Tue. Nov 20th, 2018

संसारी माई की पुजा के लिये बढ़ रहे लोगो की भीड़ संभाले नहीं संभल रही, (फोटो सहित )

जलेश्वर के वरुण सरोवर के पूर्व में स्थित संसारी माई  के प्रति समर्पित

अजय कुमार झा जलेश्वर | अगर आपको लगता है कि दुर्गा, लक्ष्मी, महादेव, हनुमान और विष्णु जैसे देवता ही हिंदुओं के सबसे प्रिय और सबसे अधिक पूजे जाने वाले देव हैं तो आपको अपनी जानकारी पर पुनिर्वचार करने की जरूरत है | ज्यादातर लोगों के कुलदेवता और ग्रामदेवता इन नामों से इतर हैं| अलग-अलग गांवों का सर्वेक्षण करने पर मैंने इस इलाके के जिन पापुलर कुलदेवताओं और ग्रामदेवताओं के नाम संकलन किया है, वे हैं, गोरैया बाबा, बंदी माय, सोखा बाबा, कारिख, सलहेस, दीना भदरी, बह्रम बाबा, गिहल, विषहरा,आदि आदि।
नेपाल के प्रदेश नंबर दो की राजधानी जनकपुर से 14 की मी दक्षिण भारतीय बोर्डर भिठ्ठामोड से 4 कि मी उत्तर में स्थित जलेश्वर नगर जो महोत्तरी जिला अंतर्गत पड़ता है। इसका अपना ही ऐतिहासिक और पौराणिक अस्तित्व है। पौराणिक काल में राजा जनक के द्वारा स्थापित जलेश्वर नाथ महादेव नेपाल लगायत भारत के हिन्दू धर्मावलम्वियों केआस्था और श्रद्धा का केंद्र है।
जलेश्वर के वरुण सरोवर के पूर्व में स्थित संसारी माई की मंदिर में पहले 12 (वाह्र वर्ष) और अब पाँच वर्ष पर मनाए जानेवाले संसारी माई की पूजा यहाँ के दुसरे वृहद् धार्मिक महत्व और महोत्सव का केंद्र है। इसबार भी बड़ी धूमधाम के साथ संसारी माई की पूजन का आयोजना किया गया है। जलेश्वर के हर घर से चढावा चढ़ाया जा रहा है।
जलेश्वर के इर्द गिर्द के गाव से तथा उत्तरी विहार से बढ़ रहे लोगो की भीड़ संभाले नहीं संभल रही है। पिछले एक हप्ते से सत्संग और रास लीला का भव्य आयोजन हो रहा है। बिभिन्न धार्मिक स्थालों से श्रद्धालुओं की भीड़ बढती ही जा रही है। मिठाई,फलफूल,पकवान के साथ ही भारी संख्या में बली प्रदान का भी कार्यक्रम है।  सुवह आठ बजे तक 3000 से अधिक खसी का पुर्जा कट गया था। इस पूजा में पंचवली का विधान है। जिसमे पांच प्रकार के ज8व् की वली दी जाती है। परंपरा से मूल पुजारी के रूप में मुखिया अर्थात मलाह परिवार लोग रहते आ रहे हैं,जो आज भी विद्यमान है।
खासकर यह पूजा प्राकृतिक प्रकोप से अपने परिवार की सुरक्षा हेतु माता के प्रति भरोसा पहले से हीं लोगों में व्याप्त है। आगजनी, बिमारी , महामारी, चेचक तथा हैजा जैसे विनासकारी दुखदायी घटनाओं से निजात हेतु नागरिको ने संसारी माता के शरणागत होना ही एकमात्र सुरक्षा का उपाय देखा था। जो आज एक वृहत धार्मिक परंपरा का स्वरुप धारण कर चूका है।
यहाँ के पुराने स्थानीय जानकर महानुभावो (श्री राजा शाह जी और बलराम साह जी) तथा बजराही के श्री अरुण पाठक जी से बात करने पर पता चला की पहले 12 वर्ष पर मनाया जाता था। प्रत्येक परिवार से मिठाई और वली का चढ़ावा अनिवार्य है। आज से 40 वर्ष पहले की एक घटना याद करते हुए श्री बलराम साह जी कहते हैं की उस समय एक छोटा सा सियार जैसा पशु बच्चों को उठाके मार डालता था। एक दिन एक युवक से उस सियार की मुठभेड़ हो गई। जिसमे वह सियार एक लड़की को लेकर भाग रहा था।उस लड़की को बचा लिया गया। वह आज भी जलेश्वर में ही रहती है। परन्तु उस सियार के थप्पड़ से वह युवक विचलित हो गया। उसे भरोसा नहीं हुआ की एक छोटा सा सियार के थप्पड़ में इतना बल होगा। इसके वाद इस घटना की पूर्णता हेतु स्थानीय संत महात्मा तथा (भगता- सिद्ध) से चर्चा किए जाने पर संसारी माई की पूजा में देरी और अटेरी होने की रहश्योदघाटन हुई। उसके तुरंत वाद धूमधाम के साथ पूजा किए जाने के वाद आजतक न कोई ऐसी दुर्घटना हुई न किसीने उस सियार को ही देखा। इस घटना का तारतम्य माता के साथ कितना सत्य है, यह कहना कठिन है। लेकिन आम जन मानस के हृदय में इसका गहरा छाप देखने को मिला। इस प्रकार के लोकोक्ति तथा जन आस्था के बल पर आज तक इस पूजा की निरंतरता है।
पूजा स्थल से लौटी रेखा कुमारी राय से जानकारी मिली है की आजतक ऐसी भीड़ जलेश्वर में कभी नहीं देखा गया है। कमसेकम मैंने तो नहीं देखा है। हेलीकाप्टर से इस पूजा में सामिल होने लोग पहुचे हैं।
वैसे संसारी माता की पूजा नेपाल के गोरखाली लोग अपनी मूल और कुल देवी के रुपमे करते आ रहे हैं।
इसी प्रकार यदि हम स्थानीय देवी देवताओं के सम्बन्ध में खोज करें तो एक सांस्कृतिक और भावनात्मक गहिराई दिखाई देता है। कुल देवता के रुष्ट हो जाने पर या अवहेलना करने पर लाइलाज आर्थिक और भौतिक विनास का तांडव देखने को मिलता है। यही कारण है की गाव के लोग आज भी अपनी देवी देवता को नहीं भूलें हैं। मैंने ऊपर स्थानीय स्तर में भाड़ी जनसंख्या में पूजे जाने बाले बिभिन्न देवी देवताओं का नाम उल्लेख किया है। उनमे सोखा बाबा और कारिख धर्मराज के उपासक भी यहाँ बड़ी संख्या में हैं। बह्रम बाबा या डिहबार बाबा का स्थान तो तकरीबन हर गांव में मिल जाता है। इनके साथ बन्नी माई या बंदी माई की भी पूजा बड़ी संख्या में लोग करते हैं। गोरैया बाबा को रक्षक माना जाता है और बन्नी या बंदी माई कुलदेवी होती हैं। गिहल चारागाह के देवता हैं और यादव समुदाय के लोग इनके उपासक हैं, राजा सल्हेस और दीना भदरी का नाम तो अपेक्षाकृत पापुलर है ही,और दलित जातियों में इनका भरपूर सम्मान भी है। बामती शमशान की देवी हैं। काली मां को भी बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी कुलदेवी बताया है, लोग गहवर में इनके नाम से सात पिंडा बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। इन्हें सतिबहनी कहना ज्यादा उचित होगा।
परिवार की कोई लड़की अगर कुंवारी मर गयी हो और उसकी मौत के बाद परेशानियां शुरू हो गयी हों तो बाद में लोग उसकी पूजा करने से लगते हैं, इस उम्मीद से कि पूजा के बाद उस लड़की की आत्मा उन्हें परेशान करना बंद कर देती. फिर आगे चल कर वही बच्ची देवी बन जाती है. ठीक इसी प्रकार ब्राहमण के कुवाँरे लड़के की अकाल मृत्यु हो जाने के साथ हि समाज और परिवार में परेशानियाँ बढ़ने पर उनकी पूजा कर समस्याओं से निजात पाने की स्थानीय विधान है। जो वाद में ब्रह्मबाबा के रूप में पूजे जाते हैं। इसप्रकार स्थानीय स्तर पे बहुत बड़ी संख्या में इनकी पूजा की जाती है। शुद्धता और भावनात्मक पवित्रता इस पूजा का मूल आधार होता है।
इन कुलदेवी-देवता की पूजा कई पीढ़ियों से होती आ रही है। ये देवी-देवता रैयतों के हैं, जो इन इलाकों के स्थायी बाशिंदे रहे हैं। लिहाजा इन देवी-देवताओं के बारे में हमें ढेर सारी जानकारी हासिल करने की जरूरत है। जैसे, बहुत कम लोगों को पता होगा कि गोपालगंज स्थित अजबीनगर में गोरैया बाबा का मंदिर है और वहां हर साल इनके बेरागन वाले दिन हजारों सूअरों की बलि चढ़ती है।
जलेश्वर से 10 की मी उत्तर में स्थित पडौल ग्राम में कारिख बाबा का मंदिर और मूल स्थान है। जहाँ प्रत्येक सोमबार और शुक्रवार को हजारों की संख्या में बली प्रदान की जाती है। इस प्रकार अनेकों देवी देवताओं के बारेमे अध्ययन और शोध होना आवश्यक दिखाई देता है। प्रादेशिक सरकार को इसपर ध्यानाकर्षण कराने की जिम्मेदारी स्थानीय सरकार को लेना चाहिए।(9844057000)

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