Thu. Nov 22nd, 2018

महान कवि राम इकबाल सिंह ‘राकेश ‘ की 107वीं जयंती पर शत शत नमन

जिस मिट्टी की महक और खुशबू में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित गेंहूं और गुलाब जैसे चिंतकपरक और मानवोपयोगी निबंध रचे गये,भला वहां मानवतावाद के मजबूत रस्से से बंधा कवि मनकैसे छायावाद की हिचकियों को तोड़ने के लिए गंगाजल की तलाश करता..इसलिए तो कवि लिखता है कि..’पिघल उठे यदि अंतर मेरा..उद्वेलित अनजान में..गंगा,यमुना फूट पड़े ..जग के रेगिस्तान में’.।

ललन चाैधरी

 

१४ जुलाई

आया बसन्त, खुल पड़ीं रंग की झीलें,
बिखरे झूमके प्रसूनों के रंगीले।
तुम जाओगे जीवन के दुर्गम पथ पर,
गुंजानशून्य अम्बर में ऊपर, ऊपर।
ओ परदेशी वारुणकुमार, तू मत जा,
दुर्लभ है मधुर मिलन का क्षण, तू मत जा!

साहित्येतिहास के विराट फलक पर दृष्टिपात करने से कई ऐसे गुमनाम कवि और कथाकार की भटकती हुई आत्मा से साक्षात्कार होता है,जिसे तत्कालीन साहित्य के पुरोधा और स्वनाम धन्य साहित्यकारों ने पहचानने में बड़ी भूलकर मानवतावाद के पोषक,विचारक और उसके काव्यसिद्धांतों की खिल्ली उड़ाई है..साहित्य और इतिहास.के मिलन का सबसे दुखद बिंदु यह है कि अतीत की स्मृतियों को जब साहित्य वर्तमान में देखता है ,तो एक बड़ी दुविधापूर्ण स्थिति पैदा होती है ..जो साहित्यकोश के लिए बड़ा ही गंभीर सवाल छोड़ जाता है..पहला कि जो सामर्थ्यवान आलोचक या समालोचक इस पर अपने कार्यरूप को अंजाम दे रहे थे,वे एक पक्षीय जीवन को देखने के अभ्यासी थे..एकाकी जीवन था उनका..साहित्य में यह दुर्योग माना जायेगा कि अज्ञेय जैसे महान दृष्टिसंपन्न,सफल कवि,उपन्यासकार,विचारक और कुशल समालोचक की दृष्टि ऐसे कवि पर कभी न पड़ी जो तारसप्तक जैसे काव्य ग्रंथ को संपादित कर रहे थे..अज्ञेय पर यह आरोप अन्य कवियों द्वारा लगाए जा चुके हैं ,लेकिन जब अज्ञेय से कुछेक कवियों को शामिल न करने का कारण पूछा गया तो वे अक्सर मौन हो उत्तर देते थे.. अज्ञेय के मौन में बड़ी शक्ति होती है,लेकिन बड़ी सच्चाई यह है कि तारसप्तक के दूसरे भाग में कुछेक कवियों की कविताएं संख्या में अधिक हैं और उनमें से कुछ कविताएं कमजोर भी..कमजोर का भाव या वास्ता यहां साहित्य की उस जमीर एवं सच्चाई से है ,जो समाज को सही दिशा में गति देकर उस जगह ला खडा़ करता है जहां इंसानियत हो,मानवता की पुकार है और आदमी की पहचान हो,साथ साथ स्वस्थ जीवन शैली की पहचान हो..कई ऐसे विरल कवि जो अपनी कविताओं से शीर्ष पर उस समय माने जाते थे और उनकी कविताओं को पहचान तब मिली जब हम सरीखे क्षेत्रीय लोग और प्रबुद्ध समाज के खास वर्ग उनकी कविताओं से अपनी आवाज और अपनी शान दिखाने के लिए उस भीड़ में खड़े हुए जहां साहित्य की एक आंख राजनीति की तीर से घायल हो चुका था और दूसरी की रोशनी मार्ग से भटक जाने के वजह से मंद पड़ रही थी..गोया डा.सुधांषु के इस कथन में दम है कि जब छायावाद अपने अवसान पर संताप कर रहा था ..मार्क्सवाद के चेहरे पर झुर्रियां लौटने लगी थी ,फासिज्म के उठापटक के बीच मानव कराह रहा था तब राकेश जैसे महान कवि का अभ्युदय विराट हिंदी काव्यजगत में उस रूप में हुआ जब कविता के लिए यह संक्रमण का दौर चल रहा था कि कौन सी राह उसे मुक्ति दिला पायेगी..!तब मानवता का शंखनाद करता हुआ यह कवि अपनीअंतरात्मा से कविता की प्रबल और आवेगमयी धाराओं से तमाम कंटीली ,पथरीली,अवरोधों, झाड़ियों,पत्थरों,कंकड़ो और रोड़े को मार्ग से हटाकर मानवता का मार्ग प्रशस्त किया था.।नमन है ऐसे महान सपूत को जिसे बिहार की गौरवमयी धरती ने जन्म दिया.. मुजफ्फरपुर जिले के एक छोटे से भदई गांव मे.. धन्य है वह गांव!उनकी कविता को पढ़ते हुए इस सच से कौन भाग सकता कि वे ऐसे कवि थे जिनकी कविता में शब्द स्वयं गवाह होते थे..शब्दों की अपनी गरिमा और ताकत थी..कल्पना उनकी कविताओं में आती भी थी तो केवल एक हल्की मुस्कान लिए..लेकिन कवि हृदय उसे यथार्थवाद की जमीं पर आने नहीं देता..इसलिए तो डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे प्रखर साहित्येतिहास की गहरी समझ रखनेवाले उनके बारे में लिखने से बाज नहीं आए..उनका यह कथन उनके लिए..कितना अर्थपूर्ण और मायने रखता है उन्हें साहित्याकाश में सम्मानजनक स्थिति में बनाये रखने के लिए…”इतिहास और राजनीति हमें बार बार याद दिलाते हैं कि मनुष्य कितनी बार हारा है,थकाहै..” राकेश जैसे कवि का थकना और हारना एक अलग अर्थ रखता है…. सच में दुनिया की सबसे बड़ी हार साहित्य जगत की है..जब किसी महानकवि को कोई दरकिनार कर देता है..राकेश जैसे कवि को दरकिनार करने का अर्थ है मानवता के साथ अन्याय..अगर दूसरी भाषा में कहें तो हम प्रभाकर माचवे के उस कथन को और आगे बढ़ाना चाहते हैं कि अगर ईमानदारी पूर्वक अज्ञेय द्वारा संपादित “तार सप्तक ” का संशोधित और परिवर्द्धित रूप देकर दूसरा तारसप्तक निकालने की पहल हो तो पहला नाम राकेश का होगा..हमसे कुछ जो साहित्य की समझ ज्यादा रखते हैं तो उनसे कहना चाहूंगा कि जिस मिट्टी की महक और खुशबू में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित गेंहूं और गुलाब जैसे चिंतकपरक और मानवोपयोगी निबंध रचे गये,भला वहां मानवतावाद के मजबूत रस्से से बंधा कवि मनकैसे छायावाद की हिचकियों को तोड़ने के लिए गंगाजल की तलाश करता..इसलिए तो कवि लिखता है कि..’पिघल उठे यदि अंतर मेरा..उद्वेलित अनजान में..गंगा,यमुना फूट पड़े ..जग के रेगिस्तान में’.यह रेगिस्तान मानवता की सूख रही धरा है…जहां हरियाली यानि अपनेपन का बोध विलुप्त हो रहा है..तब कवि अपनी कविता के हृदयकोश से गंगा और यमुना की धारा को फूटने की कल्पना करता है..।लेकिन यह कल्पना यथार्थ से अधिक जीवंत है..जो सदियों से कविहृदय की प्यास को बुझाती है.. महान कथासम्राट प्रेमचंद की पारखी दृष्टि ने महान कवि राम इकबाल की जीवनदृष्टि से एक ऐसी धारा खोज निकाली और हंस के कई अंकों में उसे जगह देकर युगों युगों तक लोगों के बीच बहने को सतत एक दिशा दे दी ताकि राम इकबाल कवि राकेश के नाम से जाना जा सके..जो साहित्यकार अपनी मिट्टी की महक और खुशबू में साहित्य के पौधे लगाता है ,उसे कोई भी आंधी उड़ा नहीं पाती..राम इकबाल सिंह राकेश ऐसे ही कवि थे… मैंने जब मुजफ्फर के एक ख्यातिप्राप्त इन्टर स्तरीय विद्यालय में प्राचार्य का सम्मानजनक पद संभाला था, तो सबसे पहले मैंने उस विद्यालय में कार्यरत विद्वान शिक्षक डा. सुधांषु से बातचीत की,तो इस दौरान पता चला कि वे एक लेखक भी हैं और साहित्य की गहरी समझ रखते हैं..मेरा मानना है कि अगर भदई गांव की मिट्टी में साहित्य की खुशबू हैं तो समय दर समय महान कवि राकेश जैसे और भी पैदा होते रहेंगे..यह विश्वास है मेरा..। ..और अंत में मानवता के पुजारी सफल एवं दृष्टिसंपन्न कवि,कथाकार,निबंधकार और सफल गद्यकार राम इकबाल सिंह ‘राकेश’ की 107वीं जयंती पर कोटि कोटि नमन!

चिन्ता नहीं हो!
टूटे बवण्डर, चिन्ता नहीं हो!
गरजे समुन्दर, चिन्ता नहीं हो!
बरसे अंगारे, चिन्ता नहीं हो!
हिम्मत न ढीली तेरी कभी हो!
चिन्ता नहीं हो!

लेखक ललन चाैधरी प्रसिद्ध समीक्षक अाैर साहित्यकार अाैर उपन्यासकार हैं ।

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