Tue. Nov 20th, 2018

शासन बदला लेकिन सत्ता की मानसिकता और चरित्र नहीं : विनोदकुमार विश्वकर्मा

विनोदकुमार विश्वकर्मा, काठमांडू | स्वतन्त्रता का अर्थ है इतिहास में हमारी वास्तविक सम्मानजनक उपस्थिति जो इतिहास हमारा स्थान नहीं दे सकता, वहां स्वतन्त्रता का कोई अर्थ नहीं । नेपाल में आज जिस तरह का वैचारिक व राजनीतिक संकट है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वास्तव में यह स्वतन्त्रता का संकट है । स्वतन्त्रता को नयाँ रास्ता चाहिए । न सिर्फ भौतिक व राजनीतिक रुप से स्वतन्त्रता होनी चाहिए, अपितु सांस्कृतिक व वैचारिक रुप से भी एक रास्ते की खोज है ।
किसी भी राष्ट्र को स्वतन्त्र घोषित कर देने से उसकी वास्तविक स्वतन्त्रता का अवबोध नहीं होता । यदि लोकतन्त्री स्वरुप भी वहां हो तो भी लोकतन्त्र के नाम पर परिवारवाद का पोषण चल रहा है, ताकतवर को और भी ताकत मिलती जा रही है, निर्धन और गरीब होता रहा है । स्वतन्त्रता को व्यापक बनाए जाने की जरुरत है, जहां शब्द, श्रम, कल्पना व विवेक की जगह हो । यदि समाज को व्यापकता और राष्ट्र को स्वतन्त्रता चाहिए तो व्यक्ति की भी संप्रभुता होनी चाहिए । आज नेपाल में स्वतन्त्रता का बहृत् अर्थ है, समंजनशील होना, जिसमें सांस्कृतिक स्वतन्त्रता, भाषाई समंजन, वर्गीय विभेदों से मुक्ति के लिए केन्द्र में जग हो । स्वतन्त्रता का अर्थ है– ऐसी संस्कृति की प्रतिष्ठा, जिसमें सबके लिए जगह हो, जिसमें दूसरों के लिए इज्जत हो ।
दूसरी तरफ स्वतन्त्रता देश के नागरिकों के हक और हुकूक की बात करती है । नेपाल ने यही तरीके से लोकतान्त्रिक प्रतिबद्धता का वरण किया है । उम्मीद थी कि नमक रोटी खा लेंगे लेकिन स्वतन्त्रता की सांस के साथ जिंदगी गुजारेंगे । हालांकि प्रजातन्त्र पुनस्र्थापना पश्चात् कुछ क्षेत्रों में बदलाव आया है तो जरुर, लेकिन किसके लिए ? शायद समाज के उन वर्गों के लिए जो पहले से ही समृद्धशाली थे । आम–अवाम तो पहले भी बुनियादी आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए तरस रहे थे और आज भी कमोवेश वही हाल है । शासन बदला लेकिन सत्ता की मानसिकता और चरित्र नहीं । महंगाई, बेरोजगार, भुखमरी और भ्रष्टाचार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है । अमीर और अमीर जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है । ऐसे सवाल उठना लाजिमी है, कैसी स्वतन्त्रता ?

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of