Wed. Nov 14th, 2018

योग: कर्मसु कौशलम्:- अर्थात कर्मो की कुशलता ही योग है : अजय कुमार झा

जलेश्वर,। आज विश्व योग दिवस के उपलक्ष्य पर नेपाल के महोत्तरी जिला के सदर मुकाम जलेश्वर स्थित भार्गवसर,आयुर्वेद औषधालय,मलिवारा विद्यालय लगायत के सयों स्थानों पर बड़ी भव्यता तथा सौहार्दता के उल्लेख्य संख्या में स्वतःस्फूर्त सहभागिता देखा गया। खासकर युवा वर्ग में योग के प्रति का जागरूकता और आकर्षण देखने लायक था।योग एक प्राचीन भारतीय जीवन-पद्धति हुए भी आज के वैज्ञानिका युग में भी विश्व मानव कल्याण के आधार शिला के रूप में स्थापित हो चूका है। योग पद्धति का सूत्रधार महर्षि पतंजली को माना जाता है।
सर्वप्रथम महर्षि पतंजलि ने ही योग की सूत्रों का संकलन किया। यह एक ऐसी पद्धति है जिसके माध्यम से शरीर, मन और आत्मा के मध्य संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
मस्तिष्क और आत्मा में संतुलन बनाया जाता है। यही कारण है कि योग से शा‍रीरिक व्याधियों के अलावा मानसिक समस्याओं से भी निजात पाई जा सकती है। जबकि आधुनिक जीवन शैली ने हमें शारीरिक,मानसिक और सामाजिक तीनो रूप अश्वस्थ कर दिया है।100 वर्ष की हमारी आयु 60 वर्ष में सिमट कर रह गया है। बच्चा से बृद्ध तक तनाव और विक्षिप्तता के शिकार हो गए हैं। आर्थिक समृद्धि के वावजूद भी आत्म हत्या की घटना बढ़ती ही जा रही है। अतःयोग अब हमारे जीवन का अभिन्न के रूप में प्रतिष्ठित होने लगा है। और यही से समग्र कल्याण का मार्ग भी खुलता है।


योग शब्द की उत्पत्त‍ि संस्कृति के युज से हुई है, जिसका शुक्ष्म अर्थ है आत्मा का सार्वभौमिक चेतना से मिलन। योग लगभग दस हजार साल से भी अधिक समय से अपनाया जा रहा है। वैदिक संहिताओं के अनुसार तपस्वियों के बारे में प्राचीन काल से ही वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। सिंधु घाटी सभ्यता में भी योग और समाधि को प्रदर्श‍ित करती मूर्तियां प्राप्त हुईं। कालान्तर में विदेसी आक्रमणों और अवैज्ञानिक आधुनिक शिक्षण पद्धति के कारण योग को धार्मिक तथा सांस्कृतिक कट्टरता का प्रतिक मानकर वहिस्कृत करने का षडयंत्र किया गया। जिसके परिणाम स्वरुप योग समाज से लुप्त प्रायः हो गया।


पतंजलि द्वारा प्रतिपादित (अष्टांगयोग) अर्थात योग के आठ अंग जो शारीरिक शुद्धि से सुरु होकर मानसिक, बैचारिक,हार्दिक और आत्मिक सुद्धि के साथ संसार से समाधि तक या कहें जीवन से निर्वाण तक की सुफल यात्रा का सुन्दरतम सोपान की चर्चा निचे प्रस्तुत है:-
1 यम -इसके अंतर्गत सत्य बोलना, अहिंसा, लोभ न करना, विषयासक्ति न होना और स्वार्थी न होना शामिल है।

2 नियम -इसके अंतर्गत पवित्रता, संतुष्ट‍ि, तपस्या, अध्ययन, और ईश्वर को आत्मसमर्पण शामिल हैं।

3 आसन -इसमें बैठने का आसन महत्वपूर्ण है

4 प्राणायाम -सांस को लेना, छोड़ना और स्थगित रखना इसमें अहम है।

5 प्रत्याहार -बाहरी वस्तुओं से, भावना अंगों से प्रत्याहार।

6 धारणा -इसमें एकाग्रता अर्था एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना महत्वपूर्ण है।

7 ध्यान -ध्यान की वस्तु की प्रकृति का गहन चिंतन इसमें शामिल है।

8 समाधि -इसमें ध्यान की वस्तु को चैतन्य के साथ विलय करना शामिल है। इसके दो प्रकार हैं – सविकल्प और अविकल्प। अविकल्प में संसार में वापस आने का कोई मार्ग नहीं होता। अत: यह योग पद्धति की चरम अवस्था है।

भगवद गीता में योग के जो तीन प्रमुख प्रकार बताए गए हैं वे हैं –

1 कर्मयोग -इसमें व्यक्ति अपने स्थिति के उचित और कर्तव्यों के अनुसार कर्मों का श्रद्धापूर्वक निर्वाह करता है।

2 भक्ति योग -इसमें भगवत कीर्तन प्रमुख है। इसे भावनात्मक आचरण वाले लोगों को सुझाया जाता है।

3 ज्ञाना योग – इसमें ज्ञान प्राप्त करना अर्थात ज्ञानार्जन करना शामिल है।
इसप्रकार एक पूर्ण मानव के जीवन के सम्पूर्ण कलाओं और क्षमताओं को विकसित और सुव्यवस्थित करने के लिए योग का कोई विकल्प नहीं है।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of