कोरोना महामारी या नव सृजन का संदेश
राजेश शर्मा
सिरहा, ६ अप्रैल ।
कोरोना महामारी है या नव सृजन का संदेश इन कई मुद्दाें पर हम बिचार करने को मजबूर है कोरोना ने लगभग हर विकसित , विकासशील देश को घुटने टेंकने पर मजबूर कर दिया है । कहा जाए तो यह एक वैश्विक आपदा है इतनी बड़ी आपदा को बडे बुजुर्ग ने कभी इतनी नजदीक से नही देखा और शायद दो पीढ़ी पहले भी किसी नही देखा था । हम सभी एक विकासशील देश के नागरिक है इसलिए हर परिस्थिति को काफी नजदीक से देख रहे है शायद हम ही विकसित देश के नजरिये और उसकी जीवनशैली को समझ सकते हैं और उसका कारण ये भी है कि हम हर पल उसका अनुसरण भी करना चाहते हैं ।
क्या ये आपदा हमें ये बताने आई है की हमे उन देशों का अनुसरण नही करना चाहिए? क्योंकि जिसने भी प्रकृति का नुकसान किया है उसे हर्जाना तो देना ही पड़ा है। ये कम और ज्यादा हो सकता है लेकिन बचेगा कोई नही । एक विकासशील देश के तौर पर हमारे देश मे भी पिछले 50 वर्षों में बहुत सी गलतियां की हैं । सबसे बडी गलती ये की हमने भी विकसित देशों की तरह अपने विकास के लिए प्रकृति को नुकसान पहुँचाया । कहीं प्रकृति ने समूचे विश्व को चेतावनी तो नही दी कोरोना आपदा के रूप में ? अगर ये सच है तो हमें हर हालत में अपने विकास के मॉडल को बदलना होगा ।क्यों की प्रकृति भी नव सृजन कर रही है हम सब बहुत ही कठिन दौर से गुजर रहे हैं । लेकिन कोरोना से इस सीधी जंग में जीत हमारी ही होगी । क्योंकि हमारा देश धैर्य , सादगी , स्थायित्व और आपसी बन्धुत्व के लिए विश्वविख्यात है। बस हमें घर पर तब तक रहना है जब तक इसका प्रकोप खत्म न हो जाये । ये शब्द लॉकडाउन जरूर है लेकिन इसे सकारात्मक रूप में देखिये । इस समय हमें घर मे रहकर चिंतन करने की आवश्यकता है की आखिर हम अपने आस पास कैसी परिस्थितियों को जन्म दे रहे हैं ?
हम कैसे समाज की स्थापना कर रहे हैं ? गांवो का जीवन कठिन जरूर होता है लेकिन साधारण भी उतना ही । हमे कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि आज आप किसान के द्वारा बोये अनाज के ही सहारे घर पर ठहरे हैं । बुजुर्गों ने अपने जीवन मे किसी भी तरह की ऐसी महामारी नही देखी लेकिन इस कोरोना के प्रकोप से इतना जरूर समझ आ रहा है कि हर आपदा व्यापक स्तर पर बहुत कुछ सोंचने को मजबूर करती है। सबसे बड़ा प्रश्न ये भी है कि हम आपदा के भावी प्रकोप से डर रहे हैं या फिर हमे प्रकृति के मिजाज की जरा भी चिंता नही ।सभी देशों में लगभग हर सिस्टम आज लाचार है इस आपदा के सामने सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने प्रकृति के साथ किये जा रहे गलत व्यवहार पर हमेशा पर्दा डालने का काम किया है । आज जब प्रकृति में मौजूद एक वायरस ने कोहराम मचा दिया तो दूषित हवा को सुद्धि के लिये सब कुछ रोकना पड़ा । हमारे सुंदर प्रकृति के विनाश का ही नतीजा है जिसका हमे आपको हर्जाना तो देना होगा । शायद वो दिन भी आये जब हर्जाना देने के लिए हमारे पास कुछ हो ही न । क्या हमने कभी सोंचा की आने वाली पीढियां हमसे क्या चाहती हैं ? उन्हें शांति , सादगी , प्रदूषणरहित वातारण चाहेंगे तो तो क्या हम दे पाएंगे ? अगर उन्होंने सिर्फ ये खूबसूरत प्रकृति मांग ली तो क्या हम दे पाएंगे? अगर बचेगा तभी सोंच भी पाएंगे आप देने को उन्हें एक सुंदर कल ।इसलिये इस मुश्किल समय मे लकडाउन के सदुपयोग के साथ ही पर्यवरण के तरफ भी एक कदम उठाए।
लेखक आशियाना इंटरनेशनल जॉर्नलिस्ट कॉउंसिल के सम्पादक और
भारत नेपाल सामाजिक संस्कृति मंच के अध्यक्ष हैं ।
प्रस्तुति मनाेज बनैता

