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कविता कोई लिख ही नहीं सकता…लिखवाई जाती है : मीना कुमारी ‘विश्व कविता दिवस’

 

विश्व कविता दिवस 21 मार्च 2021

मीना कुमारी । कविता कैसे लिखते हैं? अच्छी कविता किसे कहते हैं? कविता लिखने में किन निय मों और निर्देशों का पालन करना चाहिए?
क्या कविता का तुकांत होना जरूरी है??
इन सब प्रश्नों का उत्तर हर विद्वान या कवि सुनियोजित ढंग से दे सकता है किंतु मैं इसका उत्तर एक लेखिका के तौर पर नहीं एक संवेदनशील पाठक के तौर पर देना चाहूंगी ।हो सकता है कि मेरे कुछ जवाबों से आप सहमत ना हो ।
मेरा पहला जवाब है कि कविता कोई लिख ही नहीं सकता… यह तो लिखवाई जाती है ।
इस दुनिया में अनंत विचारों की आंधी हर समय उड़ती रहती है किंतु कुछ खास दिमाग ही उन्हें कविता के रूप में कागज पर उतार पाते हैं ।कोई भी कालजयी कविता लिख नहीं सकता… यह तो ईश्वर के प्रसाद स्वरूप फलित होती है, किसी खास कवि की कलम से।
मेरी नजर में मेरी नजर में अच्छी कविता वह है जो पाठक के हृदय को छू जाए… बहुत गहरे में उसके हृदय में उतर जाए। जिसे एक दो बार पढ़कर आपका मन ना भरे। इसलिए नहीं कि आप उसे एक बार में समझ ना सके बल्कि इसलिए कि हर बार एक नया अर्थ… एक नया आयाम आप उसमें पाते हैं। जो आपको किसी चमत्कार से कम ना लगे। आप सोचें कि आखिर कोई ऐसा.. इतना अच्छा कैसे लिख सकता है?
कविता में नियम निर्देश पालन करना, उसे अलंकारों से सजाना ,उसे तुकांत बनाना सब निरर्थक है यदि कविता में प्राण ही ना हो ।कविता में प्राण होने का अर्थ उसके कालजयी और अमर होने का संकेत है। हां.. यदि कविता अर्थ पूर्ण ,भाव पूर्ण होने के साथ-साथ सुसज्जित और अलंकृत भी हो तो पाठक के हृदय में रच बस जाती है।

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” विश्व कविता दिवस 21 मार्च 21″ में मैंने बहुत सी बेहतरीन कविताओं का आनंद लिया। उनके भावों और अर्थों में उतर कर देखा पर जिसने मेरे अंतर्तम को छू लिया, वह कालजयी कविता भारत भूषण जी की लिखी हुई है ।ध्यान से पढ़िए और इसका एक एक शब्द घूंट घूंट पीजिए। कितनी कटु सच्चाई कवि ने कितनी सहजता से कह दी है।

यह असंगति जिंदगी के द्वार सौ सौ बार रोई।
बाहों में है और कोई ,चाह में है और कोई।
सांप के आलिंगनों में मौन चंदन तन पड़े हैं,
सेज के सपनों भरे कुछ फूल मुर्दों पर चढ़े हैं,
यह विषमता भावना ने सिसकियां भरते समोई।
देह में है और कोई, नेह में है और कोई।
स्वप्न के शव पर खड़े हो मांग भर्ती हैं प्रथाएं,
कंगनों से तोड़ खीरा खा रही कितनी व्यथायें,
ये कथाएं उग रही हैं नागफनी जैसी अबोई।
सृष्टि में है और कोई दृष्टि में है और कोई।
जो समर्पण ही नहीं है वह समर्पण भी हुए हैं,
देह सब झूठी पड़ी है प्राण फिर भी अनछुए हैं,
ये विकलता हर अधर ने कंठ के नीचे संजोई।
हास में है और कोई प्यास में है और कोई ।

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