Wed. Nov 14th, 2018

मृतक २२ वर्षवाद घर लौटा !

जनकपुर । पति के मरणोपरान्त हिन्दू समाज में महिला विधवा हो जाती है अर्थात सिन्दूर लगाना छोड देती है । ऐसा ही किया धनुषा कनकपट्टी की देउरीवाली ने भी । लेकिन पति जिन्दा हो और श्रीमती उन का क्रियाकर्म कर एकल जिन्दगी विताने वाली घटना किसी को भी झकझोर कर देनेवाली बात है । भले ही कुछ समय के लिए कोई न माने परन्तु बात सच है ।

Saroj-yadav
मृतक २२ वर्षवाद घर लौटा !

धनुषा जिला के कनकपटट्ी गाम में रहने वाले सरोज यादव ४० वर्षकी उमेर में रोजगारी के लिए भारत गए हुए थे । लेकिन पूरे २२ वर्षके वाद जब घर लौटे तो गांववालो ने उने देखकर चकित रह गए । किसी को कुछ समझ मंे नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है । उन्हंे देखने के लिए गांववालो की भीड १५ दिनों तक उमडÞती रही । उनकी श्रीमती को तो होसोहवास न रहा और वे फिर से सधवा बनी ।
पाँच सन्तान के पिता सरोज यादव जनकपुर चुरोट कारखाना में दैनिक मजदूरी पर कार्य करते थे । लेकिन जब उस कमाई से जीवनयापन मुश्किल हो गया तो रोजगारी के लिए भारत के मुर्म्बई गए । मुर्म्बई के कल्याणपुर में उन्हे सबेरा डेरी उद्योग में बाचमैन की नौकरी मिल गई ।
इधर घरवाले १० वर्षतक सरोज कहाँ है, क्या कर रहा है, किसी प्रकार की सूचना नहीं मिलने पर निराश हो गए । सब कहने लगे ‘शायद सरोज यादव की किसी घटना में मौत हो गई । अगर वो जिन्दा रहता तो अवश्य कोई खबर देता । हालाँकि मुर्म्बई में उन्हे खोजने का बहुत प्रयास किया गया । जब कुछ पता न लगा तो गांववालो ने सरोज यादव का पुतला बनाकर दाहसंस्कार भी कर दिया । क्रियाकर्म करने के वाद सरोज यादव की श्रीमती देउरीवाली ने माँग में सिन्दूर लगाना भी छोडÞ दिया ।
जब भी बच्चे माँ से प्रश्न करते- ‘पिता कब आऐंगे – कहाँ गए है – क्या अब नहीं आऐगें -‘ माँ रोती हर्ुइ कहती थी- ‘नही बेटा, अब तेरे पिता इस संसार में नहीं रहे ।’ और खूब रोया करती, ऐसा एक ग्रामीण ने बताया । एक विधवा औरत को पाँच बच्चों का लालन-पालन करना इस समाज में कितना कठिन है, किसी से छुपी नहीं है । श्रीमती देउरीवाली रोती हर्ुइ कहती है- ‘नेपाल से हजारों व्यक्ति रोजगारी के लिए भारत सहित विभिन्न देशो में जाते हैं । इसका कारण है बेरोजगारी । अगर हम जानते की हमारे पति पडÞोसी राष्ट्र भारत में जाने से बन्दी बना लिए जाऐंगे तो हम कभी जाने के लिए सलाह नहीं देते ।’
२२ वर्षके बाद घर लौटे सरोज यादव के अनुसार जब मुर्म्बई गए तो एक बोर्ड में लिखा था- ‘एक वाचमैन की आवश्यकता है ।’ बातचीत कर मैं वहाँ नोकरी करने लगा । उसी दिन से कम्पनी ने हमे कम्पाउण्ड से बाहर निकलना बन्द कर दिया । पहले गांव में फोन भी नहीं था कि किसी से सर्म्पर्क कर सकें । चिठ्ठी डालने के लिए शहर में जाना पडÞता था । जब भी घर जाने की बात वा किसी से मिलने की बात करतें तो कडÞी निगरानी के साथ मानसिक एवं शारीरिक यातना दी जाती थी । वो आगे कहते है- जब हमे उच्च रक्तचाप और डायविटिज हो गया तो ४० हजार रुपैया देकर हमें उहाँ से हटा दिया गया । मैं वहाँ से निकलते ही एक निजी क्लिनिक में अपना इलाजा कराने लगा । ४० हजार रुपैया खत्म होने वाद कुछ सुधार हुआ तो हम घर आए । यहाँ पर देखा तो पूरा संसार ही बदला हुआ है ।
नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषा के सभापति रामअशिष यादव के अनुसार यह बहुत ही गम्भीर घटना है । जहाँ बेटी-रोटी का सम्बन्ध मात्र नहीं कला संस्कृति और भेषभूषा एक जैसा है उस देश के नागरिक से इस प्रकार व्यवहार करना दोनों देश के लिए एक प्रश्न खडÞा कर सकता है । इसलिए उस कम्पनी पर कारवाही की मांग की गई है ।

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