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कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है, ज़िंदगी एक नज़्म लगती है – गुलज़ार

 

कोई हंगामा-ए-हयात नहीं
रात ख़ामोश है सहर ख़ामोश
– वाहिद प्रेमी

हर तरफ़ थी ख़ामोशी और ऐसी ख़ामोशी
रात अपने साए से हम भी डर के रोए थे
– भारत भूषण पन्त

देखोगे तो आएगी तुम्हें अपनी जफ़ा याद
ख़ामोश जिसे पाओगे ख़ामोश न होगा
– अंजुम रूमानी

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी
– गुलज़ार

कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो
ऐ लोगो ख़ामोश रहो हां ऐ लोगो ख़ामोश रहो
– इब्न-ए-इंशा

सब ने देखा और सब ख़ामोश थे
एक सूफ़ी का मज़ार उड़ता हुआ
– ख़ुर्शीद तलब

रात सुनसान है गली ख़ामोश
फिर रहा है इक अजनबी ख़ामोश
– नासिर ज़ैद

मिरी प्यास का तराना यूं समझ न आ सकेगा
मुझे आज सुन के देखो मिरी ख़ामोशी से आगे
– नीना सहर

कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
– गुलज़ार

उठा लाया किताबों से वो इक अल्फ़ाज़ का जंगल
सुना है अब मिरी ख़ामोशियों का तर्जुमा होगा
– नफ़स अम्बालवी

सन्नाटा इस कदर कुछ छाया हुआ है

अपने साए से भी अब डर लगने लगा है

श्वेता दीप्ति

 

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