Sat. Sep 22nd, 2018

मिथिलांचल के सबसे प्रसिद्ध नेता कोशी पुत्र ’ ललित नारायण मिश्र की पुण्यतिथि

माला मिश्रा  बिराटनगर । कोसी पुत्र ’ ललित नारायण मिश्र की पुण्यतिथि है. जाने के 43 साल बाद भी वे मिथिलांचल के सबसे प्रसिद्ध नेता माने जाते हैं. इंदिरा गांधी के दौर में देश की मुख्य राजनीति में उनका बड़ा दखल था. कई लोग उन्हें राजनीति का चाणक्य और संजय गांधी का राजनीतिक गुरु तक बताते रहे हैं. मिथिलांचल का समाज आज भी उन्हें विकास पुरुष के तौर पर देखता है. उन्होंने इस इलाके में रेल का जाल बिछाया और अपने तरीके से कोसी की बाढ़ का समाधान भी करने की कोशिश की. हां, यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि मिथिला पेंटिंग को बढ़ावा देने और रेलगाड़ियों और रेलवे स्टेशनों तक पहुंचाने की परंपरा उन्होंने ही शुरू की थी.

आज के दिन उनकी एक बम धमाके में असामयिक मृत्यु हुई थी, जिसे कई लोग राजनीतिक हत्या भी बताते रहे हैं. इसकी जांच और केस मुकदमे में काफी वक्त लगा. 2015 में कुछ लोगों को सजा भी सुनायी गयी. मगर यह जांच और उसकी वजह से सुनायी गयी सजा कितनी मुकम्मल थी, यह विवाद का विषय है ।

कोसी की विनाशलीला एवं बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी को नियंत्रित कर मिथिलांचल एवं कोसी के पिछड़े क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा के समक्ष लाने वाले ललित नारायण मिश्र की हत्या आज ही के दिन समस्तीपुर में कर दी गयी. जिस समय उनकी हत्या की गई वे बिहार के नव निर्माण में जुटे हुए थे. राष्ट्रीय एवं बिहार की राजनीति के पुरोधा ललित बाबू राजनीति में प्रखर नेता, सांसद तथा केंद्रीय मंत्री के रूप में, मार्गदर्शक के रूप में बहुमूल्य योगदान के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे.

सुपौल जिले के बसावनपट्टी में इनका जन्म दो फरवरी 1922 को बसंतपंचमी के दिन हुआ था.

वे 1952 में पहली बार दरभंगा-सहरसा सयुंक्त लोकसभा से सांसद चुने गए. इसी कार्यकाल में इन्होंने कोसी की विभीषिका से लोगों को त्राण दिलाने का पहला प्रयास किया, जिस कारण कोसी परियोजना को स्वीकृति मिली. 1954 से 56 तक कोसी परियोजना और भारत सेवक समाज के वे सर्वेसर्वा रहे. इसी दौरान इस परियोजना की आधारशिला रखवाने हेतु कोसी की धरती पर पंडित जवाहर लाल नेहरू एवं नेपाल के तत्कालीन महाराजधिराज महेंद्र वीर विक्रम शाहदेव को लाने का श्रेय उन्हीं को ही जाता है. वे पहली, दूसरी और पांचवी लोकसभा के सदस्य रहे. 1964 से 66 तक और 1966 से 1972 तक राज्यसभा में सदस्य भी रहे. इस दौरान इन्हें रेल मंत्रालय और विदेश मंत्रालय का भी कार्यभार संभालने का मौका मिला.

1973 में रेल मंत्री के पद पर बैठने के बाद ललित नारायण मिश्र ने अपने पिता के वचन “के बेटा होयत जे कोसी में रेल चलाऔत” को चरितार्थ करते हुए भपटियाही-फारबिसगंज, झंझारपुर-लोकहा-लौकही, कटिहार-बाराबंकी व समस्तीपुर-दरभंगा रेल लाइनों का पुनर्निर्माण कर रेल चलाई तथा 36 नये रेल लाइनों की योजना को स्वीकृत दिलाई. इसी के तहत आज कोसी रेल महासेतु मूर्त रूप ले रहा है. मानसी से फारबिसगंज व कटिहार से जोगबनी बड़ी रेल लाइन व जयनगर सीतामढ़ी रेल लाइन के परियोजना का सर्वेक्षण कराने का श्रेय भी उन्हीं को है.
एक शिक्षा प्रेमी की हैसियत से मिथिलांचल विश्वविद्यालय की स्थापना की, दरभंगा व कोसी प्रमंडल का निर्माण कराया, कोसी बराज निर्माण, पूर्वी एवं पश्चिमी कोसी नहर परियोजना का निर्माण, कटैया जल विद्युत गृह, पूर्णिया एवं दरभंगा में वायुसैनिक हवाई अड्डा, अशोक पेपर मिल, मधुबनी व मिथिला पेंटिंग को अंतरराष्ट्रीय पहचान, रेल कारखानों का राष्ट्रीयकरण, कोसी की बाढ़ से ध्वस्त रेल पथों पर पुनर्परिचालन कराने का श्रेय भी इन्हीं को है।

कोसी की विभीषिका से पीड़ित लोगों को राहत दिलाने के लिए ललित बाबू ने 1947 में कोसी पीड़ित परिवारों का सम्मेलन कराया जिसका उद्घाटन डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने किया था. 1954 में सांसद रहने के दौरान कोसी नदी विभीषिका की ओर देश का ध्यान पंडित नेहरू, गुलजारी लाल नंदा और डॉ श्रीकृष्ण सिंह के माध्यम से आकृष्ट कराया और कोसी बांध निर्माण के लिए 150 करोड़ की राशि की मंजूरी दिलाई. भारत सेवक समाज के माध्यम से श्रमदान से तटबंध बनवाया. इस काम में वे ऐसे रमे कि लोग इन्हें कोसी बाबू के नाम से पुकारने लगे.

आज रेलवे स्टेशनों पर मिथिला पेंटिंग को उकेरे जाने की खबरें बनती है. जबकि बहुत कम लोगों को मालूम है कि रेलवे में सबसे पहले मिथिला पेंटिंग का इस्तेमाल इन्होंने ही कराया था. समस्तीपुर से दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी जयंती जनता एक्सप्रेस की बोगियों को इन्होंने ही मिथिला पेन्टिंग से सुसज्जित कराया था. उस समय विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर मिथिला पेंटिंग उकेरी गई थी. ललित बाबू ने लखनऊ से असम तक लेटरल रोड की मंजूरी कराई थी जो मुजफ्फरपुर और दरभंगा होते हुए फारबिसगंज तक कि दूरी के लिए स्वीकृत हुई थी.

पिछड़े बिहार को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए कटिबद्ध ललित नारायण मिश्रा जैसे सदा समर्पित नेता को लोग आज भी भुला नहीं पा रहे हैं. उनकी अंतिम वाणी “मैं रहूँ या ना रहूँ बिहार बढ़कर रहेगा” लोगों को हमेशा याद रहता है. उनके पैतृक गांव बलुआ बाजार के ललितेश्वर नाथ मंदिर स्थित समाधि स्थल पर तीन जनवरी को राज्य सरकार की ओर से कार्यक्रम होता है और इसे ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाते हैं ।

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