Tue. Jul 7th, 2020
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दुनिया के गरीब मजूर, उनके पैरों में छाले हैं, भूख मर रही है बार बार : राकेश मिश्रा

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उदासी
———
मुझे रंग नहीं रुचते
मेरी उदासियों में शामिल है
मेरे बचपन में बिलावों द्वारा
अधखायी मुर्गियों के रंगीन पंख
गाँव के पोखर में
नुकीले काँटों से खींची गयीं
मछलियों के मुँह में भरा खून
मेरे आवास में रह रहे बतख़ जोड़े की
मादा का तीन महीनों से जारी इन्तज़ार
बैठी रहती है अण्डों पर बिना खाए पिए
डॉक्टर कहते है भ्रूण नहीं बन रहा
नर बतख़ में कमी है
समस्या यह है की बतख़
केवल जोड़ों में रहते हैं
गहराती जाती है उदासी
जिस मोर पंख को रखता हूँ
शयनकक्ष में दुस्वप्नो से बचने लिए
उसके चार बच्चों को उठा ले गया बाज़
विभ्रमित मोरनी ताकती रहती है आसमान
बारिश भरी रातों में
बनमुर्गी के पंखों तले सोते
चूज़ों की नींद के साथ होते हैं
मेरे स्वप्न
मेरे मोहल्ले के हर घर को जानने वाली कुतिया
आठ बच्चे जनती है हर साल
एक एक कर मरते हैं
जैसे दुखों की किश्तें बंधी हों
कुतिया गिनना नहीं जानती
पर खुरचती सूंघती रहती ज़मीन
मुझे पता है संकट में हैं
दुनिया के गरीब मजूर
उनके पैरों में छाले हैं
भूख मर रही है बार बार
आँखों में आँसू -उम्मीद नहीं
सुन्न मन शरीर में है
कहाँ है नहीं पता
सुन्न है मेरी उदासी
हर सुबह देखता हूँ
धूल कम होती जाती है इन दिनों
साफ़ नीले आसमान जैसी
गहरी है .

 

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