Wed. Oct 17th, 2018

विपक्ष के भी चहेते रहे अटल बिहारी वाजपेयी : डा. गोपाल नारसन

हिमालिनी, अंक, सितम्बर २०१८ | भारतीय राजनीति मे एक मात्र अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे सर्वमान्य नेता रहे है, जो सत्ता के पक्ष विपक्ष दोनो के लिए सम्मानीय और लोकप्रिय रहे । लम्बे समय से याददास्त खो जाने की बीमारी से जूझते रहे वाजपेयी का जाना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा आघात है । लम्बे समय से सक्रिय राजनीति मे न रहने के बावजूद अटल देश के लिए प्रेरणा का माध्यम अवश्य बने रहे । उन्होंने राजनीति की एक बड़ी पारी खेली और पांच पीढि़यों तक के सहभागी बने । जीवन पर्यन्त कुंवारा रहे वाजपेयी उन कुंवारे राजनेताओ के लिए आशा की किरण रहे जो उनके अनुसार ही राजनीतिक सफलता चाहते थे । विदित हो सन १९५७ की लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फÞ चार सांसद थे । इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन से कराया गया । तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जनसंघ नाम की पार्टी को नहीं जानते । अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे ।
आज भारतीय जनसंघ की उत्तराधिकारी भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो । शायद यह बात सच हो । लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफÞर में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं । नेहरु गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल है जिन्होंने सिर्फÞ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बलबूते पर सरकार बनाई ।
एक अध्यापक के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए जीवन का शुरुआती सफÞर जÞरा भी आसान न था । २५ दिसंबर१९२४ को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कालेज और कानपुर के डीएवी कालेज में हुई । उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया । उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया ।
१९५१ में वो भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे । अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया । वैसे लखनऊ में एक लोकसभा उप चुनाव में वह हार गए थे । १९५७ में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया । लखनऊ में वे चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी जÞमानत जÞब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वह दूसरी लोकसभा में पहुंचे । अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी ।
१९६८ से १९७३ तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे । विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया । १९७७ में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया । इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं । १९८० में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे । १९८० से १९८६ तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे ।
अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए । दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक वे संसद मे लगातार बने रहे लेकिन बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही । खÞासतौर से १९८४ में जब वह ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे । १९६२ से १९६७ और १९८६ में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे ।
१६ मई १९९६ को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने । लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से ३१ मई १९९६ को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा । इसके बाद १९९८ तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे । १९९८ के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने । लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए ।
१९९९ में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया । गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली । इस तरह वाजपेयी को लगातार तीन बार देश का प्रधानमन्त्री बनने का अवसर मिला । प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू से लेकर पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी व राजीव गांधी भी वाजपेयी का बहुत सम्मान करते थे । विपक्ष के नेता के रूप मे अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी को उनकी सफल विदेश नीति के लिए उन्हें संसद मे दुर्गा कहकर उनका सम्मान किया था । वे प्राय दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचते थे । उनकी इसी सोच ने उन्हें बड़ा बनाया और सबका चेहता भी । ऐसे सर्वमान्य और लोकप्रिय नेता को शत शत नमन ।

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