माफ़ करूँ उन्हें कैसे, जो औरों की जलती रूह पे अपना हाथ सेंकते : करुणा श्री
शमशान
माफ़ करूँ उन्हें कैसे
जो औरों की जलती रूह पे अपना हाथ सेंकते
अपने दम्भ की मदहोशी में डूब
घर को दीमक सा चाट खंडहर बनाते
हृदय जिसका हो सूखे दरख़्त सा
पिघलते मोम की उन्हें परख़ कहाँ
छलावा जिसका मिजाज़ हो
समर्पण की उन्हें क़दर कहाँ
उलझे रिश्तों की अनगिनत गांठो को
सुलझाने का मन बनाते जब जब हम
टूट जाता वो हिम्मत का धागा
शमशान बन जाता ये खंडहर सा घर



