Thu. Oct 18th, 2018

हारे हुए नेता की अन्तरवार्ता, अर्थात् भंडास !

मुकुन्द आचार्य:”नेताजी ने इतनी जोर से चाय सुडकी, लगा कुत्ते का कोई बच्चा भूंकने का प्रैक्टिस कर रहा हो।”

दुनिया जानती है कि दुनिया हार-जीत से बनी है गौर से देखंे तो बड-बडÞे सेनापति, अतिरथी, फिल्डमार्शल अपनी बीबी के सामने दुम हिलाते नजर आएंगे। संसार जीतने वाले, नामी गिरामी रणबांकुरे घर में अपनी छोटी सी ….. नन्ही सी-चुलबुली बीबी की टेढÞी नजरों का सामना नहीं कर पाते। चुपके से हथियार डÞाल देते हैं।

इसीलिए शायद बुजुर्गो ने फरमाया है- जिन्दगी में हार-जीत तो लगी रहती है। मैदाने- जंग की हार को फूलों का हार समझ कर गले का हार बना लो। बदनसीबी, लोग आजकल बुजुर्गो की बातों का कदर नहीं करते। जरा भी तवज्जो नहीं देते। इतिहास में बडेÞ-बडेÞ नेता की ऐसी की तैसी हो गई तो हम किस खेत की मूली हैं, ऐसा सोच कर खुद को तसल्ली दे लेते हैं। हाल हीं का वाकया है। संविधान सभा फिर से बनाने के बहाने नेपाल में सियासी उठा-पटक जम कर हर्ुइ। बडेÞ-बडेÞ चारों खाने चीत हुए। जनता ने लुटेरे-हत्यारे, देश को नोंच नोंच कर खाने वाले आधुनिक राक्षसों को अपने मतों के आइने से उनका चेहरा साफ दिखा दिया। इस चुनाव में बुरी तरह हारे एक महान नेता के अचानक दर्शन हुए। उनके हाथों के तोते उडÞ गए थे। पैरों के नीचे की जमीन सर क गई थी।neta ji ki interview madhesh  khabar

होश फाख्ता हो गएथे। दिन में तारे नजर आ रहे थे। बुरा हाल था। मिलते हीं मैंने प्रश्न दागा- नेताजी ! आप इतनी बुरी तरह हार जायेंगे, ऐसा तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। ऐसी अनहोनी कैसे हो गई – कुछ बताने का कष्ट करेंगे – मेरा सवाल सुन कर वे कुछ देर खामोश रहे। मुझे लगा, उनकी सुनने की शक्ति समाप्त हो गई है। नेता जी ने शुबह ही पी ली थी। अपनी लाल-लाल आँखों से मुझे घूरते हुए कुछ देर देखा। फिर बात का रुख बदलते हुए कुछ लापरवाह अंदाज में बोले- क्या आप भी बीती बातों को लेकर बैठ गए। आईए चाय पी जाए। इतना कह कर उन्होंने एक नौकर नुमा आदमी की ओर देखा। नेता का नौकर जो ठहर ा।

चालाक तो था ही। शातीर भी था। इशार ा समझ गया। और चाय पानी का इन्तजाम करने चला गया। मैं उनके चेहरे का उतार- चढÞाव का अंदाज कर रहा था। कभी-कभी तो वे खालिस शैतान नजर आ रहे थे। नेता जी अपनी खुमारी में बोले, मैं हार ा नहीं हूँ- मुझे हराया गया है ! -इतना सुनते ही मुझे एक पुराने गीत की कडÞी याद आई- मैं पीता नहीं हूँ, पिलाई गई है !) खैर …..! हम लोग फटे पुराने सोफे में धंस गए, हारे हुए जुवाडÞी की तरह।

नेता जी ने जोरों से खंखारा और निकले हुए बलगम को प्रेमपर्ूवक रामदेव बाबा की दिव्य औषधी की तरह घोंट गए। फिर ऐलान किया- मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुझ को और मेरी पार्टर्ीीो हराने में अन्तर्र ाष्ट्रीय स्तर पर षड्यन्त्र रचा गया है। सारे पूँजीवादी, प्रतिक्रियावादी तइभ्वों ने मिल कर हमें हराया। इतना फरमा कर उन्होंने एक पुराना घिसा-पिटा शेर को अपने फूहडÞ अन्दाज में बोले ही तो दिया- मुझ को हराए किस में ये दम था, मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहां पानी कम था। इस तोडÞे मरोडेÞ गए शेर को सुन कर मुझे दाद-खाज-खुजली कुछ भी देने का जी नहीं हुआ। मैंने अगला प्रश्न उछाला- निर्वाचन के सुपरिवेक्षण के लिए बहुत बडÞी तादाद में र ाष्ट्रीय और अन्तर्रर्ाा्रीय पर्यवेक्षक गण मौजूद थे। इन्तखाबात में धाँधली होने की गुंजाइश तो बहुत कम थी।

फिर आपके छुट भैये नेता और गर्ुर्गे भी तो तैनात थे। इन सभी की आँखें फूट गई थीं और आप लोगों के दिमाग को लकवा मार गया था क्या, जो ऐसी अनहोनी हो गई – नेताजी इस बार अनावश्यक रूप से हंस पडÞे। कुछ अजीब सा लगा। कहीं चुनावी हार के चलते ये पागल तो नहीं हो गए – इतने में नौकर ने चाय और बिकिस्ट सामने टेबिल पर सजा दी। मैं कुछ सकुचाते हुए विस्किट कुतरने और चाय सुडÞकने लगा। नेताजी ने इतनी जोर से चाय सुडÞकी, लगा कुत्ते का कोई बच्चा भूंकने का प्रैक्टिस कर रहा हो। हारे हुए नेता को खुलने में थोडÞा वक्त तो लगता ही है, यह जानते हुए मैं परम धर्ैय के साथ चाय, विस्किट की सफाइ कर रहा था सचमुच नेताजी धीरे-धीरे खुलते हुए नंगे होने लगे। वे जरा धीमी आवाज में कहते गए, मुझे अपनो ने भी लूटा।

मतदान के एक रात पहले मैंने अपना दिल और खजाना दोनों खोल दिया था। मेरे वफादार लोग नोटो की गड्डी बैग में ठूस-ठूस कर ‘इधर बाँटना है- उधर बांटना है’, ‘इसको इतना देना है उसका इतना देना है’ कहते हुए रात भर में मेरा खजाना खाली कर गए। दूसरे रोज देखा तो खजाना भी खाली और मतपेटिका में अपने नाम के आगे स्वस् ितक चिन्ह भी खाली। इसीलिए अब तो मुझे सारी दुनियाँ खाली-खाली नजर आ रही है। जी करता है, हरिद्वार में जाकर गंगाजी में जल समाधि ले लूं। अब हम जैसर्ेर् इमानदार नेता के लिए इस पापी दुनियां में कोई जगह नहीं रह गई।

इंसानीयत के नाते मैं ने उन्हें झूठी ही सही तसल्ली दी- देखिए नेता जी ! आप तो इस अखाडÞे के पुराने खिलाडÞी हैं। दो-चार जगहों में हथियार के बल पर बूथ कब्जा कर वा कर अपना एक ठप्पा बोटिङ् करवा लेते। हथियार और गुण्डे दोनों तो आप के पास मौजूद थे। अब जब हार ही गए है तो सब्र कीजिए। कोई रात इतनी बडÞी नहीं होती कि सुवह न हो। फिर होंगे इन्तखाबात और आप डंके की चोट से जितेंगे। ऐसा कोई माई का लाल आज तक पैदा ही नहीं हुआ, जो आप को चुनावी मैदाने- जंग में शिकस्त दे। आप का तो नाम सुनते ही प्रतिद्वन्द्वी हथियार डाल देते हैं। -मैंने भी जान बूझ कर ‘बटरिङ’ की।

नेताजी कुछ और खुल गए, ‘सब कुछ था अपने पास। सरकार को सेना परिचालन नहीं करना चाहिए था। हमारे हथियार बन्द बच्चे सेना को देख कर जरा सा डर गए। नहीं तो आज इस समय मेरे घर में जश्न का खुशनुमा माहौल रहता। सैनिक के आगे साले दो पैसे के गुण्डे टिकते भी कितनी देर। अच्छा हुआ, खून खरावा नहीं हुआ, जान बची लाखों पाए। वर्ना अभी हम सलाखों के पीछे नजर आते। जनता में इस शर्मनाक हार को लेकर किस मूंह से जाते। बस भैया फेस सेभिङ के लिए, धाँधली हर्ुइ है, धोखेबाजी की गई है, ग्रैंडडिजाइन हुआ है, इन जुमलों की रट लगा रहे हैं।

और क्या ! खिसियानी बिल्ली खंवा नोचे। कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे। वे बडÞी गम्भीर मुद्रा में बोले, आजकल की जनता भी तो लोमडÞी की तरह चालाक हो गई है। वक्त की नजाकत देखते हुए हम सीधे सादे नेताओं से माल -नगद) पानी – दारु-मांस) ऐंठ लेती है और बदले में अपना मत भी नहीं देती। आजकल अपनी ग्रहदशा भी कुछ अच्छी नहीं चल रही है। राहू, केतु, शनि, मंगल सभी बदमाश ग्रह संगठित होकर मेरे विरुद्ध में मोर्चाबन्दी किए बैठे हैं। किसी पंडित से पूजापाठ करवा कर ग्रह-शान्ति कर नी ही होगी। इस फटे ढÞोल को कितना बजाया जाय, ऐसा सोचकर मैं भी चुपके से खिसक लिया। अब उनकी भंडास से बदबू आ र ही थी। हालांकि जनाब का दावा था कि वे मुल्की अवाम की रुहानी नब्ज देखना बखूबी जानते हैं।

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