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वेदों में भगवान् विश्वकर्मा : विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’, सन्दर्भः विश्वकर्मा पूजा,

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’, काठमांडू , 17 सेप्टेम्बर ।

सृष्टि के आरंभ से ही भगवान् विश्वकर्मा सर्वपूज्य रहे हैंस जैसा कि उपलब्ध सभी वेदों, धर्म–ग्रन्थों, पुराणों, उपनिषदों आदि अनेक पुस्तकों में देखने को मिलता है । इसका विस्तार न होने का कारण मात्र सामाजिक अशिक्षा है । भगवान् विश्वकर्मा के सृष्टि निर्माता होने के पर्याप्त प्रमाण वेदों में मिलते हैं । ब्रह्मा उपनिषद् के तैत्तेरीय श्रुति के अनुसार – भगवान् विश्वकर्मा सम्पूर्ण जगत् के उत्पन्न करने वाले जगत्पिता हैं । उन्हीं से सर्वसृष्टि उत्पन्न हुई है । सम्पूर्ण लोक के जीव सिद्ध, किन्नर इन सबके पालन करने वाले पुराण पुरुष भगवान् विश्वकर्मा हैं । विराट रूप भगवान् विश्वकर्मा सर्वत्र व्यापक हैं जिनसे ब्रह्मा, रूद्र, विष्णु, शतमुख और देवता मुनि इत्यादि उत्पन्न हुए हैं । विश्व देवता, आठो वसु, पितर, गन्धर्व सम्पूर्ण लोक भगवान् विश्वकर्मा से उत्पन्न हुए हैं ।

vishwakarma

यजुर्वेद अध्याय ३१, मंत्र १७ के अनुसार भगवान् विश्वकर्मा ने पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु की रचना की है । आविष्कार एवं निर्माण कार्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण भगवान विश्वकर्मा के द्वारा किया गया है । पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होने वाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है । कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान् का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान् का त्रिशूल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान् विश्वकर्मा ने ही किया है ।

देवगुरु बृहस्पति की भगिनी भुवना (महर्षि अंगीरा की बेटी) के पुत्र विश्वकर्मा की वंश परंपरा अत्यंत वृद्ध है । स्कन्दपुराण के नागर खण्ड में भगवान् विश्वकर्मा के वंशजों की चर्चा की गई है । ब्रह्मस्वरूप विराट विश्वकर्मा पंचमुख हैं । विश्वकर्मा के पांच मुखों से पांच ब्र्राह्मण उत्पन्न हुए हैं । उनके नाम हैं– मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ । सानग ऋषि से ‘मनु’ उत्पन्न हुए । मनु सबसे ज्येष्ठ हैं । ये लौह कर्म करते थे । लोहे के शस्त्र बनाते थे, और पांचों जातियों को आयुध देते थे । इनकी सन्तान लौहशिल्प कर्म करते हैं । अर्थात् इनके वंशज लोहकार के रूप में जाने जाते हैं । लोहार जाति के लोग मनु की सन्तान हंै । अतः वे उस्ताद कहलाते हैं । सनातन ऋषि से ‘मय’ उत्पन्न हुए । ये काष्ठ शिल्प कर्म करते थे । ये काष्ठशिल्प के अधिपति हैं । इनकी संतानें, पुत्र, पौत्रादि (बरही या बढ़ई) काष्ठ शिल्प कर्म करते चले आ रहे हैं । अहभून ऋषि से ‘त्वष्टा’ उत्पन्न हुए । इनका ताम्रशिल्प कर्म है और यह ताम्रशिल्प के अधिपति हैं । इनकी संतति (ठठेरा, ठठेरिया, टमाटा) भी ताम्रशिल्प–रूपी कर्म करते चले आ रहे हैं । प्रत्न ऋषि से शिल्पी पैदा हुए । ये पाषाण–शिल्प कर्म के अधिपति के रूप में जाने जाते हैं । अभी भी इनकी संतति शिलाशिल्प के कर्म करते आ रहे हैं । पत्थरकट्टा या कुशबाडिया जाति के लोग इसी के अंतर्गत आते हैं । सुपर्ण ऋषि से ‘दैवज्ञ’ (तक्षा) उत्पन्न हुए । यह सुवर्णशिल्प कर्म के अधिपति कहलाते हैं । इनकी संतति (विश्वकर्मा, सुनार÷सोनार÷सोनी÷स्वर्णकार) भी सुवर्ण कर्म करते आ रहे हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि लोहार, बरही (बढ़ई), पत्थरकट्टा, ठठेरा÷ठठेरिया÷टमाटा, विश्वकर्मा, सुनार÷सोनार÷सोनी÷स्वर्णकार सभी भगवान् विश्वकर्मा की ही संतति हैं ।

मनु, मय, शिल्पी, त्वष्टा और दैवज्ञ– ये सभी ऋषि वेदों में पारंगत थे । इनकी रचनाएं लोकहितकारणी हैं । इन्हें ‘पांचाल ब्राह्मण’ भी कहते हैं । ये पांचों वन्दनीय ब्राह्मण हैं और यज्ञ कर्म करने वाले हैं । इनके बिना कोई भी यज्ञ सफल नहीं हो सकता ।

विष्णुपुराण के पहले अंश में विश्वकर्मा को देवताओं का ‘देव– बढ़ई’ कहा गया है तथा शिल्पावतार के रूप में सम्मान योग्य बताया गया है । स्कन्दपुराण में उन्हें देवायतनों का स्रष्टा कहा गया है । कहा जाता है कि वह शिल्प के इतने ज्ञाता थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाउ तैयार करने में समर्थ थे ।

विश्व के सबसे पहले तकनीकी ग्रन्थ ‘विश्वकर्मीय’ ग्रन्थ माने गये हैं, जिसमें न केवल वास्तु विद्या, बल्कि रथादि वाहन और रत्नों पर विमर्श है । विश्वकर्मा प्रकाश, जिसे वास्तुतंत्र भी कहा गया है, विश्वकर्मा के मतों का जीवंत ग्रन्थ है । विश्वकर्मा पुराण एवं विश्वकर्मा प्रकाश के अनुसार भगवान् विश्वकर्मा का जन्म १७ सितंबर (नेपाली तिथि असोज १ गते) को हुआ था । इसीलिए हर वर्ष १७ सितंबर को विश्वभर भगवान् विश्वकर्मा की पूजा धूमधाम से की जाती है ।

नेपाल में भी असोज १ गते भगवान् विश्वकर्मा जी की पूजा की जाती है । इस अवसर पर विविध प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । इस बार राजधानी में ‘मिस विश्वकर्मा २०७३’ नामक एक भव्य प्रतियोगिता रखी गई है । इस प्रतियोगिता में विश्वकर्मा जाति की ५ दर्जन से अधिक प्रतियोगियों ने भाग ली । समग्रतः प्रत्येक विश्वकर्मा सन्तान को अपने पूर्वजों पर गर्व करते हुए विश्वकर्मा समाज के सर्वांगिण विकास हेतु सतत् प्रयास करते रहना चाहिए ।

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अप्सन नेपाल
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अप्सन नेपाल

बिनोद सर
नमस्कार,
तपईको लेख धेरै राम्रो छ।यसरी नै कलम चलाउदै रहनुस।
बधाई तथा शुभकामना ….