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मुक्ति का अब प्रण लेकर के, शक्ति से जग में जीना सीखा : प्रियांशी

 

 

हे मोहन
————
——प्रियांशी

हे मोहन मनहर मुरलीधर
यमुना तट बांसुरी बजैया
हे नंदलाल ग्वाल-बाल संग
माँ जसुमति के धेनु चरैया
हे नटखट नटवर नंदलाला
कालिय नाग को नाच नचैया
हे कुंजविहारी हे मधुसूदन
हे गोपिन्ह के वस्त्र चुरैया
ग्वालबाल सब करत कोलाहल
हे इंद्र के मद हर गिरिधर धरैया
हे जदुपति हे नंददुलारे
हे ग्वालिन संग रास रचैया
हे मुरारि हे केशव प्यारे
हे कंसन्ह के गर्व हरैया
हे रुक्मिणिपति हे मथुरापति
हे द्रोपदी की लाज बचैया
हे द्वारिकाधीश हे पार्थसारथि
हे पाण्डव को जय दिलवैया
हे राधावर मोरमुकुटधर
दीन दुखिन के पार लगैया
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जीना सीखा
बंद हूँ फिलहाल मैं इस पिंजरे में
पर, सपने देखे आजादी के
फड़फ उठीं तब शिथिल भुजाएँ
चमक उठीं तब चंचल आंखें
लगे थिरकने दोनों पग हैं
सरगम बज उठा प्राणों में

गुलामी की जब घटा छाई
मुक्ति पाने की बारी आई
प्रकृति भी त्रासदी में
यूं बंधी है सृष्टि सारी

बैठ करके स्वप्न तरी में
ले पकड़ पतवार कर में
बढ़ चलूँ मैं सरित-सर में
मांझी की दरकार क्या है?

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नदी से है बहना सीखा
संघर्ष करना, लड़ना सीखा
रुकना नहीं, बढ़ना सीखा
सपने बनाना- सजाना सीखा

भंवर में फंसी जो नाव स्वप्न की
पतवार पर जोर लगाना सीखा
राह बनाना दौड़ लगाना
औ मंजिल को पाना सीखा

क्रंदन छोड़ गरजना सीखा
भय के भ्रम से लड़ना सीखा
मुक्ति का अब प्रण लेकर के
शक्ति से जग में जीना सीखा

 

प्रियांशी, दशम् वर्ग, मुंबई

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