Mon. Nov 19th, 2018

वह घाव जो भरा नहीं
विद्यादेवी भण्डारी

०४९ साल असार १५ गते । मेरी चार साल की बेटी निशा ने अपना जन्मदिन मनाने की काफी जिद की थी । इस समय तक मेरे परिवार में जन्मदिन मनाने की फर्र्ुसद और चलन दोनों ही नहीं था । इसी दिन पहली बार बडे खुशी के साथ छोटी बेटी निशा का जन्मदिन मनाया गया । इसी क्रम में मदन ने हंसते हुए कहा, “कल मेरा भी तो जन्मदिन था । लेकिन तुम्हें सिर्फबेटी की ही जन्मदिन याद है मेरी नहीं ।”
मदन की यह बात सुनकर मैं दंग रह गयी । पहली बार मालूम चला कि असार १४ गते मदन का जन्म दिन आता है । मैंने भी कहा अब अगले साल से आपके जन्मदिन को भी हम मनाएँगे । पहले आपका फिर बाद में बेटी निशा का जन्मदिन मनाएँगे । मेरी यह बातें सुनकर मदन मुस्कुराए बिना नहीं रह पाए ।
लेकिन वह अगला मौका फिर कभी नहीं आया । जेठ ३ गते फिर कभी ना आने के लिए वो हमेशा के लिए मुझे और अपने को छोडÞकर चले गए । मैं उनका जन्मदिन तो नहीं मना सकी । लेकिन उनकी यादों को जिन्दा रखने के लिए उनके जन्म दिवस पर हर साल मदन जयन्ती मनाती हूँ । उनके निधन के डेढÞ महीने बाद ही उनके जन्मदिवस पर मैंने एक पौधा रोपा था । जो कि हमेशा उनकी मौजूदगी मेरे आस पास या घर के पास होने का एहसास दिलाता है । उसकी शीतल छाँव में हमें ऐसा लगता है मानों उनकी छत्रछाया उनका स्नेह, उनका आशर्ीवाद आज भी हमारे साथ है ।
उनके जन्मदिन पर पहले मैंने कोशिश की कि पार्टर्ीीे तरफ से किसी कार्यक्रम का आयोजन हो लेकिन किसी ने मेरा साथ नहीं दिया । बाद में मैं खुद ही हर वर्षमदन जयन्ती मनाती और देश की वर्तमान राजनीतिक हालत पर विद्वतजनों को बुलाकर चर्चा परिचर्चा करती । कई साल बाद आखिरकार पार्टर्ीीे भी उसे माना और अब पार्टर्ीीी आयोजना में यह सब होता है ।
मदन मेरी जिन्दगी के अभिन्न अंग थे । उनके नहीं रहने का अभाव हमेशा ही मुझे टीस देती है । राजनीति में सक्रिय होने की वजह से इस बात को अपने चेहरे पर नहीं आने देती हूँ लेकिन मन में कहीं ना कहीं उनकी कमी हमेशा मुझे खलती रहती है ।
उनको गुजरे १८ वर्षहो गए लेकिन आज भी मुझे इस बात का रंज है कि उनकी हत्या करने वाले को ढूँढा नहीं जा सका । कई लोग इसे भले ही दर्ुघटना का नाम देते है । मुझे यह भी मालूम है कि इस हत्या का कोई प्रमाण नहीं मिला है । इतनी प्लानिंग करके जिस हत्या को अंजाम दिया जाता है, उसके प्रमाण थोडÞे ना मिलते है । लेकिन यदि सरकार पूरी ताकत लगा दे तो इस राज से पर्दा उठाया जा सकता है ।
मुझे यह भी मालूम है कि मदन की हत्या के बाद से मेरी ही पार्टर्ीीी तीन बार सरकार बन चुकी है । में खुद एक सरकार में रक्षा मंत्री भी रह चुकी हूँ । लेनिक फिर भी उनकी हत्या का प्रमाण जुटाने में असपल रही । इस समय सरकार का ध्यान किसी दूसरे महत्वपर्ूण्ा कामों पर है । इस वजह से उस तरफ ध्यान ना जाना स्वाभाविक है ।
लेकिन आज भी मेरा यही मानना है कि दोषी को तो सजा मिलनी चाहिए । मदन सिर्फएमाले पार्टर्ीीे नेता नहीं थे बल्कि पूरे देश के नेता थे और यह सरकार का दायित्व बनता है कि उनकी हत्या करने वाले को कानूनी कठघरे में लाए । जब तक सरकार इसको एक मिशन बनाकर नहीं चलेगी तब तक इंसाफ नहीं मिल सकता है ।
मदन को खोने की पीडा तो शायद कम ना हो । लेकिन उनके हत्यारे को सजा मिलता देख शायद वह घाव जो अभी तक भरा नहीं, उसपर मलहम का काम करे । इस एक आश लिए मैं आज तक जिन्दा हूँ ।
लेखिका ः दासढुंगा घटना में मारे गए एमाले के पर्ूव महासचिव मदन भण्डारी की पत्नी, पर्ूव रक्षामंत्री एवं एमाले की उपाध्यक्ष हैं ।)

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of