Tue. Nov 20th, 2018

राजनीतिज्ञों के लिए सिर्फ सीढियाँ होती हैं धर्म, जात व सम्प्रदाय : कैलाश महतो


कैलाश महतो, परासी | मेरे ऐसे कुछ लेख कुछ सम्पादक लोग प्रकाशित करने से इंकार कर देते है जो उन्हें किसी व्यक्ति पर प्रहार लगते हैं, जबकि वह नहीं होना चाहिए । समाज और राजनीति से ताल्लुकात रखने बाले लोग नितान्त कुछ पारिवारिक सम्बन्धों को छोडकर व्यक्तिगत हो ही नहीं सकते । वे सामाजिक और राष्ट्रिय हो जाते हैं । क्योंकि समाज और राजनीति राष्ट्र से जुड जाता है । कोई आदमी प्रधानमन्त्री बने तो राष्ट्रिय और झूठ बोलें, बेइमानी करें तो व्यक्तिगत कैसे हो सकता है । यह अलग बात है कि सब लोग किसी के बारे में खुलकर बातें व्यक्त नहीं कर पाते ।
कुछ महीने पहले तक संघीय समाजवादी फोरम में उपमहासचिव रहे उपेन्द्र यादव जी के अनुशासित भक्त अभिषेक प्रताप शाह ने अपने पूर्व आदरनीय नेता जी के बारे में एक सनसनीखेज खुलाशा किया है कि प्रदेश नम्बर २ के मुखिया रहे मो. लालबाबु राउत जी की मधेश में जो उँचाई बनी है, उससे उपेन्द्र जी कहीं न कहीं तिलमिला चुके हैं । मधेश का सारा श्रेय राउत के अडानों पर टिक गयी है जिसमें उपेन्द्र यादव का स्थान गौण नजर आ रही थी । लालबाबु राउत ने मोदी बाले मञ्च पर मधेश का अडान क्या रखा, उपेन्द्र जी का अहंकार धरमराने लगा था । उन्हें मो. राउत की प्रसिद्धी और वाहवाही पच ही नहीं पाया और उन्होंने उन्हें अपने औकात में रखने के लिए एक दुरगामी गेम प्लान रच दी ।
मुस्लिम, जिसका अर्थ होता है ः पाक, शुद्ध और सफा, समेत जब राजनीतिक गन्दगी को समझ नहीं पाते या समझकर भी अपने शुद्धता को बचा नहीं पाते तो सारे समाज में ही अविश्वास पैदा होता है । बडा विचित्र दृश्य रहा है कुछ दिन पूर्व, जब मो. लालबाबु राउत जी को उनके पद से हटाये जाने की चर्चा पसरी हुई थी । मुसलमान के सारे ठेकेदारों ने धम्की दे डाली थी कि मो. लालबाबु को उनके पद से हटाना उन्हें मन्जुर नहीं हो सकता । वे आन्दोलन में आ जायेंगे । सारे मुसलमानों को सडक पर उतार देंगे । वह धम्की देने बाले केवल अन्य समूहों के मुस्लिम ही नहीं थे, अपितु लालबाबु जी के अपने पार्टी के अपने जात और धर्म के ही केन्द्रिय नेता तथा सांसद आज शहरी विकास मन्त्री के पद पर रहे इस्तियाक राइन समेत थे । अब क्या होगा ? मुसलमान के ठेकेदार अब क्या करेंगे जब कि मुख्यमन्त्री जी को पद से हटना तय है ? और वह भी उनके पार्टी के कारण !
दुनियाँ में अपराध, पाप और धोखा भी उतना ही बडा होता है जितना बडा कोई धर्म, जात और समुदाय होता है । माक्र्स ने वैसे ही नहीं कहा है कि धर्म अफिम के नशा से भी खतरनाक होता है । जात भेडों का समूह होता है और समुदाय साम्प्रदायिक हुडदंगों का जमात होता है । जात, धर्म और समुदाय, ये सब तथाकथित होते हैं । जबसे तीनों मानव जीवन में प्रवेश पाया, इन्होंने आदमी से आदमियत, इंसान से इंसानियत, मानव से मानवता, धर्म से धर्मात्मा और समुदाय से अमन चयन छीन ली है । सही मायने में इन्हें समाज को तोडने के लिए रणनीतिपूर्वक मानव जीवन में प्रवेश करवाया गया है ।
मुस्लिम धर्म अगर न होता तो मो. लालबाबु राउत के बचाव में केवल मुसलमान नहीं, पूरा समाज बोलता । उस धर्म को मानने बाले लोग सच्चे धर्मात्मा अगर होते तो लालबाबु जी के मैयत पर इस्तियाक राइन जन्म लेने से इंकार किये होते । बडी विचित्र बात है कि एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को मारकर इस्लामियत का नारा देता है । कल्हतक लालबाबु जी के पक्ष में दिखने बाले मुसलमान धर्मात्मा लोग लालबाबु जी के निर्धारित हत्या को भी इस्तियाक राइन के मुस्कानों से सौदा कैसे कर सकते ?
धर्म को धर्म तो रहने दिया नहीं गया है । इसे किसी ने अपने जात से, किसी ने अपने परिवार से तो किसी ने अपने पद, पैसे और जीने खाने के दाँवपेच से जोड लिया है । धर्म का काम है लोगों को जोडना । सबके साथ समान व्यवहार रखना । सारे जहाँ को अपना घर मानना । सारे प्राणियों से प्रेम करना । क्या लोगों का कोई भी धर्म यह सिखाता है कि हिन्दु मुस्लिम को प्यार करेगा ? मुस्लिम हिन्दु के साथ बैठकर प्यार से खाना खायेगा ? मुस्लिम क्रिश्चियानिटी पर आक्रमण नहीं कर सकता ? क्रिश्चियानिटी को कथाकथित धर्म के रुप में संसार में लोभ देकर प्रचार नहीं करेगा ? लोगों के ये सारे धर्म व्यापार है । आडम्बर है । नफरत और अहंकार है । इसिलिए यहाँ कोई धर्मात्मा नहीं बन पाता । बन भी गये तो टिकने नहीं दिया जाता है ।
कहाँ चले गये बुद्ध के समकालिन अनुयायी बौद्धधर्मी भिक्षु लोग ? किसने उन्हें बुद्ध के ही भूमि से कोरिया, जापान, थाइल्याण्ड और चीन में भागने को विवश किया ? बुद्ध को संसार में जब पूजा होने लगी है तब उनसे पैसे ऐंठने के लिए उनके अनुयायी समेत को भगाने बाले जात और लोग बुद्ध को भगवान् मानने का नाटक रच लिये हैं ।
सनातन और हिन्दु एक ही धर्म होने की बात कतई नहीं हो सकने के बावजुद आज हिन्दु धर्म बचाने की अनेक चर्चायें हो रही हैं । पूजापाठ हो रहे हैं । इन्नत मिन्नत हो रही है । सिन्ध से यूनानियों द्वारा हिन्द बना देने के बाद बने हिन्दु शब्द जब विदेशियों के उच्चारण से बना तो फिर सिन्द के बदले हिन्द या हिन्दु क्यों ? सिन्ध एक सभ्यता थी, धर्म नहीं जो सिर्फ एक जात या एक वर्ण से जुड जाये । धर्म अगर सनातन है तो फिर किसी जाति विशेष या वर्ण विशेष का हो ही नहीं सकता । सनातन धर्म किसी को मन्दिर प्रवेश से नहीं रोकता । किसी से छुवाछुत नहीं मानता । किसी से उँच नीच का भावना नहीं बरतता । उस धर्म का पालन और उसका सुरक्षा बाँकी के लोग क्यों करेंगे जो विभेद को जन्म ही नहीं देता, उसे फैलाता भी हो ? हिन्दु धर्म पर संकट बढे तो दलित, शुद्र और शोलकन भी हिन्दु बनकर उसके बचाव में लगें, और जब उससे फायदे हों तो एक ही वर्ण के लोग दवा लें ! तब केवल वे हिन्दु, बाँकी सब शुद्र और अछुत !
जितने बडे जात के संख्या होते हैं, उस जात में उतने ही बडे संख्या में अशिक्षा, बेरोजगारी, अन्धविश्वास, मुर्खता, भोलेपन और वैमनस्यता होते हैं । उस बडे संख्या बाले जात से उस जात का जितना हित होना चाहिए, उससे कई गुणा ज्यादा उस जात का दुदर्शा होता है । उससे फायदे उस जात के कुछ चालाक और छट्टू लोगों को मात्र मिलता है । भेंड के तरह लोग भावना में बहकर जातपात के नाम पर किसी नालायक, छट्टु और गुण्डे मवाली को भोट, नोट और शक्ति दे देते हैं । बदले में उन्हें अपने नेताओं से कभी कुछ मिलते नहीं है ।
जात के नाम पर राजनीति और सामाजिक कार्य करने बाले लोगों से बडा खतरनाक लोग कहीं हो ही नहीं सकते । जात के नाम पर रामबरण और उपेन्द्र यादव ने कितने यादव का जीवन बदल दिया ? थारु के नाम पर विजय गच्छेदार ने कितने थारुओं को बदल दी ? दलित और मुस्लिम के नाम पर भोट लेने और नेता बनने बाले रामपृत पासवान, विश्वेन्द्र पासवान तथा सलिम मियाँ अन्सारी, आफताब आलम और रिजवान अन्सारियों ने कितने दलित और मुसलमानों का भविष्य बना दिये ?
सम्प्रदाय एक आग है जो कुछ लोग समय सापेक्ष समाज में लगाते रहते हैं जब उन्हें अपने लिए ठण्डी महशुश होती है । समाज को इन सबसे सचेत रहना जरुरी है । राजनीतिज्ञों के लिए ये धर्म, जात और सम्प्रदाय सिर्फ सीढियाँ होती हैं और कुछ नहीं ।

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