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देश अँधेरे सुरंग के मुहाने पर खड़ा है, हम रोशनी तलाश रहे हैं : श्वेता दीप्ति

Shweta Deepti डा. श्वेता दीप्ति
 

शक्ति–प्रदर्शन का विद्रूप तमाशा

हिमालिनी, (सम्पादकीय) अंक फरवरी,2021।नेपाल की राजनीति अपने इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है । सत्तारूढ़ दल, जिनके पास इतिहास बनाने का एक सुनहरा अवसर था, वह अब पके हुए घड़े की तरह फट चुका है । हर रोज सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन का विद्रूप तमाशा जनता देख रही है और पागलपन की हद तक साथ भी दे रही है न जाने क्यों ? जो आज सड़कों पर उबल रहे हैं क्या यह उबाल संसद विघटन का है या शक्ति छीन जाने का ? सीधी सी बात है अँगूर नहीं मिले तो अँगूर खट्टे हैं । उस वक्त इनका यह उबाल या समझदारी कहाँ गई थीं जब प्रधानमंत्री पद के हिस्से में सभी महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ धीरे–धीरे संचित हो रही थी । तभी तो शायद यह उम्मीद थी कि दो सालों के बाद तो इस शक्ति के अधिकारी हम ही बनने वाले हैं । किन्तु ऐसा हो नहीं पाया और आज संसद से सड़क की लड़ाई पर उतारू हैं इस दावे के साथ कि संविधान और देश खतरे में है । आश्चर्य है कि अचानक इन्हें देश का खयाल कैसे आ गया है, जबकि सभी एक ही थाली के चट्टे–बट्टे हैं ।

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प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली आज प्रतिगमन के नायक बने हुए हैं या बनाए जा रहे हैं परन्तु क्या इसमें सिर्फ उनका दोष है ? दोष कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर स्थापित नेतृत्व प्रणाली का है, जो ओली जैसे व्यक्ति को शीर्ष नेतृत्व में लाने में भूमिका निभाती है, वही इस स्थिति के लिए भी जिम्मेदार है । व्यक्ति या उसकी फितरत एक दिन में नहीं बदलती है और जब सब एक ही राह के राही हैं तो कैसे अपने सहयात्री के गुण–अवगुण को जानने से वंचित रह गए ? सत्ता का खेल और हर बार की तरह इसका मुआवजा आम जनता चुका रही है । घर से बाहर निकलने से पहले यह जान लेना होता है कि कौन सी सड़क बंद है या खुली हुई ? क्योंकि सड़कें तो रैलियों का मैदान बनी हुई हैं । आम जनता, छात्र, मरीज और उनके परिजन इस आन्दोलन से उत्पन्न समस्याओं की पीड़ा को झेल रहे हैं और सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने शक्ति–प्रदर्शन के खेल में लगे हुए हैं ।

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देश अँधेरे सुरंग के मुहाने पर खड़ा है और हम प्रतिक्षण एक रोशनी की तलाश कर रहे हैं । वह रोशनी जिसका इंतजार जनता ने राजतंत्र से लेकर प्रजातंत्र तक किया है और अब लोकतंत्र में भी कर रही है । उम्मीद वह आखिरी जज्बा है जो व्यक्ति हारने से ठीक पहले करता है और वही उम्मीद हमें दिलासा देती है कि “सब अच्छा होगा” ।

Shweta Deepti
श्वेता दीप्ति

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