Mon. Sep 24th, 2018

रक्ताम्भ आश्विन तीन – संविधान दिवस या काला दिवस ? : श्वेता दीप्ति

इसी विरोध का परिणाम राममनोहर यादव को अपनी जान गँवा कर देनी पड़ी । जिसका पोस्टमार्टम तक नहीं होने दिया गया । क्या इसी लोकतंत्र का इंतजार था जनता को ?

डा. श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १० सितम्बर २०१८ | देखते देखते २०७२ से लेकर २०७५ का वक्त तेजी से गुजरता गया । राजनीतिक परिदृश्य भी बदले और चाहे अनचाहे देश ने संघीयता को भी स्वीकार कर लिया । हालाँकि व्यवहारिक रूप में सत्ता पक्ष इसे पचा नहीं पा रही और प्रदेश पर अपना स्वामित्व काबिज रखना चाहती है । अधिकार नहीं फिलहाल सिर्फ संघीयता का नाम मिला है । चार साल के बीच का यह वक्त भले ही गुजरा परन्तु मधेश की मिट्टी में कुछ जख्म के बीज हैं जो वक्त के साथ नासूर का वटवृक्ष बनते जा रहे हैं । जिस तरह खून बहा कर मसौदा लाया गया, बन्दूक की नोक पर संविधान जारी किया गया उसी तरह बन्दूक की नोक पर चुनाव भी हुए । जहाँ दो नम्बर प्रदेश ने मधेशी नेताओं पर अपने यकीन को दर्शाया और उसे चुना । पर आज मधेश की जनता का अपने नेताओं से जहाँ विश्वास उठ गया वहीं नेता अपना आधार खो रहे हैं । नैतिकता की बलिहारी देकर आज भी अगर वो ये दावा करते हैं कि वो मधेश के नियंता हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी कपोल कल्पना होगी । देखा जाय तो वो सिर्फ सत्ता के साधक ही नजर आ रहे हैं मधेश के मसीहा नहीं । जिस मिट्टी पर खून बहा था जिसके बल पर मधेशी नेता ने साम्राज्य खड़ा किया आज वही मधेश और मधेश की समस्याओं से अनभिज्ञ बने हुए हैं । जिनके घरों के चिराग बुझे वो आज भी अँधेरे में हैं पर इनके महल रौशन हैं ।
देश आश्विन तीन को संविधान दिवस मनाने की तैयारी में मशगूल है । वहीं प्रदेश नम्बर दो की जनता में एक बार फिर इस दिन का विरोध करने की सुगबुगाहट है । मधेश की जनता आज भी इस संविधान को स्वीकार नहीं कर पा रही वहीं मधेशी नेता आज भी अपनी आदतानुसार मधेश की इसी असंतुष्टि को भजाने के लिए तैयार बैठे हुए हैं । सत्ता में शामिल ये नेता अगर संविधान का विरोध करते हैं तो, यकीनन उन्हें यह बात शोभा नहीं देगी । जिस संविधान का शपथ खाकर वो पदासीन है उसके विरोध का कोई औचित्य नहीं । आश्विन तीन(२०७२) की शाम जब पहाड़ ने दीपावली मनायी थी उस शाम मधेश के कई घरों में लाश रखे हुए थे और जहाँ मातम मनाया गया था । आज भी यह दर्द रिस रहा है उन दिलों में । आज भी आन्दोलनकारी डर के साए में जी रहे हैं और इन सबसे बेखवर मधेश के मसीहा सत्ता के साए में अपनी स्वार्थ की सिद्धि में मगन हैं । सरकार को समर्थन देते वक्त यह दावा करने वाले कि संविधान संशोधन और मधेश हित के लिए वो सरकार में शामिल हो रहे हैं क्योंकि संशोधन के लिए शक्ति की आवश्यकता है आज उनके शब्दकोष से मधेश और मधेशी शब्द ही गायब हो रहे हैं । सरकार बार बार संविधान संशोधन के नाम पर मधेश की जनता का मन बहला रही है । प्रधानमंत्री मैथिली में बोलकर और मैथिली में ट्वीट कर खुद को मधेश के करीब लाने की कोशिश में हैं । जबकि हर कदम पर मधेश की जनता अपने स्तर से विरोध जता रही है । इसी विरोध का परिणाम राममनोहर यादव को अपनी जान गँवा कर देनी पड़ी । जिसका पोस्टमार्टम तक नहीं होने दिया गया । क्या इसी लोकतंत्र का इंतजार था जनता को ?
आश्विन तीन का विरोध मधेश की जनता तो करेगी ही परन्तु मधेश के नेता अगर ये खानापूर्ति ना करे तो बेहतर होगा । उनकी नीयत जनता के सामने है फिर भी वाहवाही लूटने की कोशिश और अपनी जगह बचाकर रखने की कोशिश में ये अवश्य हैं । पर कहते हैं न ये पब्लिक है सब जानती है । किसी अप्रिय घटना से यह दिन बचा रह जाय फिर कोई गोद ना उजड़े, फिर कोई मांग सूनी ना हो, फिर कोई अनाथ ना हो, बस उम्मीद इसी की करनी चाहिए क्योंकि प्रहरी की गोली और लाठी को मधेशी आन्दोलनकारी में देश का नागरिक नहीं आतंकवादी नजर आता है और ऐसे में सिर्फ सामने वाले का उन्हें सर दिखता है जिसे तोड़ने या छलनी करने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती है ।

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