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जैकब बेंगलूर की कम्पनी में पियन है ..मात्र पंद्रह हजार मासिक वेतन और इतना बड़ा शहर… परिवार झांसी के इसाईटोला में रहता है…..पत्नी नैन्सी बेटी कैसी ,भाई मरविंद और मां …भाई केमिस्ट की दुकान में छह हजार की नोकरी करता है यह पत्नी नैन्सी भी दो बुजुर्गों को खाना बनाती थी ..किसी तरह गुजर बसर हो रही थी…।
कैसी एक साल से ज्यादा की हो गयी थी …उसके जन्म पर ही वो आया था…क्रिसमस का त्योहार भी निकट था… पहला त्योहार और बेटी के साथ …उसे रह-रह कर कैसी की याद आ रही थी
” सर मैं क्रिसमस पर घर जाना चाहता हूं टेन डेज की छुट्टी चाहिए..”।
“इतने चिल्ड क्यों हो…खुशी खुशी जाओ …डाटर के साथ पहला क्रिसमस मनाओ…अपने ओवरटाइम का पैसा भी क्लार्क और मैनेजर से ले लेना …सबके लिए क्रिसमस ईव पर गिफ्ट जरूर लें लेना ‘
शनिवार को शापिंग कर रात को निकलता है…कैंसी के रिमेक छोटे बड़े कई जोड़ी कपड़े, बड़ी सी गुड़िया, नैन्सी को स्टोल और कार्डिगन..मां को शाल और चार कंबल…एक बूढ़े अंकल के लिए जो चर्च में अकेले रहते थे।
कोहरीली सर्दी..बर्फीली हवा उसे अंदर तक चुभ रही रही थी..
शौचालय के बाहर बैठी एक औरत एक बच्चे को दबाए ठंड मेंबैठी ठिठुर रही थी …शायद टिकट भी नहीं रहा होगा ?
जैकब को अकस्मात कैंसी की यादें घूम गई ं…कुछ कपड़े और एक कंबल निकाल कर उसे दे दिया ।
“बाबूजी तुम्हारे बाल बच्चे सुखी रहें।”
*
डॉ रंजना सिन्हा सैराहा बांदा उप्र भारत

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