Tue. Oct 16th, 2018

मैं और यादें,  यादें और सिर्फ यादें

आषाढ़ का पहला दिन

मधु प्रधान


आज फिर 
काली घटा छाई है 
घने काले पहाड़ जैसे 
बादलों से 
नीचे उतरते 
उमड़ते छोटे-छोटे 
बादल के टुकड़ों ने 
घेर लिया सारा आकाश 
मुझे याद आ रहा है 
अपना घर 
छत का वह बारामदा
जहाँ खड़ी हो कर 
मैं देखा करती थी 
दूर -दूर तक खुला आकाश आकाश को छूती धरती 
उमड़ती घटायें
धीमे-धीमे / तेज होती बौछारें
और स्नेह आप्लावित 
धरती की गोद मे कुनमुनाते 
हरे -हरे अंखुए
मेरी आँखों में कौंध रहा है 
मेरा बचपन /अनवरत झरती 
बौछारों को पकड़ने के लिये 
उद्धत /दो छोटे-छोटे हाथ 
मेरे कानों में गूँज रही है
बैलों को ओसारे में बांधते 
तेजा चाचा की खनकती आवाज 
” मोड़ी “भीग मत 
बीमार पड़ जाएगी 
और सहम कर उनके जाने का 
इन्तजार करती 
दो नटखट आँखें 
अब मैं शहर में हूँ 
बादल बरस कर जा चुके हैं
शेष हैं /पानी से धुले 
नाचते -थिरकते 
हरे -हरे पीपल के पत्ते 
बिजली के तारों पर ठहरी 
टपकती कुछ बूंदें 
सर से पाँव तक भीगी हुई 
सड़क पर भरे /पिंडलियों तक 
पानी को मंझाती मैं और यादें 
यादें और सिर्फ यादें

 

 

 

 

 

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