Thu. Aug 6th, 2020
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दयाल सिंह कॉलेज करनाल , हरियाणा में हिंदी अंतरराष्ट्रीय वेब कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया

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दयाल सिंह कॉलेज करनाल , हरियाणा (भारत) के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के तत्वावधान में 30 जून 2020 को “कोरोना काल में हिंदी भाषा-साहित्य की प्रासंगिकता “विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय वेब कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया जिसमें अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त भारत, अमेरिका, नॉर्वे ,नेपाल से विद्वान वक्ताओं और 380 प्रतिभागियों ने कोरोना काल में हिंदी भाषा – साहित्य की प्रासंगिकता विषय पर व्यापक विचार विमर्श एवं समीक्षा करते हुए कहा कि आज के इस वैश्विक महामारी कोरोना के संकट काल में हमारे हिंदी भाषा – साहित्य में वर्णित त्याग ,समर्पण ,सहिष्णुता ,समन्वय ,संयम, परोपकार ,सदाचार ,लोक कल्याण जैसे भारतीय जीवन मूल्य हमें संकट को अवसर में बदलने की राह दिखाते हैं और इंसानियत और भाईचारे का पाठ पढ़ाते हुए मानवतावाद की स्थापना करते हैं ।
कॉलेज प्राचार्य डॉ चंद्रशेखर भारद्वाज ने विद्वान वक्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी एक समृद्ध भाषा है। भूमंडलीकरण के दौर में औद्योगिक क्रांति के साथ भाषाई क्रांति में हिंदी भाषा भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुकी है जिसका साहित्य हम में उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है ।
उद्घाटन सत्र में सम्मेलन के संरक्षक दयाल सिंह कॉलेज गवर्निंग बाडी के जनरल सेक्रेटरी वाइस एडमिरल सतीश सोनी ने सभी साहित्य प्रेमियों का स्वागत करते हुए और आयोजकों को कॉन्फ्रेंस की बधाई देते हुए कहा कि हमारे हिंदी साहित्य में आत्म विश्वास ,संयम और अनुशासन की प्रेरणा आरंभ से ही दी जाती रही है जिससे हमारे चरित्र का निर्माण होता है।
अंतरराष्ट्रीय वेब कांफ्रेंस के संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ रणधीर सिंह ने विषय प्रवेश करते हुए “कोरोना काल में हिंदी भाषा-साहित्य की प्रासंगिकता “के बारे में बताते हुए कहा कि संस्कृति किसी भी राष्ट्र की धरोहर होती है। भारतीय संस्कृति की ,भावनाओं की ,परंपराओं की संवाहिका हिंदी भाषा ही है अन्य विदेशी भाषाएं नहीं ।हिंदी भाषा और साहित्य ही भारतीय संस्कृति का प्राण है हिंदी साहित्य में शुरू से ही वसुधैव कुटुंबकम की भावना पर बल दिया गया है और हमारी आदर्श भारतीय संस्कृति की यही विशेष पहचान है जिसमें समाज हित के लिए व्यष्टि हित का परित्याग दिखाया गया है ।संभवत है हमारे उदार मना ऋषि-मुनियों ने सृष्टि के कल्याण के लिए प्रभु से यही प्रार्थना की थी कि सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया सभी सुखी हों सभी रोग मुक्त होंं ।आज के इस वैश्विक महामारी कोरोना के संकट काल में हमारे हिंदी भाषा साहित्य में वर्णित त्याग और समर्पण जैसे भारतीय जीवन मूल्य हमें संकट को अवसर में बदलने की राह दिखाते हैं ।
बीज वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर पूर्ण चंद टंडन ने कहा कि वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में व्यक्ति आत्म केंद्रित और स्वार्थी हो गया है। हमने धन संग्रह और वैज्ञानिक उन्नति के बल पर ईश्वरीय सत्ता को नकार दिया है जिसके दुष्परिणाम आज हम भुगत रहे हैं। हमने भारतीय जीवन मूल्यों को भी भुला दिया है ।आज के इस कोरोना के संकट काल में मनुष्य को एंग्जाइटी और घबराहट हो रही है वह अवसाद और कुंठा का भी शिकार हो रहा है ।इस महामारी में हमारे रिश्ते और नाते भी प्रभावित हुए हैं उन्होंने आदिकाल से लेकर के अब तक के हिंदी साहित्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि साहित्य हमें सदा उचित और अनुचित के बारे में संकेत करता रहा है और समाज को सकारात्मक की तरफ ले जाने का काम करता रहा है उन्होंने हिंदी साहित्य में चित्रित हमारे भारतीय जीवन मूल्य आत्मबल ,आत्म संयम ,आत्म त्याग ,आत्मनिर्भरता ,सद्भावना ,सहानुभूति ,सहयोग ,समर्पण, परोपकार को वर्तमान कोरोना वैश्विक महामारी के संदर्भ में रेखांकित करते हुए वैज्ञानिक उन्नति के साथ-साथ ईश्वरीय सत्ता में भी विश्वास व्यक्त करने का आह्वान किया ।
प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक नार्वे ओस्लो ने कहा कि इस लॉकडाउन में भी जब पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा है तब भी हिंदी साहित्य सृजन नहीं रुका है बल्कि और तीव्र गति से साहित्यकारों ने जीवन मूल्यों और भारतीय संस्कृति पर कुछ ना कुछ लिखा है ।देश और विदेश में साहित्य सृजन बढ़ा है ।उन्होंने कहा कि आज हमने प्रकृति से छेड़छाड़ की है हमारे तालाब कहां गए मैदान कहां गए समुद्र के किनारे कहां गए जहां बैठकर खेल कर हम अपने मन को शांत करते थे आज कोरोना काल ने दस्तक दी है और हमें नए समय में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और तकनीक से जुड़ना होगा ।उन्होंने यह भी कहा कि पहले भी विश्व में महामारी आई हैं उस वक्त हम ज्यादा नहीं सीख पाए क्योंकि हमारे हिंदुस्तान में विदेशियों का शासन रहा आज हम इस वैश्विक महामारी की चुनौती को स्वीकार करते हुए नव समाज नव मानव का निर्माण करेंगे उन्होंने शमशानो का दर्द कविता का पाठ करते हुए करोना संकट की भयावहता को दिखाया और हिंदी जगत को हौसले और जिंदादिली के साथ रचनात्मकता के लिए प्रेरित किया ।
द्वितीय तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता हिंदी संगम फाउंडेशन अमेरिका के अध्यक्ष एवं स्टार टाक भाषा शिक्षण केंद्र न्यू जर्सी के निदेशक अशोक ओझा ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज पूरा विश्व कोरोना की चपेट में है ऐसे संकट के समय में प्रौद्योगिकी जगत ने साहित्यकारों और शिक्षकों को कुछ साधन प्रदान किए हैं जिनका प्रयोग शिक्षा और साहित्य की प्रगति और समृद्धि के लिए किया जा रहा है। आज ऑनलाइन साधनों के माध्यम से हमारी पहुंच दुनिया के कोने कोने में बैठे साहित्य प्रेमियों तक हो पा रही है।
प्रथम तकनीकी सत्र की विशिष्ट वक्ता त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू नेपाल कि पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ श्वेता दीप्ति ने अपने वक्तव्य में कहां की साहित्य वही उकेरता है जो हमारा वक्त कहता है। हम कोरोना संकट में सामाजिक दूरी के बावजूद भी मानसिक धरातल पर एक हो रहे हैं उन्होंने पूरे हिंदी साहित्य में और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी दिखाए गए जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता का महत्व भी बताया। उन्होंने रेनू के मैला आंचल उपन्यास में वर्णित मलेरिया और कालाजार जैसी महामारी का जिक्र करते हुए कहा की हिंदी साहित्य ने हमेशा ही हमें जीवन जीने का हौसला प्रदान किया ।उन्होंने आजकल सन्नाटा बोलता है कविता के माध्यम से कोरोना से उपजे सन्नाटे को चरितार्थ किया और साहित्य और समाज को एक दूसरे का पूरक मानते हुए यह भी बताया कि संकट की परिस्थितियों में सदा ही हिंदी साहित्य ने समाज को सहारा दिया है।
द्वितीय तकनीकी सत्र की विशिष्ट वक्ता नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी अमेरिका की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ नीलाक्षी फुकन ने अपने वक्तव्य में कहा के हिंदी साहित्यकार अपनी रचनाओं द्वारा मनुष्य जीवन में तथा समाज में आशा की एक नई किरण फैलाते हैं उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास के पन्नों को उकेरते हुए इस तथ्य को समझाने का प्रयास किया कि हिंदी साहित्य ने समय-समय पर समाज में उपजी विपरीत परिस्थितियों चाहे वह महामारी हो या प्रलय में हमें जीने की हिम्मत दी है ।
प्रथम तकनीकी सत्र की विशिष्ट वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय दिल्ली की प्रोफेसर सविता सिंह ने कहा कि हमें प्रकृति की अंदरूनी चेतना को समझने की जरूरत है करोना काल में हमारी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है बदलते हुए समय में साहित्यकार के सामने नई चुनौतियां आई है कि हमें प्रकृति और दूसरे जीवो की आंतरिक दुनिया के बारे में सोचते हुए साहित्य लेखन करना है यह हमारे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है कि हमें सभी जीवो के साथ अपने आप को एडजस्ट करके चलना है और उन्होंने जीव हिंसा का विरोध करते हुए मानव जाति को सचेत किया है कि यदि हम इस तरह से दूसरे जीवो की हत्या करके अपना पेट भरेंगे तो सृष्टि रचयिता हमें कभी माफ नहीं करेगा।
द्वितीय तकनीकी सत्र की विशिष्ट वक्ता महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक की प्रोफेसर पुष्पा ने अपने वक्तव्य में कहा कि वैश्विक महामारियां अपने समय और भविष्य को प्रभावित करती आई है इतिहास गवाह है कि अपने अपने समय में चाहे कला हो या साहित्य सभी रचनाओं में महामारियों की भयावहता को चित्रित किया गया और साथ ही उनसे उबरने के लिए मानव कल्याण के समाधान भी प्रस्तुत किए गए है ।सहसंयोजक डॉ बलबीर सिंह और आयोजन सचिव डॉ सुभाष सैनी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि आज कोरोना महामारी के संकट काल में प्रौद्योगिकी के जरिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा और साहित्य की प्रासंगिकता पहले से अधिक दिखाई देती है। इस अवसर पर आयोजन समिति सदस्य डॉ जयकुमार ,डॉ सुरेंद्र वाला ,डॉ यशवंती ने भी सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद किया ।डॉ श्वेता यादव ,डॉ विकास भार्गव ,डॉ धीरज कौशिक ने अंतर्राष्ट्रीय वेब कांफ्रेंस के आरंभ से लेकर समापन तक लगातार गूगल मीट और यू टयूब पर तकनीकी सहायता प्रदान कर कॉन्फ्रेंस को सफल बनाया।

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