Sun. Nov 18th, 2018

विखण्डन का अाराेप लगाकर संघीयता काे समाप्त करने की साजिश

नश्लीय सोच से ग्रसित लेखक,पत्रकार,बुद्धिजीबी,नेता तथा कार्यकर्ता  क्षणिक स्वार्थ के कारण सबकुछ मटियामेट कर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। इन्हीं क्षुद्रताओं के कारण प्रतिक्रिया स्वरुप जयकृष्ण गोइत और सी के राउत जैसे बिचारधाराओँ का स्वतःसमर्थन दिखाई दे रहा है।
संवैधानिक रुप मे नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्रात्मक प्रणाली को सर्वसम्मति से स्वीकार करने के वावजूद भी राजावादी चित्रबहादुर केसी और कमल थापा के संधीयता विरोधी विचार को आतंरिक समर्थन करते आ रहे (कांग्रेस,एमाले,माओवादी) लगायत तथाकथित सामंत विरोधी सामंती खस नेताओं का द्वेध चरित्र अब नंगा होते जा रहा है। खासकर मधेसियों और जनजातियों के संवैधानिक अधिकार के साथ दो नंबर प्रदेस के सरकार के गतिबिधियों पर खस  सर्वसत्तावादी सामंती संघीय सरकार द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुपमे किए जा रहे हस्तक्षेप और नियंत्रण का षडयंत्र पूर्ण प्रयास वाह्य जगत तक फैलता जा रहा है। परन्तु नेपाल में मधेसी और जनजातियों के साथ सैकड़ों वर्षों से किए जा रहे है अमानवीय व्यवहार के कारण आज नेपाल आम जनाक्रोश रूपी बिद्रोह के भयंकर वारुदी सुरंग का रूप लेते जा रहा है। माओवादी जनविद्रोह ने जनता के मानस में बिद्रोह और संघर्ष के सभी हत्कण्डा सौप दिया है।भीषण जनयुद्ध के बाबजूद भी नेपाल और नेपाली जनता के सम्मान तथा महिमा को विश्वव्यापी तो दूर अपने देस के 77% जनता के मध्य भी स्थापित नहीं कर पाए। सर्वोच्चद्वारा प्रमाणित हत्यारा सरकार के संरक्षण में खुलामन्च पे कानूनी राज्य के समर्थन में भाषण देते हैं।स्तरहीन और नकली प्रमाणपत्र बाले पार्टी के अनुयायियों को देस का प्रमुख न्यायाधीस बनाया जाता है। भ्रष्टाचारियों और बलात्कारियों को संरक्षण देना तथा मौलिक अधिकार की माँग करनेवाले पे गोली चलाना,नेपाल के खस सामंती सरकार का प्रमुख कार्य दिखता है तो वही खस पत्रकारों का काम इनका समर्थन करना और मधेसी तथा जनजातियों को देसद्रोही साबित करना मात्र है। इन्हें अपना पेट भरना है,अब वो जैसे भरे!
प्रदेश २ ने संवैधानिक प्रक्रिया के द्वारा हीं प्रदेश प्रहरी विधेयक पारित किया है। प्रदेश प्रहरी, प्रदेश निजामती सेवा और अन्य सरकारी सेवालगायत ११ ठो अधिकार प्रदेश के पास है। प्रदेश अधिकार के सूची से सम्बन्धित विषय में कानुन बनाने की संवैधानिक अधिकार प्रदेस के पास है । प्रदेश संसद् से पारित किए विधेयक को प्रदेश प्रमुख एकबार सुझाब के लिए उसी संसद में वापस भेज सकता है। परन्तु,अस्वीकार नहीं कर सकते।
संसद ने पुनः प्रमाणीकरण के लिए प्रदेश प्रमुख के पास भेजा तो उसे १५ दिन के भीतर प्रमाणीकरण करना पड़ेगा ही।इसी संवैधानिक अधिकार को प्रयोग कर प्रदेश २ के सरकार ने प्रदेश प्रहरी विधेयक पारित किया है। इससे अन्य प्रदेश को भी प्रेरणा और हिम्मत बढ़ गया है, की यदि प्रदेश को संवैधानिक अधिकार देने के विषय में संघ सरकार ने आलटाल किया तो अब प्रदेश अपना रास्ता निकाल विकास के पथपर आगे बढे। क्यूंकि लोकतंत्र में अधिकार के लिए न लड़ना नपुंसकता है। और प्रदेस नंबर दो के सरकार प्रमुख माननीय मुख्य मंत्री लालबाबू राउत जी ने वो हिम्मत और प्रज्ञा को प्रयोग किया है। जो एक ईमानदार जनप्रेमी नेता को शोभा देता है। परन्तु नेपाल के बुद्धिजीबियों को यह कदम बिखण्डन वादी सोच दिखाई दिया। नेपाल एक पौराणिक इतिहास से महिमा मंडित देश है, परन्तु यहाँ के नश्लीय सोच से ग्रसित लेखक,पत्रकार,बुद्धिजीबी,नेता तथा कार्यकर्ता  क्षणिक स्वार्थ के कारण सबकुछ मटियामेट कर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। इन्हीं क्षुद्रताओं के कारण प्रतिक्रिया स्वरुप जयकृष्ण गोइत और सी के राउत जैसे बिचारधाराओँ को स्वतःसमर्थन दिखाई दे रहा है। मधेसी जनता और यहाँ के युवाओं हृदय में नेपालीपन का सागर उमड़ने के बाबजूद भी क्रान्ति की ओर अग्रसर दिखना उसका बाध्यात्मक अवस्था है, जो नश्लीय अत्याचार के प्रतिक्रिया में उबल परा है।
मधेस के अधिकार के लिए बोलनेबाले जिस किसी में भी काठमांडू के बिद्वानों को विखंडनकारी ही दिखाई देता है। देस को लूटनेबाले, विध्वंस मचानेबाले,नरसंहार करानेबाले में देसद्रोही बृत्ति नहीं देखाई देता है। लोकतंत्र में खुलेआम राजा के गुणगान करने बालो में राष्ट्रीय अखंडता दिखाई देता है। सैकड़ों वर्षों से अधिकार के लिए लड़ रहे मधेसियों में राजा,राणा,विपी, गणेशमान,देउबा,प्रचंड,बाबुराम आदि सबको भारतीय नजर आता है। मधेस तथा मधेसी को जन्मजात गुलामी के जंजीरों में जकड़े रखने के लिए दुनियाँ के समक्ष मधेसी को खानाबदोस जाती के रुपमे प्रस्तुत करना कितना गंभीर अपराध है!गणतंत्र नेपाल का प्रथम प्रमाणिक राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति मधेसी मूल का होना गैर हिन्दू आर्य और नश्लीय सोच के मुहपर गंभीर तमाचा था।
राष्ट्र के किसी भी महत्वपूर्ण पद पर आसीन व्यक्ति यदि झूठ बोलता है तो वह विखंडनकारी है, सर्वोच्च अदालत के सर्वोच्च न्यायाधीस का प्रमाण पत्र नक्कली होना सबसे बड़ा देसद्रोही का प्रमाण है।
इस हालत में जब संघीय सरकार भीमसेन थापा की पत्नी द्वारा श्रापित है,और वह विकास नहीं कर सकता तो क्या प्रदेश सरकार भी अपने को श्रापित मान ले? नहीं अब यह देश लूटने वाली राजनीति नहीं चलेगी। दो नंबर प्रदेश वाहेक के बाकी सभी प्रदेश सरकार एमाले की बहुमत वाली है। अतः उसपर उसका पार्टीगत नियंत्रण रहेगा, लेकिन प्रदेश दो अपनी विकास के गति में अवरोध पैदा करने का अधिकार किसीको भी नहीं देगा। कल उसे जनता के सामने खड़ा होना है। जनता के प्रश्नों का सीधा उत्तर देना है। एमाले, कांग्रेस और सी के राउत जैसों से टक्कर लेना है। जो की विकास के दम पर ही लिया जा सकता है। और विकास के लिए संवैधानिक अधिकार का शतप्रतिशत प्रयोग करना एक सक्षम सरकार का कर्तव्य होता है। भूगोल,समाज,संस्कृति,भाषा और रीतिरिबाज सबसे अलग और सबसे समृद्ध यह प्रदेश नश्लीय धूर्त सोच के लिए गले का घेघ बनने लगा है। तब तो पूर्व प्रधान मंत्री प्रचंड ने धमकी देते हुए, संघीयता तक को समाप्त होने की आशंका प्रकट कर डाला। आज नेपाल के सभी नश्लीय पत्रकार,लेखक, कर्मचारी और राजनीति कर्मी लगायत वैदेशिक सक्तियाँ भी प्रदेस दो पर ही ध्यान लगाए हुए है। संघीय सरकार इसे अधिकार विहीन बनाकर असफल करने में लगी है तो वही नेपाली पत्रकार इसे बदनाम करने पर तुला है। कोई शब्दों के वाण चला रहा है, तो कोई इर्ष्या से जलभुनकर बिखंडनकारी का आरोप लगा रहा है। कभी मुख्य मंत्री को विदेस जाने से रोका जाता है, तो कभी विदेयक के नामपर बबाल पैदा किया जाता है। यह सब मधेस के पहचान को मिटाने के लिए मात्र है।
जब संविधान के धारा 57 (2) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है की प्रदेस का अधिकार अनुशुची 6 के अनुसार ही रहेगा और इस अधिकार का प्रयोग संविधान तथा प्रदेस के कानून अनुसार ही किया जाएगा। अनुसूची–६ अन्तर्गत प्रदेश के अधिकार के प्रथम में ही ‘प्रदेश प्रहरी, प्रशासन और शान्ति सुरक्षा’को उल्लेख किया गया है। प्रदेश अनुसन्धान ब्युरो, प्रदेश सरकारी कार्यालय और प्रदेश लोकसेवा आयोग भी सूची में प्रस्ट रूप में उल्लेख किया गया है।और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की इन  विषयों में कानुन बनाकर कार्यान्वयन करने के लिए प्रदेश सरकार को संघ की कोई अनुमति तथा निर्देशन के लिए इंतज़ार करने की जरुरत नहीं है। यही तो संघीय प्रणालीको की पारम्भिक नियम है। फिर ओभरटेक बाली बात कहाँ से आया? इस सामंती हुकुम का क्या अर्थ लगाया जाय? मैं सीधा देख पा रहा हूँ, की प्रदेस दो के सरकार और जनता के दूरगामी सोच और विकास हेतु सक्रियता के आगे संघ सरकार धरासायी होने लगी है। जमिन से पाँव उखाड़ने लगे हैं, और अपनी नश्लीय साख को डूबते देख हिन्दूत्व के जरिए राजा को स्थापित कर संघियता को तिलांजलि देने पर बैचारिक रूप से केन्द्रित होने लगें हैं। परन्तु दोष लगेगा मधेसी और प्रदेस दो पर, की इसने देस को बिखंडित करने का षडयंत्र कर रहा था, अतः मधेसी को आगे आने देने से अच्छा है, राजा के गुलामी को शिरोधार्य कर लिया जाय। क्यूंकि नेपाली समाजवाद,साम्यवाद,मार्क्सवाद,लेलिनवाद और माओवाद का मौलिक श्रोत राजावाद ही तो है।

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