Wed. Sep 26th, 2018

विदेश में मौत

विनय सौरभ

मुझे यकÞीन है
किसी रोज गहरी आकस्मिकता के साथ यह देह छूट जाएगी
दिन जब ऊपर को आ चुका होगा
पड़ोसियों को बहुत देर के बाद
मिलेंगे संकेत
तब तक बच्चे स्कूल
और कामगार अपने काम को जा चुके होंगे,
घरेलू स्त्रियाँ रसोई की खटपट में जुटी होंगी
रोशनदान से कोई फुर्तीला आदमी भीतर आएगा
और खोलेगा सामने का दरवाजÞा
अगर मैं परदेश में मरा तो
निश्चित ही थोड़ी दिक्कत आ सकती है
पड़ोसी मेरे स्थायी पते के लिए परेशान होंगे,
वे शहर में मेरे किसी भी परिचय का हर संभव चिह्न ढूँढेंगे
मुरदे को बहुत देर तक
यूँ ही नहीं छोड़ा जा सकता !
वे एक परदेशी के वास्ते जरूरी औपचारिकता
और अपना धर्म निभायेंगे ही
बच्चों में मृतकों को लेकर थोड़ा कौतुहल होता ही है
वे मेरी शवयात्रा को औचक नजÞरों से देखेंगे,
जिसमें यकÞीनन गिनती के लोग होंगे !
वह एक कवि की शवयात्रा नहीं होगी !!
यह स्वीकार कर लेने में क्या हर्ज है कि उस शवयात्रा में
एक मुरदे को शमशान तक पहुँचाने की हड़बड़ी में
सभी लोग भरे होंगे !
हालाँकि मृत्यु के बारे में कुछ निश्चित नहीं है
और आत्मा के बारे में ठीक ठीक कुछ भी कहना कठिन जैसा है
आत्मा अगर है तो,
वह मेरी शवयात्रा को जाता हुआ देखेगी
अगर वह हँसती है तो
आशंका है कि वह मृत्यु के बाद की
मेरी नियति पर हँसेगी !
कहेगी ही
कि परदेश में भी मरे
और अंत तक कविता के कोई मित्र नहीं बना सके !

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