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राेटी बेटी का रिश्ता क्या नई परिभाषा खाेज रहा है ?

४ जुलाई

नेपाल भारत अाैर चीन सम्बन्ध पर एक विश्लेषण

 

अभय शर्मा

नेपाल में वामपंथी सरकार बनने के बाद जताई गईं आशंकाएं अब सही साबित होती दिख रही हैं. नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पिछले हफ्ते चीन की पांच दिवसीय यात्रा पर थे. इस दौरान उन्होंने चीन के साथ 14 समझौते किये. 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के इन समझौतों में ऊर्जा, पर्यटन, जल विद्युत, सीमेंट फैक्ट्री, व्यापार और कृषि जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं. इसके अलावा इस दौरान दोनों देश उस रेलवे लाइन को बिछाने पर भी सहमत हो गए, जो तिब्बत के ग्योरोंग पोर्ट को नेपाल के काठमांडू से जोड़ेगी.

नेपाली प्रधानमंत्री से बातचीत के दौरान चीनी सरकार ने नेपाल में विमानन, बंदरगाहों तक राजमार्ग और दूरसंचार क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने की योजना भी साझा की जिसके लिए केपी ओली ने हामी भर दी. दोनों देशों के बीच नेपाल में तीन बड़े आर्थिक गलियारों के विकास में तेजी लाने, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतों और स्कूलों के पुनर्निर्माण में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है. दोनों के बीच एक समझौता सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर भी हुआ है जिसके तहत दोनों देशों की खुफिया और पुलिस सेवाएं मिलकर काम करेंगी.

अगर इस पूरे परिदृश्य पर नजर डालें तो चीन ने नेपाल में लगभग हर उस क्षेत्र में समझौते किये हैं जिनमें अब तक केवल भारत की कंपनियों का ही दबदबा बना हुआ था. हालांकि, भारत के लिए इससे भी बड़ी चिंता की बात नेपाल को लेकर चीन का वह रुख है जिससे साफ़ पता चलता है कि वह श्रीलंका और मालदीव के बाद अब हर हाल में नेपाल में भी अपने पैर जमाने का मन बना चुका है.

हाल में नेपाल राष्ट्र बैंक द्वारा जारी किए गए आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं. इनके मुताबिक बीते साल जुलाई से लेकर दिसंबर (नेपाल में वित्तीय वर्ष जुलाई से शुरु होता है) तक नेपाल में चीन का प्रत्यक्ष निवेश आठ करोड़ डॉलर था जबकि, इसी समय में भारत का करीब साढ़े तीन करोड़ डॉलर. जनवरी से लेकर अप्रैल 2018 तक चीनी निवेश में जबरदस्त उछाल आया जिससे यह इस वित्त वर्ष में नेपाल में हुए कुल विदेशी निवेश का 90 फीसदी हो गया. इसके अलावा चीन पिछले कुछ सालों से लगातार नेपाल को दो से चार अरब डॉलर की सलाना वित्तीय मदद देता आ रहा है. वह मदद देने वाले देशों की सूची में सबसे आगे है जबकि, भारत इस सूची में सातवें स्थान पर खिसक गया है.

नेपाल और चीन के नजदीकी रिश्ते

नेपाल के चीन के करीब जाने की शुरुआत 2015 में हुई थी जब भारत ने नेपाली संविधान में मधेसियों को भी उचित स्थान दिए जाने की वकालत की थी. उस समय मधेसी आंदोलन के चलते भारत की सीमा से नेपाल में सामान की आवाजाही बंद हो गयी थी. नेपाल सरकार और वहां के लोगों ने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहराया. उस समय बनी इन परिस्थितियों से उभरने के लिए नेपाल को चीन के पास जाना पड़ा. चीन ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और नेपाल की खुलकर मदद की. देखते ही देखते चीन और नेपाल के संबंध इतने प्रगाढ़ हो गए कि बीते चुनाव में चीन ने केपी ओली और पुष्प कमल दहाल (प्रचंड) की वामपंथी पार्टियों के बीच गठबंधन करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

इसके बाद भी चीन का दबदबा कई बार देखने को मिला. नेपाल में वर्षों पुरानी परंपरा है जिसके तहत प्रत्येक प्रधानमंत्री को अपना पहला विदेश दौरा भारत का करना होता है. लेकिन, इस साल फरवरी में केपी शर्मा ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल की तरफ से खबरें आईं कि ओली भारत न जाकर अपना पहला दौरा चीन का करेंगे. सूत्रों की मानें तो यह स्थिति तब थी जब भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद नेपाल जाकर केपी ओली को भारत आने का निमंत्रण देकर आयी थीं. बताते हैं कि ओली को भारत दौरे पर पहले बुलाने के लिए भारत सरकार को काफी मेहनत करनी पड़ी और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओली को तीन बार फोन किया.

नेपाल के चीन के नजदीक बने रहने की दूसरी बड़ी वजह

नेपाल मामलों के जानकार और नेपाली पत्रकारों की मानें तो नेपाल के चीन के करीब जाने के पीछे की वजह केवल 2015 में भारत द्वारा मधेसियों का साथ देना ही नहीं है. ये लोग उस समय बनी परिस्थितियां को केवल नेपाल के चीन के करीब जाने का एक मौका जैसा मानते हैं. ये लोग कहते हैं कि उस घटना के बाद अगर आज भी नेपाल चीन के नजदीक रहने का इच्छुक है तो इसकी सबसे बड़ी वजह उसे लेकर भारत सरकार का निरंकुश रवैया है जो पिछले एक दशक से काफी ज्यादा बढ़ गया है.

ये जानकार आगे कहते हैं कि नेपाल में भारत की दर्जनों ऐसी परियोजनाएं हैं जो सालों से लटकी पड़ी हैं लेकिन, उन्हें पूरा करने पर भारत की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा. वित्तीय मदद के मामलों में भी भारत की लगातार कटौती से नेपाल परेशान है. जानकारों की मानें तो भारत के इस रुख से परेशान होकर ही नेपाल चीन के साथ संबंध बेहतर करने पर काम कर रहा है. दरअसल, नेपाल जानता है कि चीन और भारत के बीच जिस तरह की प्रतिद्वंदिता है उससे वह इन दोनों देशों का बेहतर तरीके से लाभ उठा सकता है.

चीन समर्थक ओली के सत्ता में आने के बाद भारत की कोशिशें

नेपाल में इस साल हुए चुनाव में जहां वामपंथी केपी ओली को चीन का उम्मीदवार माना जा रहा था वहीं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को भारत का. यही वजह थी कि केपी ओली की पार्टी के चुनाव जीतते ही भारत ने ओली को साधने की कोशिश तेज कर दीं. फरवरी में सुषमा स्वराज का नेपाल जाना इसी कोशिश का एक हिस्सा था. इसके बाद केपी ओली की भारत यात्रा और फिर नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान भारत ने नेपाल को साधने की काफी कोशिश की. इन दोनों मौकों पर भारत ने नेपाल के साथ कई नए समझौते भी किये. इस दौरान चीन से संबंधों को लेकर नेपाली प्रधानमंत्री ने भारत को आश्वस्त भी किया. उन्होंने कहा कि वे भारत के हितों पर कोई आंच नहीं आने देंगे.

ओली की चीन यात्रा के दौरान कुछ चीजें ऐसी घटीं भी जिनसे लगता है कि भारत की कोशिश कुछ हद तक सफल हुई है. साल 2016 में केपी ओली ने खुद चीन द्वारा बिछाई जाने वाली रेल लाइन को तिब्बत से नेपाल के लुंबिनी यानी भारत की सीमा तक लाने की बात की थी. लेकिन, बीते हफ्ते हुई चीन यात्रा के दौरान उन्होंने इसे काठमांडू तक सीमित कर दिया. माना जा रहा है कि नेपाल ने यह फैसला भारत की वजह से लिया है.

इसके अलावा ओली की इस यात्रा के दौरान नेपाल ने चीन की बहुप्रतिक्षित ‘बेल्ट एंड रोड परियोजना’ को लेकर भी कोई समझौता नहीं किया जबकि, इसके लिए कुछ महीने पहले ही उसने हामी भरी थी. चीन की ‘बेल्ट एंड रोड परियोजना’ के पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने की वजह से भारत को इस पर कड़ी आपत्ति है. पिछले दिनों उसने नेपाल से भी इसे लेकर आपत्ति जताई थी.

लेकिन, भारत के इतने प्रयास काफी नहीं

भले ही नेपाल को लेकर भारत के प्रयास कुछ हद तक सफल दिख रहे हों. लेकिन, विदेश मामलों के जानकार नेपाल में बदलती परिस्थितियों को देखते हुई इन्हें काफी नहीं मानते. ये लोग कहते हैं कि भले ही नेपाल कहता हो कि वह भारत के हितों पर कोई आंच नहीं आने देगा लेकिन, जिस तरह के और जितने समझौते चीन और नेपाल के बीच हुए हैं उनसे साफ़ है कि नेपाल अब भारत के प्रभुत्व में न रहकर चीन के प्रभुत्व में आने वाला है. हालांकि, इन लोगों का ये भी मानना है कि भारत के हाथ से अभी भी सब कुछ नहीं निकला है लेकिन, इसके लिए उसे चौतरफा प्रयास करने होंगे.

गोरखा रेजिमेंट में रहे पूर्व जनरल और नेपाल मामलों के विशेषज्ञ अशोक मेहता अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘यह साफ़ है कि भारत नेपाल में चीन के पैसे का मुकाबला नहीं कर सकता. लेकिन, भारत को नेपाल के साथ संबंध बेहतर करने के अन्य तरीकों पर ध्यान देना होगा. उसे सबसे पहले नेपाल को हल्के में लेना छोड़ना होगा.’ मेहता आगे कहते हैं कि भारत को उन परियोजनाओं को पूरा करने पर काम करना चाहिए जिसके वादे उसने नेपाल से कर रखे हैं. इसके अलावा भारत के पास नेपाल से जुड़े रहने के लिए धार्मिक, संस्कृतिक और खुली सीमा है जिसका उसे लाभ उठाना चाहिए. जनरल मेहता यह भी कहते हैं, ‘भारत को मधेसी आंदोलन से सबक लेते हुए अब यह बात भी गांठ बांध लेनी चाहिए कि वह भविष्य में नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देगा.’

दक्षिण एशिया मामलों के कुछ जानकारों के मुताबिक भारत को यह भी समझना होगा कि अब नेपाल की सत्ता में नेताओं की एक नई पीढ़ी आ चुकी है जो बदली भू-राजनीति को बहुत अच्छे से समझती है और उसका फायदा उठाना भी जानती है. ये लोग कहते हैं कि आज का नेपाल वह नहीं है जिसे सिर्फ ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ जैसी बातों से लुभाया जा सकता है.

साभार भारतीय समाचारपत्र सत्याग्रह से

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