Thu. Nov 15th, 2018

महानायक पृथ्वीनारायण शाह और वीर सपुतों को याद किया गया

Pirthabi N. Partishthanनेपालगन्ज,(बाँके), पवन जायसवाल
नेपाल को एकीकरण करने वाले महानायक पृथ्वीनारायण शाह और वीर सपुतों को आज की गणतान्त्रिक माहो पूर्वाग्रही ढङ्गों से भूलने और भूलाने की कोशीस हो रही है । इसके प्रति वुद्धिजीविओं ने एक कार्यक्रम में असन्तुष्टी प्रकट किया है ।
पृथ्वी नारायण शाह अध्ययन प्रतिष्ठान के द्वारा नेपालगन्ज में आयोजित वर्तमान समय में प्रजातन्त्र और राष्ट्रीय एकता की प्रश्न विषयक विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने पार्टी, संगठन, क्रान्ति, परिवर्तन और आन्दोलन से भी बडा राष्ट्र होता है, लेकिन अभी की राजनीति ने राष्ट्रवादी भावनाओं की अभिवृद्धि करने की वजाय  राष्ट्रीय चिन्तन को कमजोर करने में लग रहे है इसके प्रति चिन्ता प्रकट किया ।
गोरखा–पत्र दैनिक के पूर्व सम्पादक तथा राष्ट्रवादी विचार धारा के युवराज गौतम ने पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल को एकीकरण करके महान कार्य किया लेकिन आज कल तो उन्हों ने जो किया उस को अपराध किया जैसे चित्रण करो की प्रवृत्ति से नेपाल की राष्ट्रीय एकता को कमजोर बना रहे उस तर्फ चिन्ता प्रकट किया था । उन्हों ने पृथ्वी जयन्ती को नेपाल को मुख्य राष्ट्रीय पर्व के रुप में मनाने की सरकारी तवर से ही घोषणा होने के लियें माग किया ।
स्वतन्त्र प्रजातान्त्रिक वुद्धिजीवी दिनेशप्रसाद श्रेष्ठ ने नेपाल सरकार ने बेलायत से दौत्य सम्बन्ध कायम हुआ दो सौ शतवार्षिकी मनाने कीे तयारी प्रति व्यङ्ग करते हुयें नेपाल ने बेलायत को नालापानी युद्ध में हराया दो सौ शतवार्षिकी को विजय उत्सव के रुप में भी मनाने के लियें ाग किया ।
इसी तरह त्रिभुवन विश्वविद्यालय सिनास के उप–प्राध्यापक पेशलकुमार निरौला, महेन्द्र बहुमुखी क्याम्पस नेपालगन्ज के पूर्व क्याम्पस प्रमुख चोलराज शर्मा, बुद्धिजीवि डा.डी.पी. अत्री ने नेपाल की इतिहास, परम्परा तथा संस्कृतिया“ को कमजोर बनाने की खेल बन्द करके सब से पहले देश को रखकर आगे बढ्ने के बातों पर जोड दिया । गोविन्द पहाडी ने सञ्चालन किया कार्यक्रम में अधिवक्ता प्रल्हाद बहादुर कार्की, पूर्वसभासद् मोहम्मदी सिद्दिकी और एमाले बा“के नेता रामचन्द्र आचार्य लगायत लोगों ने भी अपना– अपना विचार व्यक्त किया था  ।
सभापति के आसन से स्वतन्त्र वुद्धिजीवि डा. जनार्दन आचार्य ने जिस ने यह देश को निर्माण किया, उस को भूmलना खूद अपनों को भूलना है कहते हुयें पृथ्वीनारायण शाह को इतिहास के किताबों से हटाकर प्रचण्ड, मदन भण्डारी, सुशील कोइराला, माधव नेपाल जैसे नेताओं को समावेश करने से देश की गौरवशाली इतिहास के उपर अन्याय होगा । राष्टी«यता मजबूत नही हुआ तो प्रजातन्त्र और गणतन्त्र भी मजबत नही हो पाएगा उन लोगों का तर्क था ।

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