शायद इंतज़ार ख़त्म, भिगोता सावन : वीना श्रीवास्तव
शायद इंतज़ार ख़त्म
छिड़ गई थी जंग
केसर और चिनारों के बीच
चिनारों ने रौंद डाले
केसर के नन्हे फूल
कुछ मिल गए मिट्टी में
जो बचे
वो किसी तरह उड़ गए
हवाओं के साथ
यहाँ – वहाँ
अपनी मिट्टी से उखड़कर
वो कुम्भला गए हैं
महकना भूल गए
वो खो चुके हैं अपनी रंगत
वो जानते हैं, समझते हैं
कैसा होता है
केसरिया रंग
मगर भर नहीं सकते
अपने जीवन में
चिनार अभी खड़े हैं
सिर उठाये
उनकी फैली बाँहों में छुपे हैं
न जाने कितने हथियार
केसर बेताब है
अपनी ज़मीं पर
फिर से खिलने
मुस्कुराने के लिए
उसे इंतज़ार है
चिनारों की फैली बाँहों का
जब उनमें भरा होगा प्यार
और डल झील में खिलेंगे
प्यार के कमल
शायद… इंतज़ार ख़त्म
भिगोता सावन
देखो माँ
कितनी तेज़ बारिश हो रही है
आज झूम के उतर रहा है सावन
झूलों में झूल रहा है मनभावन
काली घटाओं से छनकर
चांदी की पायल बनकर
मचल रहा है आंगन
बहक रही है
डाली – डाली
लहक रही हूं
मैं मतवाली
टपक रहा है महुआ
छन – छन- छन
सखुआ की है
सनन, सन – सन
हवाओं का शोर
बादलों की गर्जन
बिजली की तड़कन
उर का नर्तन
आ रही हैं जाने किस किसकी सदाएं
पेड़ों से, बादलों से, पुरवाई से
तभी आवाज़ आई
और सिमटी तन्हाई से
तेरी माँ हूं बेटी
जानती हूं
बारिश के पानी में इतना दम कहां
छुपा लें मेरी लाडो के आंसू
बाहर से ज़्यादा भीतर
भिगो रहा था सावन

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झारखंड


