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राजनीतिकरण का शिकार त्रिभुवन विश्वविद्यालय :अंशुकुमारी झा 

 

 

नेपाल की भूमि प्राचीन काल से ही अध्ययन, अनुसन्धान के लिए महत्त्वपूर्ण है । यह भूमि सदियों से आध्यात्मिक ज्ञान का केन्द्र, तपस्वियों का साधना स्थल तथा धर्म कर्म के लिए प्रतिष्ठित रहा है । महर्षि याज्ञवल्क्य, पुराण तथा महाभारत के रचयिता वेदव्यास जैसे दार्शनिक, गार्गी जैसी विदूषी, गायत्री मन्त्र के द्रष्टा कौशिकी, व्याकरण शास्त्र के प्रवर्तक महर्षि पाणिनि इत्यादि जैसे महाज्ञानी ने इसी भूभाग को चिन्तन का केन्द्र बनाया था ।

विभिन्न कालखण्ड में ऋषि मुनियों ने इसी पवित्र भूमि में बैठकर अध्ययन, लेखन तथा नवसृजन कार्य किया है । तो हम बेझिझक यह कह सकते हैं कि नेपाली भूमि प्राचीन काल से ही अध्ययन अध्यापन की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है । पहले तो शिक्षा का आदान–प्रदान मठ, मन्दिरों में पण्डित पुरोहितों के द्वारा होता था बाद में गुरुकुल की व्यवस्था की गई और गुरुओं द्वारा शिक्षा दीक्षा दी जाती थी और वही व्यवस्था कालान्तर में विद्यालय तथा विश्वविद्यालय में परिणत हुआ । 

वैसे तो नेपाल में उच्च शिक्षा का विकास विक्रम संवत् १९७५ से त्रि–चन्द्र कालेज की स्थापना से माना गया है । क्योंकि अगर हम नेपाल में शिक्षा का इतिहास का अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि नेपाल में विक्रम संवत् २००७ से पहले की शिक्षा और उसके बाद की शिक्षा विकास में कितना अन्तर है । 

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वि.सं.२००७ पूर्व की शिक्षा का विकास काल

मौलिक शिक्षा, इसके अन्तर्गत वैदिक अर्थात् संस्कृत शिक्षा, बौद्ध शिक्षा, लिच्छवीकालीन शिक्षा और मल्लकालीन शिक्षा आता है । शाहकालीन शिक्षा को शिक्षा का उपेक्षा काल माना गया है और राणाकालीन शिक्षा को शिक्षा का विरोध काल कहा गया है क्योंकि राणाओं ने वि.सं । १९१० में ही अंग्रेजी स्कूल खोला उसके बाद भी बहुत सारे विद्यालय खुले किन्तु सिर्फ अपने बच्चों के लिए । आम जनता के लिए उस समय शिक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं था । राणा का मानना था कि जनता को शिक्षित करना अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारना है । १०४ वर्ष के जहांनियां शासन के बाद अर्थात् २००७ साल के बाद नेपाल में शिक्षा का विकास तेजी से होने लगा और एक विश्वविद्यालय की आवश्यकता महसूस हुई ।

राजा त्रिभुवन की पत्नियां रानी ईश्वरी और कान्ति के अथक प्रयास से राजा का सपना साकार हुआ । नेपाली जनता को वि.सं ।२०१६ में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक विश्वविद्यालय प्राप्त हुआ जिसका नाम त्रिभुवन विश्वविद्यालय रखा गया, परन्तु वही विश्वविद्यालय फिलहाल अस्त–व्यस्त हो चुका है । जिसका मुख्य कारण विश्वविद्यालय में राजनीतिकरण है । नेपाल में अभी तक ११ विश्वविद्यालय का निर्माण हो गया है फिर भी देश का ८० प्रतिशत भार त्रिभुवन विश्वविद्यालय ही वहन कर रहा है । यहां पर अभी स्नातक से लेकर विद्यावारिधि तक की शिक्षा देने का प्रावधान है । विश्वविद्यालय के कुलपति राष्ट्र के प्रधानमन्त्री और सहकुलपति शिक्षामन्त्री होने की व्यवस्था है । उसी प्रकार राजनीतिक बँटवारे के आधार पर अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति होती है । 

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सबसे ज्येष्ठ विश्वविद्यालय की अवस्था चिन्तनीय है । सत्ता जिसके हाथ में होती है वही विश्वविद्यालय की गरिमा को ठेस पहुंचाता है । विश्वविद्यालय में शिक्षा से ज्यादा राजनीति का वर्चस्व है जिसका असर सीधे उच्च शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों पर होता है । राजनीतिकरण के कारण विश्वविद्यालय को न तो दक्ष शिक्षक मिल पाता और न ही उचित व्यवस्थापन । एक कहावत जो बहुत ही लोकप्रिय है, जिसकी लाठी उसकी भैंस, विश्वविद्यालय में भी इसी का प्रयोग हो रहा है । चाहे भैंस कितना भी असुर प्रवृति का क्यों न हो । जिसके पास शक्ति है उसी के रिश्ते नाते कुर्सी पर बैठ जाते हैं, चाहे वह योग्य हो या न हो । 

फिलहाल विश्वविद्यालय संकटों से घिरा हुआ है । गलत निर्णयों के विरुद्ध में आए दिन तालाबन्दी होती रहती है, जिससे प्रशासन तथा शिक्षा क्षेत्र प्रभावित होता है । समय पर सुनियोजित कार्य पूर्ण नहीं होने से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा पर सवाल उठ रहे है । वैश्विक स्तर पर हमारा त्रिभुवन विश्वविद्यालय का स्थान खिसकता हुआ दिखाई दे रहा है । प्रत्येक दीक्षान्त समारोह के अवसर पर विद्यार्थियों की संख्या में कमी होती जा रही है । कुछ दिन पहले समाचार में पढा था कि त्रिभुवन विश्वविद्यालय के कुछ क्याम्पसों को अन्य विश्वविद्यालय में समाहित कर दिया जाना चाहिए । यह सारी बातें त्रि वि के लिए एक चिन्तनीय विषय है । सम्पूर्ण नेपाल में फैले विश्वविद्यालय को संकुचित करना अपने आप में लज्जास्पद है । 

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समग्र में त्रिभुवन विश्वविद्यालय के विषय में सभी विदित ही होंगे, ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं है । परन्तु जिस ध्येय से उक्त विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी फिलहाल वह विपरित दिशा में जा रही है । नई पीढ़ी के लिए पर्याप्त अध्ययन तथा अनुसन्धान की व्यवस्था में कमी आ रही है । अगर विश्वविद्यालय में इस प्रकार का रबैया रहा तो राष्ट्र को दक्ष जनशक्ति प्रदान करने में वह असमर्थ रहेगा ।

 

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