Sun. Dec 9th, 2018

मुस्लिम महिला को उनके समाज ने इन्सान नहीं समझा : सीमा विश्वकर्मा

मुस्लिम समाज में अनुसंधान के दौरान यह देखा गया कि वे लोग फैमिली प्लानिंग नहीं करते हैं । सन्तानें जितनी हों, उन्हें अल्लाह की देन समझते हैं ।

इसके फाइडिंग्स में मैं कहना चाहूंगा कि सन्तान वास्तव में इसी लिहाज से अल्लाह की देन हैं, लेकिन उसकी देखभाल भी तो फर्ज है ।

२४ मार्च | मुस्लिम महिला पूर्ण रूप से स्वतंत्र है, यह तो नहीं कहा जा सकता । लोकतंत्र के बाद उसके जीवन में कुछ परिवर्तन आए हैं और मुश्किलों का सामना करने के लिए उन्होंने नये तरीके भी अपनाये हैं । परिस्थितिवश उनमें पुरानी परम्पराओं, रुढि़यों और बन्धनों को तोड़ने का साहस और आत्मविश्वास भी आया है । साथ में संवैधानिक तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य एवं नौकरियां पाने की स्वतन्त्रता और पुरुषों से समानता का दर्जा पाने के अनेक अधिकार मिले हैं । परन्तु यह सब कुछ अभी भी काफी हद तक कागजों तक ही सीमित हैं ।IMG_20170401_081524मैं अपने अध्ययन और अनुसंधान के अनुभवों के आधार पर कह सकती हूं कि वेशक मुस्लिम समाज की महिलाओं में स्वतन्त्रता की लहर आयी है, वे अधिकार भी पाने लगी हैं । उदाहरण के तौर पर हम कह सकते हैं कि मधेशी पार्टियोें के साथ–साथ कथित बड़ी पार्टियों के ग्रासरुट से लेकर केन्द्र लेवल तक मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी हैं । परंतु जो सामाजिक दर्जा उन्हें मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल सका है । इसका विशेष कारण मैं समझती हूं कि मुस्लिम महिला को उनके समाज ने ‘इनसान’ नहीं समझा, जिसकी अपनी भी कुछ इच्छाएं, आशाएं, निराशाएं, पसंदगी और नापसंदगी होती हैं । हमने उनके व्यक्तित्व को अलग से नहीं स्वीकार किया है । मैंने यह भी पाया है कि अधिकांश परिवार के सदस्य यह तो चाहते हैं कि उनकी बेटी पढ़े, पढ़कर नौकरी करें, अशिक्षित समाज को पथ प्रदर्शित करें, परन्तु उनका दृष्टिकोण अभी भी वही पुराना है ।
मुस्लिम समाज में अनुसंधान के दौरान यह देखा गया कि वे लोग फैमिली प्लानिंग नहीं करते हैं । सन्तानें जितनी हों, उन्हें अल्लाह की देन समझते हैं । इसके फाइडिंग्स में मैं कहना चाहूंगा कि सन्तान वास्तव में इसी लिहाज से अल्लाह की देन हैं, लेकिन उसकी देखभाल भी तो फर्ज है । जो इसे अल्लाह की देन कहते हैं, उन्हें अल्लाह की इस नेमत की परवरिश अच्छी तरह करनी चाहिए । असल चीज तो उनकी सही देखभाल है । बच्चे के जन्म के सिलसिले में ऐहतियात बरतना तो जरूरी है । इसी प्रकार मुस्लिम महिला से संबंधित एक और बात उठाई जाती है कि वे बुरका लगाती हैं । जिसकी वजह से उर्दू के अतिरिक्त जेनरल एजुकेशन नहीं ले पा रही हैं । बुरके के बारे में मेरा जाती ख्याल यह है कि बुरका ९पर्दा० निगाह का होता है । शराफत से बाहर किसी को नहीं जाना चाहिए । अगर चरित्र ऊंचा हो, तो कोई ऊंगली नहीं उठा सकता । बेशरमी नहीं होनी चाहिए ।
अंत में मैं कहना चाहूंगी कि किसी भी समाज की तरक्की का मतलव यह होता है कि पूरा समाज विकसित हो । आज इस बात की सख्त जरूरत है कि मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार कर उन्हें पिछड़ेपन से निकाला जाए । जब पूरा समाज विकसित होगा, तब मुस्लिम महिला साहस और दृढ़ निश्चय के साथ कौमी जिन्दगी के निर्माण में हिस्सा ले सकेंगी ।

सीमा विश्वकर्मा
मानवाअधिकार कर्मी

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of