Wed. Nov 21st, 2018

वेश्या समाज में बहिष्कृत है, परन्तु वेश्यालय की मिट्टी के बिना दुर्गा अधूरी है : डा श्वेता दीप्ति

डा श्वेता दीप्ति

हम सभी जानते हैं कि दुर्गा की प्रतिमा तब तक पूरी नहीं हाेती जब तक वेश्यालय के प्रांगण की मिट्टी न उसमें मिलाई जाय । पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार देवी की मूर्ति बनाने में गोमूत्र, गोबर, लकड़ी, जूट के ढांचे, सिंदूर, धान के छिलके, पवित्र नदियों की मिट्टी, विशेष वनस्पतियां और जल के साथ निषिद्धो पाली की रज ली जाती है. निषिद्धो पाली का मतलब होता है वर्जित क्षेत्र और रज यानी मिट्टी. यहां वर्जित क्षेत्र का तात्पर्य उन इलाकों से है जहां वेश्यावृति होती है । ऐसी मान्यता है कि जब तक वेश्यालय के बाहर पड़ी मिट्टी को मूर्ति के सृजन के लिए इस्तेमाल न किया जाए तब तक वह मूर्ति अधूरी ही रहती है । 

डा श्वेता दीप्ति

हिन्दुअाें का महान पर्व दशहरा यानि दुर्गा पुजा समाप्त हाे गया । शक्ति और उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक नौं तिथि नौं नक्षत्र नौं शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जाता हैं. सबसे पहले श्री राम जी ने नवरात्रि पूजा समुद्र तट पर की थी और उसके बाद उन्होंने १० वें दिन लंका पर चढ़ाई शुरू की थी. तब से नवरात्री असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाने लगा. दुर्गा पूजा वास्तव में शक्ति पाने की इच्छा से की जाती है जिससे संसार की बुराइयों का नाश हो सके । जिस प्रकार देवी दुर्गा ने सब देवी-देवताओं की शक्ति एकत्र करके दुष्ट राक्षस महिषासुर को मारा था और धर्म को बचाया था, उसी तरह हम अपनी बुराइयों पर विजय प्राप्त करके मनुष्यता  को बढ़ावा  दे सकें, यही दुर्गा पूजा का मुख्य संदेश  है ।

पर एक अाैर जाे संदेश है इस पूजा का वह है नारी का सम्मान अाैर उसकी श्रेष्ठता काे स्वीकार करना । वैसे ताे सदियाें से नारी काे देखने का एक ही नजरिया रहा है । नारी की अात्मा से पहले उसके शरीर काे देखा जाना अाैर यही वजह है कि अाज भी सभ्य कहलाने वाले समाज में नारियाें का अस्तित्व खंडित ही हाे रहा है । फिलहाल भारत में जाे मीटू की लहर ने नारी शाेषण के अध्याय काे खाेला है वह निश्चय ही सराहनीय है । वैसे यह भी कटु सत्य है कि इस मसले का एक गाैण पक्ष भी जरुर हाेगा जहाँ इससे परे काेई सच छिपा हाे परन्तु उसकी तुलना में शाेषण की सत्यता अपनी जगह कायम है ।

अाज दुर्गा पूजा में निहित महिला सम्मान से जुडे इसी पक्ष काे देखने की काेशिश कर रही हूँ । हम सभी जानते हैं कि दुर्गा की प्रतिमा तब तक पूरी नहीं हाेती जब तक वेश्यालय के प्रांगण की मिट्टी न उसमें मिलाई जाय । पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार देवी की मूर्ति बनाने में गोमूत्र, गोबर, लकड़ी, जूट के ढांचे, सिंदूर, धान के छिलके, पवित्र नदियों की मिट्टी, विशेष वनस्पतियां और जल के साथ निषिद्धो पाली की रज ली जाती है. निषिद्धो पाली का मतलब होता है वर्जित क्षेत्र और रज यानी मिट्टी. यहां वर्जित क्षेत्र का तात्पर्य उन इलाकों से है जहां वेश्यावृति होती है । ऐसी मान्यता है कि जब तक वेश्यालय के बाहर पड़ी मिट्टी को मूर्ति के सृजन के लिए इस्तेमाल न किया जाए तब तक वह मूर्ति अधूरी ही रहती है ।

ऐसे में यह सवाल उठना जायज़ है कि जब हमारे समाज में वेश्यावृत्ति को अधार्मिक माना जाता है और देह व्यापार करने वालों को घृणा की नजर से देखा जाता है । तो इतने पवित्र अनुष्ठान में उनके घर के सामने पड़ी मिट्टी का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. इसका जवाब मिलता है वहां प्रचलित पौराणिक तथा लोक कथाओं में ।

किस्सा है कि बहुत पहले एक वेश्या, देवी दुर्गा की बहुत बड़ी उपासक हुआ करती थी । लेकिन वेश्या होने के कारण समाज में उसे सम्मान प्राप्त नहीं था । समाज से बहिष्कृत उस वेश्या को तरह-तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ता था । मान्यता है कि अपनी भक्त को इसी तिरस्कार से बचाने के लिए दुर्गा ने स्वयं आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई थी । साथ ही, देवी ने उसे वरदान भी दिया था कि उसके यहां की मिट्टी के उपयोग के बिना प्रतिमाएं पूरी नहीं होंगी । जानकारों के मुताबिक शारदा तिलकम, महामंत्र महार्णव, मंत्रमहोदधि आदि ग्रंथों में इसकी पुष्टि की गई है ।

इसके अलावा इस मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे एक और धारणा भी है । माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति किसी वेश्यालय के अंदर जाता है तो वह अपनी सारी पवित्रता वेश्यालय की चौखट के बाहर ही छोड़ देता है और इसलिए चौखट के बाहर की मिट्टी पवित्र हो जाती है । यह इस बाबत शायद सबसे प्रचलित और लोकप्रिय धारणा है । हालांकि इसे हमेशा ही पुरुष प्रधान समाज द्वारा नारी के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है । जाे सच भी है अगर वेश्यालय जाने वाला पुरुष बाहर अाकर पवित्र हाे जाता है ताे फिर वेश्या अपवित्र कैसे हाे जाती है ? जबकि वाे जाे कर रही है उसमें किसी प्रकार का छिपाव नहीं है पर उसे हम घृणा की दृष्टि से देखते हैं लेकिन उसके पास जाने वाला पुरुष सबकी निगाहाें से छिपकर जाता है अाैर अपनी क्षुधातृप्ति करता है ताे वह घृणा का पात्र क्याें नहीं हाेता ?

अर्थात दुर्गा पूजा से जुडी यह कथा भी कहती है कि वेश्या भी घृणायाेग्य नहीं है वह भी इंसान है अाैर उसके अस्तित्व काे अगर ईश्वर स्वीकार करता है ताे अाम जन काे उसे हिकारत या घृणा की दृष्टि से देखने का हक नहीं है । दुर्गापूजा की इस मान्यता काे हम एक समाज सुधार आंदोलन के रूप में भी देखते हैं । सम्भवतः मूर्तियों के निर्माण में वेश्‍यालय की मिट्टी के इस्तेमाल का मकसद उस पितृसत्तामक समाज के मानस को कचोटना भी है जिसकी वजह से महिलाओं को नर्क में धकेलने वाला यह कारोबार चलता है ।

हमारी संस्कृति अाैर परम्पराअाें में कई एेसे तथ्य हैं जिनसे हम सीख ले सकते हैं अाैर एक नई साेच के तहत समाज का निर्माण कर सकते हैं । मैं यह नहीं कहती कि हमारे धार्मिक ग्रंथाें काे हम ज्याें का त्याें स्वीकार करें क्याेंकि हर ग्रंथ अपने वक्त के परिवेश काे व्याख्यायित करता है। तर्क की अावश्यकता पडती रही है । परन्तु यह तर्क महज कुख्याति पाने के लिए न हाे बल्कि अपने धर्म संस्कार अाैर परम्पराअाें काे वैज्ञानिक दृष्टिकाेण से परिभाषित कर स्वीकार करने की दिशा में हाे ।

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