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मुझे गाली दी और ‘रंडी’ कहा, मैंने विरोध किया तो उसने थप्पड़ मारे : राधिका

 

राधिका मेनन
राधिका मेनन

 

 

 

६ जनवरी ,२०१७ | मंगलवार सुबह देश की राजधानी दिल्ली के एक पेट्रोल पंप पर एक आदमी ने मुझ पर हमला किया। वो आराम से आया और चला गया। पंप पर काम करने वाले फिर से पेट्रोल भरने लगे। मैं अकेले ही खुद को, अपना फोन और टूटा हुआ चश्मा समेटने लगी। फिर पुलिस को फोन किया।

मेरी मदद के लिए कोई क्यों नहीं आया? मैंने तो कुछ नहीं किया था। मैं कोई जवान लड़की नहीं हूं. मैंने कोई फैशनेबल कपड़े भी नहीं पहने थे। वक्त भी सुबह का था। मैं पेट्रोल पंप पर अपनी कार में पेट्रोल भरे जाने के बाद उसका दरवाजा खोलकर उसमें बैठ रही थी कि अचानक दूसरी तरफ से वो आदमी अपनी स्कूटी पर आया और मेरे बैग समेत मुझसे खींचने लगा।

मैंने बैग वापस खींचा, हम दोनों गिर गए। उसने मुझे गाली दी और ‘रंडी’ बुलाया। जब मैंने विरोध किया उसने थप्पड़ और घूंसे मारे। मेरा चश्मा फेंका और तोड़ दिया। आसपास के लोग देखते रहे। मानो ये सही था। मानो ‘रंडी’ कहकर उसने मुझे मारने-पीटने का परमिट हासिल कर लिया हो।

लोग तमाशबीन बने रहे

 मैंने उसके जैकेट का टोपा खींचकर हटाने की कोशिश की ताकि उसका चेहरा ठीक से देख सकूं। तो उसने टोपा हटाया और मुझे धमकी दी। कहा कि ‘बाद में तने देख लूंगा’। फिर वो जितनी आसानी से आया था वैसे ही चला गया। आखिरकार ये सब देख रहा एक आदमी आया और पेट्रोल पंप के लोगों को डांटते हुए पूछने लगा कि उन्होंने उस आदमी को रोका क्यों नहीं?

तो उसी से वे उल्टा पूछने लगे, “आप इनके क्या लगते हो?” यानी अगर किसी औरत से रिश्ता न हो तो एक अनजान आदमी उसकी मदद की पेशकश नहीं कर सकता! पर रिश्ता होना भी खतरे से खाली नहीं। जब मैंने ‘दर्शकों’ से पूछा कि मैं जब चिल्ला रही थी कि उस आदमी की स्कूटी का नंबर नोट कर लो, तो आपने क्यों नहीं किया? एक आदमी बोले, “हमने सोचा वो आपका पति है।”

यानी पति, ब्वायफ्रेंड, पिता और भाई अगर किसी औरत से मारपीट करें तो उन्हें करने दिया जाए! चाहे वो सार्वजनिक जगह हो। शायद इसी सोच के चलते पिछले साल कई औरतों का पीछा कर सड़कों पर उनकी हत्या कर दी गई। हत्या उन लोगों ने की जो महिला से रिश्ते का दावा करते थे, और लोग तमाशबीन बने रहे। मानो रिश्ते ने भी मारने का परमिट दे दिया।

समाज का बदलना ज्यादा जरूरी है

 सुरक्षा क्या है? उस पेट्रोल पंप पर लगे चार में से तीन कैमरे काम नहीं कर रहे थे। वो आदमी पंप पर इतनी देर था पर जो कैमरा चल रहा था उसमें सिर्फ हमला दिखता है, उसका चेहरा नहीं। ऐसी तकनीक किस काम की? जिसमें कैद तस्वीरें एक औरत को असहाय दिखा रही है, मानो उसे पीटकर समाज ने उसे उसका दर्जा दिखाया हो।

वैसे भी तकनीक चाहे जितनी अच्छी हो, समाज का बदलना ज्यादा जरूरी है। तब तक यह बहुत जरूरी है कि, नेता औरतों के खिलाफ बयान देना बंद करें, पुलिस सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करे और सरकार सुरक्षा के लिए ठोस नीतियां बनायें।मेरे दोस्तों की मदद से आखिरकार मेरे मामले में एफ़आईआर तो हो गई, मेरी चोटें भी ठीक हो जाएंगी, लड़ने से मन का डर भी खत्म हुआ। पर यही बात खटक रही है कि अगर बच्चे महिलाओं की ओर हिंसा को सही ठहराने वाली यही सब बातें देखते-सुनते बड़े हुए तो ये कितना बीमार समाज बन जाएगा। इसीलिए इस नजरिए और व्यवहार के खिलाफ आन्दोलन जरूरी है। बी.बी.सी. सा.

 

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