Sat. Apr 20th, 2019

लज्ज़त-ए-दर्द-जिगर याद आई, फिर तेरी पहली नज़र याद आई : ‘क़मर’ मुरादाबादी

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बे-नकाब उन की जफाओं को किया है मैं ने
वक्त के हाथ में आईना दिया है मैं ने

ख़ून ख़ुद शौक ओ तमन्ना का किया है मैं ने
अपनी तस्वीर को इक रंग दिया है मैं ने

ये तो सच है के नहीं अपने गिरेबाँ की खबर
तेरा दामन तो कई बार सिया है मैं ने

रस्न ओ दार की तक्दीर जगा दी जिस ने
तेरी दुनिया में वो ऐलान किया है मैं ने

हर्फ आने न दिया इश्क की खुद-दारी पर
काम ना-काम तमन्ना से लिया है मैं ने

जब कभी उन की जफाओं की शिकायत की है
तजज़िया अपनी वफा का भी किया है मैं ने

मुद्दतों बाद जो इस राह से गुजरा हूँ ‘कमर’
अहद-ए-रफ्ता को बहुत याद किया है मैं ने

लज्ज़त-ए-दर्द-जिगर याद आई
फिर तेरी पहली नज़र याद आई

दर्द ने जब कोई करवट बदली
जिंदगी बार-ए-दिगर याद आई

पड़ गई जब तेरे दामन पर नज़र
अज़मत-ए-दीद-ए-तर याद आई

अपना खोया हुआ दिल याद आया
उन की मख़्मूर नज़र याद आई

दैर ओ काबा से जो हो कर गुज़रे
दोस्त की राह-गुज़र याद आई

देख कर उस रूख-ए-जे़बा पे नकाब
अपनी गुस्ताख नज़र याद आई

जब भी तामीर-ए-नशेमन की ‘कमर’ 
यूरिश-ए-बर्क-ओ शरर याद आई

मोहब्बत का जहाँ है और मैं हूँ
मेरा दारूल-अमाँ है और मैं हूँ

हयात-ए-गम निशाँ है और मैं हूँ
मुसलसल इम्तिहाँ है और मैं हूँ

निगाह-ए-शौक है और उन के जलवे
शिकस्त-ए-नागहाँ है और मै हूँ

उसी का नाम हो शायद मोहब्बत
कोई बार-ए-गिराँ है और मैं हूँ

मोहब्बत बे-सहारा तो नहीं है
मेरा दर्द-ए-निहाँ है और मैं हूँ

मोहब्बत के फसाने अल्लाह अल्लाह
ज़माने की जबाँ है और मैं हूँ

‘कमर’ तकलीद का काइल नहीं मैं
मेरा तर्ज़-ए-बयाँ है और मैं हूँ

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