर और नश्लिय मौनता का जवाव नही । मनोहर की हत्या के बारे मे हरे पत्रिका मे सम्पादकिय आना उनकी नैतिक धर्म माना जाता । परंतु उन्हो ने नैतिकता को तिलांजली देना अपना धर्म ठान लिया । यहाँतक की राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग के औचित्य पे एकबार फिरसे संसयपुण प्रश्नवाचक चिन्ह लगा है । आखिर आयोग की नेपाल मे उपस्थिती का महसुस क्यूँ नही किया जाता है ?
अन्त्य मे, इस घटणा का उचित न्यायिक छानबिन किया जाय । नही तो दण्डहिनता की पराकाष्ठा बढेगी । मधेशवादी दल जो की सत्ता के दलदल मे फसचुके है उनको इस घटणा के बारे मे अनुशनधान करबाने की लिए राज्य पक्ष को दबाब देना चाहिए । कितनी सर्म की बात है अभी तक अपने आप को मधेशवादी दल के रुप मे चित्रित कर रहे नेताओ ने इस दर्दनाक एवं ‘कस्टडियल डेथ’ को ले कर एक बिज्ञ्प्ती तक निकाल्ने का नैतिकता नही दिखाया है । कहाजाता है की अगर किसी नेता मे सत्ता शक्ति का उन्माद चढ जाता है तो वै कुछ नही समझते । अपने नागरिक एवं करदाता को सिफ ‘भोटर’के रुपमे देख्ने लगते है । और कहा यह भी जाता है की शक्ति का उन्माद लम्बे समय नही चलता । खासकर जिस देश मे कानुन को दिन दहाडे उल्लंघन होता हो, नागरिको का हत्या होता हो वहा आमजन एकजुट होने मे वक्त नही लगाते । और एकजुट हो बडे से बडे तानाशाह को उखाड फैँकते है । देख्ना है मनोहर को न्याय मिलता है या नही ?

रणधीर चौधरी , स्वतंत्र लेखक

 

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