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हरि प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी 2017 : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

इस वर्ष यह व्रत
मंगलवार दिनांक 31 अक्टूबर 2017 को पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में होने से विशेष रूप से मनाई जाएगी और पारणा 1 अक्टूबर बुधवार को उत्तराभाद्रपद में सुबह 7 : 30 से दिन 11:30 तक सफेद तिल, आंवला एवं तुलसी पत्र से किया जाएगा । जबकि द्वादशी का 1 अक्टूबर को दिन के 2:55 तक प्रसस्त है ।
प्रबोधनी एकादशी देवउठनी एकादशी के नाम से भी जानी जाती है शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी सभी त्रिविध पापो से मुक्ति देने वाली कही गयी है । इस दिन से सभी मंगल कार्य प्रारम्भ होते है | कहा जाता है की इस एकादशी का पुण्य राजसूय यज्ञ करने से कही ज्यादा है
शास्त्रों के अनुसार देव उठनी एकादशी के दिन से ही, पिछले चार माह पहले इसी दिन भगवान विष्णु और अन्य सभी देवता क्षीरसागर में शयन कर अतः तब से कोई शुभ कार्य नहीं होता है | सिर्फ पूजा पाठ एवं तप व दान के कार्य किये जाते है, इन चार महीनो में विवाह , मुंडन संस्कार, नाम करण आदि कार्य नहीं किये जाते हैं |

यह व्रत कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन हरि प्रबोधन के लिए प्रबोधिनी एकादशी के नाम से मनाई जाती हैं |
शास्त्रों के अनुसार एकादशी के व्रत को महत्वपूर्ण माना जाता है । शास्त्रों के अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन सूर्य और अन्य ग्रह अपनी स्थिती में परिवर्तन करते हैं | जिस के कारण मनुष्य की इन्द्रियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है | इस कारण इन्द्रियों को संतुलन बनाये रखने के लिए व्रत करना जरुरी है | इस एकादशी को पाप का विनाश करने वाली एकादशी भी कहा जाता है | वेदों में कहा गया है की इस एकादशी का व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जो कई तीर्थ दर्शन,अश्वमेघ यज्ञ ,सौ राजसूय यज्ञ के तुल्य माना गया हैं | इस दिन का महत्व ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को बताया है | और उन्होंने कहा की इस दिन केवल एक बार दिन में भोजन करने से एक जन्म का , केवल रात्रि भोजन से दो जन्म का , एवं उपवास में सम्पुर्ण व्रत पालन करने से सात जन्मो के पापो का नाश होता हैं | इस एकादशी का उपवास करने से उत्तम आयु आरोग्यता सुख सौभाग्य के प्राप्ति के साथ साथ सभी मनोकामना पूरी होती है |
देवउठनी प्रबोधनी एकादशी को व्रत के दिन सूर्योदय से पूर्व नित्य कार्य करके व्रत का संकल्प ले | और सूर्य भगवान का अर्ध्य अर्पित करें । पुराणों में कहा गया है की यदि स्नान नदी के तट सागर अथवा कुँए पर करे तो बहुत शुभ माना जाता है अन्यथा घर पर भी गंगाजल सेवन पूर्वक स्नान लाभकारी होता है । इस दिन निराहार या फलाहारी उपवास किया जाता है और दुसरे दिन द्वादशी को विष्णु पूजा करके व्रत का उद्यापन या समापन कर पारण किया जाता है ।

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन श्री हरि विष्णु का तुलसी के साथ विवाह किया जाता है | जबकि तुलसी का विवाह कई लोग द्वादशी के दिन भी करते है |
तुलसी विवाह का महत्व :-
कहा जाता है की तुलसी का पेड़ बहुत ही गुणकारी होता है | तुलसी के पेड़ से वातावरण शुद्ध रहता है | तुलसी हर समय केवल शुद्ध ऑक्सीजन देती है ।

तुलसी विवाह की कथा : –
पौराणिक काल में राक्षस कुल में एक लडकी का जन्म हुआ जिसका नाम वृंदा था | वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की भक्ति करती थी | वृंदा का विवाह राक्षस कुल के दानव राज जलंधर से किया गया |जलंधर जो समुद्र मंथन से उत्पन हुआ था | वृंदा पतिव्रता स्त्री थी | एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ | युद्ध में जाने पर वृंदा ने कहा की आप जब तक युद्ध करोगे में तब तक में आपकी जीत का अनुष्ठान करुँगी |
वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई | उनके व्रत के प्रभाव से देवताओ में खलबली मच गई तो वो भगवान विष्णु के पास गए |भगवान विष्णु ने कहा की वह तो मेरी परम भक्त है |में उसके साथ ऐसा नहीं कर सकता हु परन्तु देवा इस के अलावा और कोई उपाय नहीं है |आप ही हमारी मदद कर सकते है |जब भगवान जलंधर का रूप धारण करके वहा गए तो वृंदा जलंदर को देख कर खडी हो गई और उसके पैर छू लिए | तब वृंदा का संकल्प टूट गया | फिर देवताओ ने जलंधर का सिर धड से अलग कर दिया | जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है | तब वृंदा ने भगवान को श्राप दे दिया और कह तुम पत्थर के हो जाओ |
सभी देवता में हाहाकार होने लगी उस वक्त लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया | तब वृंदा अपने पति को लेकर सती हो गई | उनकी भस्म (राख ) से एक पौधा निकला | तब भगवान विष्णु ने कहा की इसका नाम तुलसी है |मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से जाना जायेगा जो तुलसीजी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा | तब से तुलसी की पूजा सब लोग करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास की एकादशी के दिन किया जाता है । कहा जाता है की तुलसी के सदगुणों के कारण भगवान विष्णु ने उनके अगले जन्म में उनसे विवाह किया | देवउठनी एकादशी के दिन को तुलसी विवाह के रूप
में मनाया जाता है। और तुलसी से विवाह के बाद सबके लिए सभी शुभ लग्न एवं विवाहादि शुभकार्य आरम्भ हो जाते हैं ।इसी प्रकार चार माह से बंद पड़े सभी शुभ कार्यो का शुभारम्भ होता है | इस दिन कन्या दान को सबसे बड़ा दान माना जाता हैं, इसलिए तुलसी को कन्या रूप में पूजन कर विष्णु को तुलसी का दान करके कन्या दान का पुण्य प्राप्त करने का विशेष पुण्य प्राप्त करने का विधान है,
प्रबोधिनी एकादशी एवं तुलसी विवाह की हार्दिक शुभकामना ,
माता विंध्यवासिनी , श्री हरि लक्ष्मी नारायण एवं मईया तुलसी की प्रबोधन अनुकम्पा सभी भक्तों पर बनी रहे ,
आचार्य राधाकान्त शास्त्री ।

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