Sat. Nov 17th, 2018

रोजे 1 महीने के और ईद 11 महीने का प्रतीक

 

इस्लामलिक कैलेंडर में रमजान का महीना रोजे का महीना है और उसके बाद 1 शव्वाल को ईद का दिन ठहराया गया है। एक महीने की रोजेदारना जिंदगी बिताने के बाद मुसलमान आजादी के साथ खाते-पीते हैं। खुदा का शुक्र अदा करते हुए 2 रकात नमाज सामूहिक रूप से पढ़ते हैं और समाज के सभी लोगों से मिलते हैं और साथ में खुशी मनाते हैं। दान (फ़ितरा) के जरिए समाज के गरीब वर्ग के लोगों की मदद करते हैं।  यह सब चीज़ें ईद-उल-फित्र के जज्बे को बताती हैं। ईद का  मूल भाव खुदा को याद करना है। अपनी खुशियों के साथ लोगों की खुशियों में शामिल होना है।

रोजे का महीना तैयारी और आत्मविश्लेषण का महीना था। उसके बाद ईद का दिन मानो एक नए प्रण और एक नई चेतना के साथ जीवन को शुरू करने का दिन है। ईद का दिन दोबारा एक नए संकल्प  के साथ आगे बढ़ना का दिन है। रोजा वास्तव में तैयारी का अंतराल था।

उसका उद्देश्य यह था कि इंसान बाहर देखने की बजाय अपने अंतर्मन की तरफ ध्यान दें। वह अपने आप में वे आवश्यक गुण पैदा करें, जो जीवन के संघर्ष के बीच उसके लिए जरूरी हैं और जिनके बिना वे जीवन में अपनी भूमिका उपयोगी ढंग से नहीं निभा सकते। मसलन संयम करना, अपनी सीमा का उलंघन न करना, नकरात्मक मानसिकता से अपने आपको बचाना। इस किस्म का एक परिश्रमी महीना गुजारकर वे दोबारा जीवन के मैदान में वापस आते हैं और ईद के त्योहार के रूप में अपने जीवन के नए दौर का शुभारंभ करते हैं।

ईद का दिन हर मुसलमान के लिए नई जिन्दगी की शुरुआत का दिन है। रोज़े ने आदमी के अंदर जो उत्कृष्ट गुण पैदा किए हैं उसका नतीजा यह होता है कि अब वह इंसान समाज का पहले से बेहतर सदस्य बन जाता है। अब वह अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी पहले से बेहतर इंसान होता है।

रोजे में इंसान ने खाने-पीने का त्याग किया था अब वह व्यापक मानवीय हितों के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग करता है। रोज़े में वह अपनी इच्छाओं को रोकने पर राज़ी हुआ था, अब ईद के दिन बहार निकलकर वह अपने अधिकारों से ज्यादा अपनी जिम्मेदारियों पर नज़र रखनेवाला बन जाता है।

रोजे साल में एक महीने का मामला था तो ईद साल के ग्यारह महीने का प्रतीक है। रोजे में वह सब्र, उपासना और अपने रब को स्मरण करने में व्यस्त था तो ईद अगले ग्यारह महीने में इन सबको कार्यान्वित करने का नाम है। रोजा अगर निजी स्तर पर जीवन की अनुभूति थी तो ईद सामूहिक स्तर पर जीवन में शामिल होना है। रोज़ा अगर स्वयं को खुदा के नूर से जगमगाने का अंतराल था तो ईद दुनिया के इंसानों में इस रौशनी को फैलाने का नाम है।

रोजा जिस तरह सिर्फ भूख प्यास नहीं उसी तरह ईद सिर्फ खेल तमाशे का नाम नहीं। दोनों के प्रत्यक्ष रूप के पीछे गहरी सार्थकता छिपी हुई है। रोजा कुछ समय के लिए भौतिक जगत से कटना है और ईद वापस से इस भौतिक जगत में लौटना है।

एक हदीस में आता है जब हज़रत मुहम्मद साहब शव्वाल के महीने का चांद देखते हैं तो कहते हैं ‘ऐ मेरे रब इस चांद को शांति का चांद बन दे।’ हज़रत मुहम्मद साहब का यह कथन ईद के असल भाव को दर्शाता है। ईद का असल मकसद इंसान में आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना तो है ही साथ ही इसका बड़ा लक्ष्य एक शांतिमय समाज की स्थापना की तरफ अग्रसर होना है।
लेखक: रामिश सिद्दीक़ी, इस्लामिक विषयों के जानकार साभार नवभारत टाइम्स से

 

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