Tue. Nov 20th, 2018

हिन्दू धर्म असुरक्षित

आज नेपाल को एक गणतन्त्रात्मक राष्ट्र के रुप में विश्व मानचित्र में दर्शाया गया है। संघीयता ही इसका कलेवर है। परन्तु हृदय से ‘संघीयता’ नाम से देश के प्रत्येक दल, संगठन और व्यक्ति आक्रोशित हैं। क्योंकि संघ बन जाने की स्थिति में राजनीतिक दलों की कैसी अवस्था हो जाएगी – यही कारण है कि अरबों रुपये पचा कर भी चार वर्षो में ६०१ भूखे सभासद कुछ न कर पाए। और आगे भी खाने की योजना गढÞने में उनकी सक्रियता रही है।
‘गणतन्त्र नेपाल’ घोषणा से पर्ूव नेपाल विश्व का एक मात्र हिन्दू राष्ट्र था और विश्व के किसी भी कोने में रहने वाले हिन्दू गर्व करते थे कि उनका भी कोई राष्ट्र है। पर उक्त घोषणा ने सबों को मर्माहत किया है।
सनातन, वौद्धिक, पौराणिक, औपनिषदिक आदि मान्यताओं को अंगीकार कर जीवन यापन करने वाले हर लोग आर्य वा हिन्दू के रुप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुए।र्
धर्म कभी अनेक नहीं होता। जिसे धारण कर जीवनचर्या चलाई जाय वही धर्म है। महाभारत के अनुसार र्’धर्म’ वही है, जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचे। र्’धर्म’ व्यक्ति के आचरण और व्यवहार की एक संहिता है, जो उसके कार्यों को देश, काल और परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थित, नियमित और नियंन्त्रित करता है और उसे स्वस्थ और उज्ज्वल जीवन जीने के लिए ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। नियमवद्ध, संयमित और शालीन जीवन ही धार्मिक जीवन है। आचार और सदाचार धर्म के लक्षण हंै।र्
धर्म का सम्बन्ध मनुष्य के विश्वास, नैतिक आचरण उसके व्यवहार और उसकी आस्तिकता से है, जिससे उसका दैनंदिन और सामाजिक जीवन नियंत्रित और विकसित होता है। धर्म के आधार स्रोत- श्रुति -वेद), स्मृति र्-धर्मशास्त्र), सदाचार -सज्जनों के व्यवहार) और आत्मतुष्टि है। रामायण के अनुसार चरित्र ही धर्म है। इसीलिए तो चरित्रवान ‘राम’ धर्म के मर्ूत्त रुप हैं। दूसरों के प्रति अपने दायित्व को निवाहना, लोक जीवन की मर्यादा की रक्षा करना, समाज की व्यवस्था बनाए रखने में योगदान करना यही था राम का धर्म और मर्यादा। डा. र्सवपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार ‘प्रत्येक सभ्यता उसके धार्मिक विश्वासों की अभिव्यक्ति है, क्योंकि धर्म का आधार कुछ सुनिश्चित जीवन मूल्य होते हैं और धर्म ही उस जीवन पद्धति को निर्धारित करता है। हिन्दर्ूधर्म बहुत ही उदार धर्म है। फिर भी सभी धर्म का आदर इस में किया गया है। किसी भी धर्म को निम्न और तुच्छ नहीं कहा गया है। पर अन्य धर्म अपने को ही सर्वोपरि मानते हैं तथा दूसरों की मान्यताओं को भ्रमपर्ूण्ा एवं असहनीय ठहराते हैं। हिन्दू लोग प्रत्येक ऐसी प्रवृति का सम्मान करते हैं, जो मनुष्य की आत्मा कोर् इश्वरोन्मुख करती है। हिन्दू धर्म तो वरगद के पेडÞकी तरह है, जिसकी जडÞ इस लोक में गहर्राई तक जाती है तथा उसकी चोटी परलोक तक पहुँचती है। रवीन्द्रनाथ टैंगोर के अनुसार भारत भूमि ही एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ अनेक आत्माओं का एक परमात्मा में समन्वयन किया गया है। हिन्दू धर्म विश्व के समाज में समन्वय करने की क्षमता से पर्ूण्ा है अरबिन्द घोष के अनुसार ‘राष्ट्रीयता एक आस्था है, विश्वास है, धर्म है। र्
धर्म के विभेदर्
धर्म के सम्बन्ध में संक्षिप्त विवरण जान लेने के बाद उस के विभेदों पर हल्का प्रकाश देने की धृष्टता करना चाहता हूँ। साधारणतः सामान्य धर्म, विशिष्ट धर्म और आप्त धर्म कहे गए हैं। सामान्य धर्म औ विशिष्ट धर्म के अर्न्तर्गत कई विभेद किए गए हैं- देश धर्म, जाति धर्म, और कुल धर्म के अतिरिक्त भी शास्त्रकारों ने आश्रम धर्म, गुणधर्म और नैमित्तिक धर्म माना है। सामान्य धर्मो की चर्चा है, जिन में सत्य, तप, शुचिता, दया, कष्ट-सहिष्णुता, मनचर नियन्त्रण, इन्द्रिय संयम, ब्रहृमचर्य, त्याग, अहिंसा, स्वाध्याय, सन्तोष, सरलता, सम्यक दृष्टि, सेवा, सांसारिक त्याग, लौकिक सुख के प्रति उदासीनता, मौन, आत्म चिन्तन, सभी प्राणियों में अपने आराध्य का दर्शन और उन्हें अन्न देना, श्रेष्ठ पुरुषों का संगर्,र् इश्वर का गुणगानर्,र् इश्वर चिन्तनर्,र् इश्वर पूजार्,र् इश्वर सेवा,-यज्ञ का अनुष्ठानर्,र् इश्वर के प्रति दास्यभावर्,र् इश्वर बन्दना, सखा भाव और्रर् इश्वर के प्रति र्समर्पण आदि मुख्य हैं। साधारणतः मधुर वचन, शरणागत रक्षा तथा अतिथि सेवा भी धर्म के अर्न्तर्गत आते हैं।
भारतखण्ड के प्रथम राजा ‘मनु’ स्वयंभू थे। उनका जन्म सीधे ब्रहृमा से हुआ था। मनु से ही मनुष्य जाति की उत्पत्ति की कथा प्रसिद्ध है। वे भी अर्धनारीश्वर ही थे। ‘इल और इला’ से क्रमशः र्सर्ूय वंश और चन्द्र वंश राजपरिवार का उदय हुआ। पुराणों और ब्राहृमण ग्रन्थों में मनु की वंशावली का विस्तार से वर्ण्र्ााहै।
हिन्दू धर्म के अनुसार सुख का आधार आध्यात्मिक पथ ही हैं। भौतिक सुख अस्थायी और भोगवादी संस्कृति का परिचायक है। आज भौतिक सुख पर ध्यान न देकर आध्यात्मिक सुख की ओर आगे बढने की जरूरत है। क्योकि मनुष्य को सुखी और समृद्धि शाली जीवन जीने के लिए सात्विक प्रवृतियाँ उत्प्रेरित करती हैं। यद्यपि जीवन में समन्वय लाने के लिए दोनों प्रकार के सुख आवश्यक है। भारतीय जीवन दर्शन इन दोनों प्रवृत्तियों का संतुलित और समन्वित रुप है, जो पुरुषार्थ कहा जाता है। भौतिक अथवा लौकिक सुख के अर्न्तर्गत अर्थ और काम हैं तो आध्यात्मिक अथवा पारलौकिक सुख के अर्न्तर्गत धर्म एवं मोक्ष हैं। पुरुषार्थ में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही तत्व निहित हैं। मनुष्य लौकिक सुख के उपयोग के साथ धर्म का अनुसरण करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करता है। क्योंकि हिन्दू दार्शनिकों के विचार से जीवन और मृत्यु से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। यही तो हिन्दू संस्कृति की विशेषता है, जो अन्यत्र दर्ुलर्भ है। ‘ç’ के अर्न्तर्गत ही सम्पर्ूण्ा विश्व, ब्रहृमाण्ड, जीव और जगत समाहित हैं। इसे मन्त्र के रुप में स्वीकार और अंगीकार कर आगे बढÞने से देश और समाज का कल्याण हो सकता है। इसी ç से राम, शिव, सत्य और सुन्दर का प्रादर्ुभाव हुआ है। इसीलिए इसे सनातन धर्म कहते हैं। समय-समय पर इस धर्म पर विभिन्न वर्ग से आक्रमण भी हुए हैं। आज भी कभी कभार ऐसी घटना जगह-जगह में होती है। मगर हिन्दू धर्म की जडÞ इतनी मजबूत है कि इसे आसानी से कोई उखाड कर फेंक नहीं सकता। इस सर्न्दर्भ में नेपाल सरकार का धर्म निरपेक्षता वाला नारा विल्कुल ही गलत और सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने की कुचेष्टा मात्र है।

 

-प्रा. उपेन्द्रप्रसाद कमल

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