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मोदी जी की स्पष्टोक्ति से कुछ लोगों को मिर्ची लगी

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modi, koiral& rayश्वेता दीप्ति,काठमाण्डू , २६ नवम्बर २०१४ । जोर का झटका धीरे से लगा है । सार्क सम्मेलन शुरु हो चुका है । चाहे अनचाहे अन्य राष्ट्रप्रमुख से अधिक चर्चा में मोदी ही हैं ।  नेपाल के आन्तरिक मामले में मोदी की दिलचस्पी कई स्वाभिमानी नेताओं को खल रही है या फिर यूँ कहें कि उन्हें जोर का झटका लगा है । खैर, जो असर है वो तो दिखेगा ही । तोहफे मिलते हैं तो खुशी होती है और जब एक सही सलाह मिलती है तो सीधी बात में भी कथित छिपे षड्यंत्र को तलाशते हैं । मिर्ची तो लगी है इस बार, मोदी जी की स्पष्टोक्ति से । बातें तो बहुत सारी की उन्होंने सहायता की बातें, मित्रता की बातें, हँसने–मुस्कुराने की बातें, ये वो बातें थीं जो सब को अच्छी लगी, किन्तु जो बातें कुछ को चुभी हैं वो हैं—संख्या की बातें और मधेशी (पहाड़ी और माओवादी) के अधिकार की बातें । यह उन्हें पच नहीं रहा जो संख्या के मद में अपनी मनमर्जी आगामी संविधान के तहत सब पर थोपने की कोशिश में लगे हुए हैें । एक स्पष्ट बात मोदी जी ने खुलेआम कही कि अगर संविधान में सबकी आवाज नहीं समेटी गई और समय पर संविधान नहीं लागू हुआ तो देश में एक नये संकट का जन्म होगा । मोदी जब सहमति की बात कर रहे हैं तो कई ऐसे विश्लेषक हैं जो यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि उनका इशारा मधेशी मोर्चा और एमाओवादी की ओर है किन्तु क्या बात सिर्फ सहमति की है ? उन्होंने यह भी तो स्पष्ट कहा है कि किसी भी स्तर पर मधेश की जनता या माओवादी, पहाड़ी अपने आपको उपेक्षित ना समझें और उनके ऊपर बहुमत के मद का सिद्धान्त ना लागू करें । क्या इतना काफी नहीं है यह समझने के लिए कि अल्पमत को अगर सही जगह नहीं मिली तो द्वन्ध निश्चित है ।

भारतीय सरकार के द्वारा तीन महत्वपूर्ण तोहफे नेपाल को मिले हैं । सर्वसुविधायुक्त ट्रामा सेन्टर, नेपाल और दिल्ली के बीच सीधी बस सेवा और नेपाली सेना को हेलिकाप्टर । अगर कुछ नहीं मिला तो मधेश की  जनता को एक छोटी सी खुशी । मोदी जी ने स्वीकार किया कि मधेशी जनता आहत हैं और वो उनकी उम्मीद को अवश्य पूरी करेंगे किन्तु फिलहाल तो यह अतीत के गर्भ में है । मोदी मधेश भले ही नहीं जा सके हैं, किन्तु सरकार की नीति से वो वाकिफ जरुर हो गए हैं । विश्वगुरु बनने की ओर कदम बढ़ाने वाले मोदी नेपाल की बचकानी राजनीति को ना समझ पाएँ ऐसा तो सम्भव ही नहीं है ।

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