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करुणाशंकर उपाध्याय आज के सबसे बड़े आलोचक हैं : श्रीमती चित्रामुद्गल

 

विश्व हिंदी संगठन, नई दिल्ली द्वारा डाॅ.करुणाशंकर उपाध्याय की सद्यःप्रकाशित पुस्तक ‘ मध्य कालीन कविता का पुनर्पाठ ‘ पर आयोजित परिचर्चा में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत प्रख्यात साहित्यकार चित्रामुद्गल ने कहा कि यह पुस्तक न केवल आलोचना के नए औजारों के साथ विश्लेषित की गई है अपितु आलोचना के नए प्रतिमानों की प्रतिष्ठा भी करती है। करुणाशंकर उपाध्याय अब आलोचकों के भी प्रतिमान बन गए हैं।जिस तरह किसी समय हिंदी साहित्य रामचंद्र शुक्ल और बाद में नामवर सिंह की ओर देखता था कि वे अपने समय के साहित्य के बारे में क्या कह रहे हैं उसी तरह आज का साहित्य करुणाशंकर उपाध्याय की ओर देखता है। वे आज के सबसे बड़े आलोचक हैं। मैंने अपने जीवन के 78 साल में जो नहीं पढ़ा वह इनकी पुस्तक ‘ मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ ‘ में पढ़ने को मिला जिसे राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इसमें आज की उत्तर आधुनिकतावादी आलोचना पद्धति को आधार बनाकर हमारे समय के सवालों से मध्यकाल को जोड़कर देखा गया है। मैं चाहती हूं कि इसे कई बार पढूं और आप लोग भी पढें। यह पुस्तक हिंदी साहित्य और आलोचना की अमूल्य निधि है।
यह वेब गोष्ठी विश्व हिंदी संगठन द्वारा आयोजित की गई थी जिसे यूट्यूब मीडिया चैनल ‘लोकबात ‘द्वारा प्रसारित किया गया। 29 जनवरी की शाम मध्यकाल के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई जिसमें देश भर से अनेक विद्वानों ,प्राध्यापकों और शोधार्थियों ने भाग लिया।

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कार्यक्रम के आरंभ में मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा पुस्तक के लेखक डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी। इस पुस्तक के लेखन की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि जब कोरोना कहर के कारण लॉकडाउन लगा तो उन्होंने समय का रचनात्मक उपयोग करते हुए इस पुस्तक की रचना की। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जीवन में समय और ऊर्जा सदैव कम होते जाते हैं अतः उनका अधिकतम दोहन करना चाहिए। आलोचक भी रचनाकार की तरह अपने समय और समाज की उपज होता है। हमें यह स्मरण रखना होगा कि गुण और परिमाण दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत विपुल और उत्कृष्ट साहित्य भक्तिकाल में ही लिखा गया। वैश्वीकरण के इस दौर में जब उत्तराधुनिक पाठ-केन्द्रित आलोचना पद्धतियों का बोलबाला है तब यह जरूरी हो जाता है कि हम भी बदलते समय , समाज एवं संदर्भों के आलोक में संपूर्ण मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ तैयार करें। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।

वक्ता के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ आलोक रंजन पांडेय ने अपने विचार रखे और पुस्तक पर एक विस्तृत समीक्षात्मक वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में जीवन और जगत के नैतिक मूल्यों को लेकर विशिष्ट संदर्भ लिया गया है जिससे मध्यकालीन समीक्षा को बल मिला है। लेखक के संदर्भों और आलोचना की विशिष्ट पद्धति को उद्घाटित करते हुए डाॅ. पाण्डेय ने कहा कि वे एक दम नए हैं। आलोचक धर्म को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचक का मूल धर्म दो विरोधी धारणाओं को स्पष्ट कर उनमें सामंजस्य स्थापित करना है और इस कार्य में डॉ करुणा शंकर उपाध्याय सफल हुए हैं।

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डॉ दर्शन पांडेय ने भी वक्ता के रूप में अपना वक्तव्य में डाॅ. उपाध्याय को सांस्कृतिक आलोचक कहा और अपनी बात को उदाहरणों के माध्यम के समझाया। उन्होंने बताया कि किस तरह से किताब में इतिहास को मिथकों से अलग छांटकर पेश किया गया है ताकि आगे आने वाली पीढ़ियां इससे अवगत हो सकें। यह पुस्तक अत्यंत व्यापक दृष्टिकोण के साथ लिखी गई है जो मध्यकालीन प्रश्नों को आज के संदर्भों से जोड़ती है। यह पुस्तक हर वर्ग के पाठक के लिए बेहद उपयोगी है।

बीज वक्तव्य के लिए पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. अरुण होता उपस्थित रहे। उन्होंने बताया कि हिंदी साहित्य इस वक्त मध्यकालीन समीक्षकों की कमी से गुजर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि अतीत में लौटना हमारे लिए आवश्यक है और हिंदी साहित्य का अतीत मध्यकाल है। इसका पुनर्पाठ होना बेहद आवश्यक है जो बिना समय और समाज से गुजरे नहीं हो सकता। इस श्रृंखला में इस पुस्तक का नाम गिना जाएगा क्योंकि यह मिथकों को दूर करती है और सही मायने में पाठ-केन्द्रित समीक्षा पद्धति का उपयोग करते हुए अनेक नए आयाम प्रस्तुत करती है। आज के परिदृश्य में बेहतर समाज की स्थापना हेतु मध्यकाल में जाना और उसकी अर्थवत्ता को सिद्ध करने में इस पुस्तक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

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दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और मध्यकाल के विशेषज्ञ आलोचक डाॅ.पूरनचंद टण्डन ने कहा कि आने वाले समय में इस पुस्तक की ख्याति निश्चित है क्योंकि यह नए चिंतन का बीज वपन है। उन्होंने यह भी बताया कि मध्यकाल की यह विडंबना रही कि इसके प्रति हमारी एक नकारात्मक दृष्टि रही जिसके कारण मध्यकाल के साथ न्याय नहीं हो पाया। इसलिए यह आवश्यक है कि एक गहरा चिंतन किया जाए ताकि मध्यकाल मिथकों और नकारात्मकता से उबर सके। डाॅ.उपाध्याय ने गहरी अंतर्दृष्टि और व्यापक दृष्टिकोण द्वारा एक नया पाठ उपलब्ध कराया है।

कार्यक्रम का सफल संचालन बेंगलुरू से जुड़ीं डॉ. कोयल विश्वास ने किया और केरल से जुड़ीं अनुरोज टी जे उपस्थित ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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