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सीके राउत के समर्थन में उमड़ा जनसैलाब मिट्टी के असंतोष की व्याख्या कर रहा था : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २० सितम्बर २०१८ | तीन वर्ष पुराना संविधान अपना जन्मोत्सव मना चुका । प्रधानमंत्री ओली ने एक अन्तरवार्ता में कहा है कि यह संविधान लंगूरबुर्जा खेल कर नहीं आया है । किन्तु आश्विन तीन को जो देश का परिदृश्य था उससे तो यही लगा कि यह संविधान सिर्फ उनके लिए था जो खेल में जीत गए थे पर कल जीत कर भी हारने का अनुभव जरुर हुआ होगा अगर सही में सरकार पूरे देश के लिए है तो । या किसी वर्ग विशेष या क्षेत्र विशेष की सरकार है तो अपनी जीत पर और जीत से मिले पारितोषिक पर इतराने का हक तो बनता है । देश ने जश्न मनाया तो सही पर टुकडों में बँट कर, तो क्या महत्तव रह जाता है उस जश्न का जो आप तीन वर्षों से मना तो रहे हैं, कभी रक्त बहा कर कभी अंकुश लगा कर और सही रुप से उसका आस्वादन नही कर पा रहे हैं ? कहीं संविधान के प्रति रोष खुलकर सामने आया तो कहीं दबी जुवान के अन्दर रह गया । विश्व का उत्कृष्ट संविधान ही नहीं स्वयं सरकार भी असफल नजर आ रही है । आम जनता तो रोटी कपड़ा और मकान में खुश रहना जानती है पर यहाँ तो साँस लेना भी महँगा साबित हो रहा है ऐसे में असंतुष्टि की आग बढ़ ही रही है ।

कल का दृश्य जो मधेश की जनता ने प्रदेश नम्बर दो में दिखाया है सरकार को, क्या वह आत्मविश्लेषण करने की जरुरत महसूस नहीं करवा रहा ? यह तो तय हो गया कि सीके राउत के समर्थन में उमड़ा जनसैलाब मिट्टी के असंतोष की व्याख्या कर रहा था जिसके जड़ में सरकार की विभेदकारी नीति, मधेश को हाशिए पर रखना, शक्तिहीन बनाना और मधेशी दलों और नेताओं का स्वार्थीपन है । सीके राउत के सैकड़ों समर्थक हिरासत में लिए गए, गाडि़यों की हड़ताल करायी गयी, बावजूद इसके जनकपुर की उमड़ी भीड़ ने जो संदेश दिया है उस पर गहनता से विश्लेषण की आवश्यकता अवश्य है । अगर सरकार की सोच मधेश आन्दोलन की तरह ही इसे भी दमन से दबाने की होगी तो यह निःसन्देह सबसे बड़ी गलती होगी क्योंकि मधेश और मधेश की घटनाओं पर देश ही नहीं विश्व की नजर है । आज सीके राउत को हीरो बनाने की वजह भी स्वयं सरकार की विभेदकारी नीति ही है । संघीयता का लालीपाप तो दे दिया पर उसका स्वाद चखने की अनुमति नहीं दी, संविधान तो दे दिया पर देश के एक वर्ग को अधिकार से वंचित कर दिया । मधेश के नागरिक को उसकी नागरिकता पर सवाल उठाकर उसकी राष्ट्रीयता पर हर क्षण सवाल उठाने वाली सरकार मधेश की जनता को कटघरे में खड़ा करती है और उससे ही समर्थन की उम्मीद भी करती है । उनकी माँग को नकार कर उसे आयातीत कह कर नकारने वाली सरकार को कल का परिदृश्य चिंतित जरुर कर रहा होगा । कल तक अधिकार का माँग करने वाली जनता आज उसके साथ खड़ी थी जिसे राष्ट्रद्रोही कहा जाता रहा है और स्वतंत्रता के नारे लगा रही थी । जिसके कार्यकर्ता राममनोहर यादव की मौत को राष्ट्रद्रोही की मौत कहा गया आज उसके समर्थन में जो भीड़ उमड़ी थी उसका आकलन क्या किया जाना चाहिए ? भूमिगत सीके राउत को हिरासत में लेने का फरमान जारी था पर वो जनता के बीच से जनता के चहेते बन कर निकले । जनता की यह बदलती धार एक दिन का परिणाम नहीं है, यह उस सत्ता और सरकार को चेतावनी है जो लगातार मधेश को कम आँक रही है । सात नम्बर प्रदेश की थारु जनता ने भी इस दिन का खुलकर विरोध किया । उनके नेता को हिरासत में रखना और कई ऐसे अपराधियों को बरी कर देना जिनके अपराध जग जाहिर हैं, क्या इसे कैलाली की जनता स्वीकार कर पाएगी ?

राष्ट्रपति का क्षमादान बहुत आसानी से अपराधियों को मिल जाता है पर जिसे जनता ने चुन कर भेजा था उसे सरकार हिरासत में रखे हुए है । थारु जनता अपनी गुम हुई स्वायत्तता को लेकर असंतुष्ट है और संविधान का विरोध कर रही है । महिलाओं की असंतुष्टि भी खुलकर कल सामने आ गई । मधेशी आदिवासी जनजाति सभी की भावनाओं को नजरअंदाज कर एक वर्ग जीत की जो खुशियाली आज तीन वर्षों से एक वर्ग और शासक मनाता आ रहा है उसके दरवाजे पर दस्तक है कल की सीके राउत की रैली । पास पड़ोस पर बहुत दोषारोपण हो गया अब तो अपने आपको आइने में देखने का वक्त है । जागी हुई जनता सोती नहीं है उसका रोष हर पल जगता है और उन्हें सचेत करता रहता है ।

 

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