Sun. Oct 21st, 2018

वृद्धावस्था में सुखी कैसे रहें:-रबिन्द्र

सार में प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना चाहता है और ऐसी चाह स्वाभाविक ही है। दुःखों और कष्टों का जीवन कोई नहीं चाहता। यद्यपि यह सत्य हैं कि इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है, उसे सुख और दुख दोनों का मिला-जुला जीवन जीना पडÞता है। सुख-दुःख जीवन में आते रहते है। सुख तो सभी भोग लेते हैं किन्तु, दुःख को धीर ही सहते हैं। तार्त्पर्य यह है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सुख और दुःख दोनों को भोगना आवश्यक होता है। मनुष्य के जीवन की चार अवस्थाओं में अन्तिम अवस्था वृद्धावस्था ही मुख्य रुप से विशेष कष्टप्रद होती है। इसलिए लोग वृद्धावस्था को भी एक बीमारी मानते है। इस अवस्था में शरीर के सभी अंग शिथिल हो जाते है। शरीर कमजोर हो जाने पर अनेक रोगों का भी आक्रमण होने लगता है और फिर मनुष्यों को दूसरे के सहारे ही शेष जीवन गुजारने के लिए वाध्य होना पडÞता है।
वृद्धावस्था के शरीरिक कष्टों को भोगते समय यदि परिवार के लोग की उपेक्षा भी सहन करनी पडÞे और इसके साथ यदि वह आर्थिक दृष्टि से भी लाचार हो तो फिर उसे मानसिक क्लेश भी होता है, जो शरीरिक कष्टोंसे भी अधिक दुखदायी हो जाता है। वृद्धावस्था के शारीरिक और मानसिक कष्टों से बचने के लिए प्रत्येक मनुष्य को पर्ूव से ही सावधान हो जाना चाहिए ताकि बुढÞापे को अधिक दुःखदायी होने से बचाया जा सके।
विदुर नीति में कहा गया है- पर्ूर्वे वचसितत् कुयदियेन वृद्ध सुखं बसेत्। अर्थात पहली अवस्था में वह काम करे, प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वृद्धावस्था के पर्ूव ही उसके लिए मानसिक रुप से तैयार रहे और आर्थिक दृष्टिसे कुछ बचत सुरक्षित रखे ताकि उसे अपनी प्रतिदिन की आवश्यकताओं के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरुरत न पडÞे। वृद्धावस्था के लिए दो बातें अधिक महत्वपर्ूण्ा हैं, पहली बात- जैसे प्रातः भ्रमण, नित्यकर्म, योगाभ्यास आदि। दूसरी बात- आर्थिक रुपसे कुछ बचत सुरक्षित रखना आवश्यक है। कहा गया है- पहला सुख निरोगी काया, दुजा सुख जब घर में हो माया।
वृद्धावस्था को सुखी बनाने के लिए महत्वपर्ूण्ा बातें-
जरूरत से ज्यादा मत बोलिए। बिना मांगे बहु-बेटी को सलाह मत दीजिए। साठ साल की उम्र हो जाए तो अधिकार का मोह छोडÞ दीजिए। तिजोरी की चाभी भी बेटे को दे दीजिए। मगर हाँ अपने लिए इतना जरुर बचा लेना चाहिए कि कल को किसी के सामने हाथ न फैलाना पडेÞ।
कुछ उपयोगी सुत्र
रहे निरोगी जो कम खाए।
बात न बिगरे जो गम खाए।।
यथासम्भव भोजन भी सुपाच्य हो, शाकाहारी हो । अतः अधिक नमक परहेज करें। अपनी रुचि के अनुसार कार्य करें। तथा बागवानी, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, सत्संग, समाजसेवा के कार्यों में भाग लेने का प्रयत्न करें और अनावश्यक चिन्ता न करें। व्यस्त रहें, क्योंकि खाली मन शैतान का अड्डा !
शारीरिक व्याधियों, कष्टो की चिकित्सा मिल भी सकती है, परन्तु मानसिक कष्टों की औषधि किसी चिकित्सक के पास सम्भवतः नहीं मिलती।

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