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ठोस कानून के अभाव में हिन्दुओं को ईसाई बनाए जाने पर रोक की संभावना नहीं : राजेश झा

२०५० तक ९५ % की ईसाई बनाने की योजना पर काम तेजी सेकॉ रोनकाल में ही एक लाख से अधिक ने हिंदुत्व छोड़ ईसाई धर्म अपनाया

राजेश झा, कोरोना काल में ईसाई मिशनरियों ने एक लाख से अधिक भारतीयों को ईसाई बनाया और आज भी यह द्रुतगति से चल रहा है। इसकी शिकायत मिलने पर भी प्रशासन कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पता क्योंकि भारत में मतांतरण रोकने के लिए आठ राज्यों ने विधेयक अवश्य पारित किये हैं किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए कोई ठोस कानून नहीं है।देश में आगे भी हिन्दुओं के ईसाई बनाने की घटनाएं तेजी से बढ़ेंगीं क्योंकि विश्व स्तर पर इसके लिए प्रयास चल रहे हैं। ओक्लाहोमा शहर के ईसाई बिज़नेसमैन मार्ट ग्रीन साल २०३३ तक दुनिया की हर भाषा में बाइबिल के अनुवाद की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहे है। उनकी योजना वर्ष २०५० तक दुनिया की ९५ % आबादी के हाथों में बाइबिल देने की है। मार्ट ग्रीन इसके लिए अमेरिकन बाइबिल सोसाइटी, बाइबिलिका, डेफ बाइबिल सोसाइटी, लूथरन बाइबिल ट्रांसलेटर्स, पायनियर बाइबिल ट्रांसलेटर्स, सीड कंपनी, एसआईएल इंटरनेशनल, यूनाइटेड बाइबिल सोसाइटीज, द वर्ड फॉर द वर्ल्ड और वाईक्लिफ बाइबिल ट्रांसलेटर्स यूएसए के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।इस मिशन का लक्ष्य लगभग सभी ३८०० भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद करना है। अभी भी २००० से अधिक ऐसी भाषाएँ हैं, जिनमें बाइबिल का अनुवाद नहीं हुआ।दूसरी तरफ पास्टर बिजेन्दर सिंह , पास्टर सुनील झा , पास्टर छतर सिंह कात्रे, पास्टर महेंद्र नागदेव और जे नाथन, पास्टर सिस्टर भाग्य, पास्टर उषा रानी और वर्जीनिया ,बिशप पंकज मलिक, पास्टर कोरियाई ईसाई महिला मिंकायगली उर्फ अनमोल, सीमा, संध्या और उमेश कुमार,आर्कबिशप जॉन मूलाचिरा , छत्तीसगढ़ क्रिस्चियन फ़ोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल,

जैसे अनेक क्रिप्टो ईसाई हैं जो इस काम को निर्भय हो आगे बढ़ा रहे हैं।

मूल कथा

कोरोना के भयावह खतरे के बीच जहाँ दुनिया भर में लोग अपने और अपनों की जान बचाने की जद्दोजहद में जुटे थे , वहीं ईसाई मिशनरी इस आपदा काल को अवसर में बदलने में लगी थी ।पिछले वर्ष कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत से लेकर अब तक दर्जनों ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ ईसाई मिशनरियों का घिनौना चेहरा उजागर हुआ है। विपदा में भी उनका पहला अजेंडा मत -परिवर्तन ही बना हुआ है। ईसाई मिशनरियों नें इस संकट के समय में भी मत परिवर्तन के रास्ते खोज निकाले और निरन्तर सफलतापूर्वक हिंदुओं का मत- परिवर्तन आज भी जारी है। ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं, जिनसे ईसाईयों के एजेंट शहर, गाँव, जंगल, पहाड़, अस्पताल, स्कूल, जेल यानी लगभग सभी जगह उनके छाए होने के प्रमाण मिले हैं।

व्हाट्सएप को बनाया मतांतरण का माध्यम

‘अनफोल्डिंग वर्ड’ के अध्यक्ष और सीईओ डेविड रीव्स ने बताया कि भारत में वर्ष २०२० के कोरोना काल से लेकर अब तक पिछले २५ वर्ष की तुलना में सबसे ज्यादा चर्च बनाए गए औऱ हज़ारों लोगों को ईसाई मतावलम्बी बनाया गया।वे बताते हैं कि लॉकडाउन में लोगों से मिलने की मनाही थी तो मिशनरीज ने व्हाटसएप के माध्यम से लगभग १००००० हिन्दुओं का मत -परिवर्तन किया । लॉकडाउन के दौरान प्रत्येक चर्च ने १० गाँवों को चुना। वहाँ के लोगों को व्हाटसएप पर लालच, डर, भय और बहला-फुसला कर ईसाई बनाने के लिए प्रोत्साहित किया । जैसे-जैसे लॉकडाउन के नियमों में ढील मिली, ये मिशनरी इन गाँवों में घुस गए औऱ जमकर मत – परिवर्तन कराया। आँकड़ों के अनुसार, देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान चर्चों ने लगभग ५०००० गाँवों को चिह्नित कर २५ % लोगों का मतपरिवर्तन कराया औऱ ये संख्या एक लाख से अधिक है ।

मध्यप्रदेश में जारी है मिशनरीज का खेल

जनवरी, २०२१ में मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में सरकार द्वारा संचालित एक छोटे से गाँव के स्कूल में शिक्षक छतर सिंह कात्रे ने २७ जनवरी को प्रार्थना सभा का आयोजन किया था। इस सभा में बहला-फुसला कर लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाया जा रहा था।इस प्रार्थना सभा मे लोगों को धर्मांतरण के लिए १०००० रुपए की पेशकश की गई थी और न मानने पर ईश्वर द्वारा बुरा किये जाने की बात कह कर डराने की कोशिश भी की जा रही थी। शिकायत मिलने पर पुलिस ने कात्रे और उसके दो दोस्तों महेंद्र नागदेव और जे नाथन को मत -परिवर्तन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था।

जनवरी, २०२१ में ही इंदौर में हिंदू कार्यकर्ताओं ने सतप्रकाशन संचार केंद्र के अंदर एक कैथोलिक प्रोटेस्टेंट प्रार्थना सेवा स्थल में बड़े पैमाने पर मतांतरण करने का मामला उजागर किया था। इस मामले में ११ लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें से ९ को ही गिरफ्तार किया जा सका था।फरवरी, २०२१ के अंतिम सप्ताह में मध्य प्रदेश पुलिस ने खजुराहो स्थित मिशनरी कॉन्वेंट स्कूल की प्रिंसिपल सिस्टर भाग्य के विरुद्ध ‘ फ्रीडम ऑफ रिलीजन ऑर्डिनेंस २०२० ‘ के तहत पहला मामला दर्ज किया था। स्कूल की शिक्षिका रूबी सिंह नें शिकायत की थी कि वो चार साल से संविदा के आधार पर स्कूल में काम कर रही है।

प्रिंसिपल सिस्टर भाग्या ने शिक्षिका रूबी सिंह की खराब आर्थिक स्थिति के बारे में पता चलने पर उसे नौकरी नियमित करने के साथ वेतन बढ़ाने का लालच देकर धर्म परिवर्तन का प्रयास किया। जब उसने अपना धर्म बदलने से इनकार कर दिया तो प्रिंसिपल भाग्या ने उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया।मध्य प्रदेश के राज्य गृह मंत्री नरोत्तम मिशर ने मीडिया को बताया था कि मतांतरण विरोधी कानून के उल्लंघन के कम से कम २३ मामले इसके लागू होने के एक महीने के भीतर दर्ज किए गए थे। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार भी अंतरधार्मिक विवाह और मतांतरण को विनियमित करने के लिए मध्य प्रदेश में धर्म की स्वतंत्रता अध्यादेश के लागू होने के एक महीने के भीतर २८ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है जिनमें से आधे से ज्यादा ईसाई हैं।

बच्चों को भी बनाते हैं निशाना

ईसाई मिशनरी छोटे-छोटे बच्चों तक को अपना शिकार बनाने से नहीं चूकते। तमिलनाडु के एरोड जिले की मोदकुरुचि पंचायत कस्बे में ७ साल की एक छोटी लड़की को दो मिशनरी महिलाएँ उषा रानी और वर्जीनिया डराकर अपने साथ अपने चर्च ले जाने लगीं। बच्ची को ये कहकर डराया गया था कि चर्च नहीं आओगी तो तुम्हारे माता पिता बीमार होकर मर जाएँगे औऱ वो भूतों के बस में हो जाएगी। उसे चर्च में बाइबिल पढ़ाई जाने लगी और धर्मपरिवर्तन के लिए धमकाया जाने लगा। जब बच्ची ने अपने माता-पिता को ये सब बताया तो मामला खुला।

आदिवासी लड़की का अपहरण एवं मतांतरण

तमिलनाडु की ही एक अन्य घटना में, तिरुवन्नामलाई में एक १३ वर्षीय आदिवासी लड़की का कुछ महीने पहले एक ईसाई पादरी ने उसके गाँव से अपहरण कर मत -परिवर्तन करा लिया था। ईसाई पादरी कुछ दिन से गाँव के बच्चों को लॉकडाउन में स्कूल बंद होने के चलते कोचिंग पढ़ाने के नाम पर गाँव मे रुके थे।
कोचिंग में गाँव के बच्चों को धर्म-परिवर्तन के लिए बहलाया जा रहा था। गाँव वालों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने बच्चों को कोचिंग जाने से रोक दिया मगर ईसाई पादरी एक १३ साल की आदिवासी लड़की का ब्रेनवॉश करके उसे अपने साथ ले जाने में कामयाब रहा। महीनों की गहन खोज के बाद लड़की को पादरी की बहन के घर से बरामद किया गया।

उत्तर प्रदेश में जारी है ईसाईकरण का खेल

जनवरी, २०२१ के अंतिम सप्ताह में कानपुर में कल्याणपुर के गूबा गार्डन में गुड शेफर्ड एजुकेशन सेंटर के चर्च में बिशप पंकज मलिक की देखरेख में मत परिवर्तन का खेल हिन्दू संगठनों ने पकड़ा था। ‘THE’ नामक चर्च में कानपुर से सटे फतेहपुर खागा से लगभग १५० लोगों को इलाज के नाम पर लाकर मत परिवर्तन किया जा रहा था। प्रयागराज की अनीता शर्मा एक निजी फर्म में सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करती थी। लॉकडाउन के दौरान काम छूटने पर दक्षिण कोरियाई ईसाई महिला मिंकायगली उर्फ अनमोल, सीमा, संध्या और उमेश कुमार ने उसे राशन और ७००० रूपये की मदद की।इसके बाद आरोपितों ने उसे हर सप्ताहांत मलकपुर के एक अस्थायी चर्च में आमंत्रित करना शुरू कर दिया। आरोपी उसे लेने के लिए कार भेजते थे। कुछ दिन बाद उसे घर से हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें हटाने के बदले दस लाख रूपये और राशन की पेशकश की गई।इस मामले में चारों आरोपित, जिनमें तीन महिलाएँ भी शामिल हैं, २० दिसंबर से उत्तर प्रदेश के गैरकानूनी धार्मिक धर्मांतरण निषेध अध्यादेश, २०२० के तहत जेल में बन्द है।

पूर्वोत्तर बना है धर्मपरिवर्तन का गढ़

मार्च के दूसरे सप्ताह में, जब पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा था, उसी वक्त भारत में पूर्वोत्तर के कैथोलिक चर्च में बिशप औऱ पादरियों की सभा मे ज्यादा से ज्यादा धर्मपरिवर्तन कर लोगों को ‘मसीह के पास लाने’ की अपील की जा रही थी।गुवाहाटी के आर्कबिशप जॉन मूलाचिरा ने कोहिमा के सेंट मैरी कैथेड्रल चर्च में पूर्वोत्तर के बिशपों को ये अपीलनुमा आदेश दिया। आर्कबिशप ने इस बैठक के कहा था कि पूर्वोत्तर इलाकों में चर्च की सक्रियता की वजह बाकी दुनियाँ बिशप पूर्वोत्तर की प्रशंसा करते हैं। इस बैठक में सुसमाचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने अर्थात अधिकतम मत -परिवर्तन कराने की कार्य योजना पर चर्चा हुई।

पंजाब भी नहीं है अछूता

अप्रैल, २०२१ में दर्ज एक मामले के अनुसार जालंधर में ताजपुर चर्च के पादरी बलविंदर सिंह ने शुभम पंडित की बहन के कैंसर के इलाज़ के नाम पर ८०००० रुपए हड़प लिए। उसके बाद उन्हें पवित्र जल और तेल से उनका मत -परिवर्तन कर दिया।शुभम पंडित की बहन की मृत्यु होने पर मामला दर्ज होने पर धर्मपरिवर्तन के इस खेल की जानकारी हुई। मिशनरीज के एजेंट देश भर में फैले है जो इलाज़ के नाम पर लोगों को बरगला कर चर्च भेजते है। जहाँ धर्मपरिवर्तन को अंजाम दिया जाता है।

जेलों तक फैला है ईसाई धर्मांतरण का जाल

मिशनरियों के जाल से देश की जेलें तक सुरक्षित नहीं बची है। मिशनरियों के प्रभाव का इस से बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि जेलों में भी ये अपनी पैठ बना चुके हैं।महिला कैदियों के बच्चों की शैक्षिक स्थिति पर किए गए एक अध्ययन में, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग(NCPCR) ने पाया कि बाल सुधार गृहों, छात्रावासों और जेलों में ईसाई न होने पर भी बच्चों को बाइबिल पढ़ाई जा रही है।यह रिपोर्ट देशभर की महिला कैदियों, उनके बच्चों, बाल गृहों और छात्रावासों के प्रमुखों, स्कूलों के प्रमुखों और जेल अधिकारियों से बात करने के बाद तैयार की गई थी।

२०५० तक ९५ % आबादी को ईसाई बनाने का लक्ष्य

ओक्लाहोमा शहर के ईसाई बिज़नेसमैन मार्ट ग्रीन साल २०३३ तक दुनिया की हर भाषा में बाइबिल के अनुवाद की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहे है। उनकी योजना वर्ष २०५० तक दुनिया की ९५ % आबादी के हाथों में बाइबिल देने की है। मार्ट ग्रीन ने अपने अभियान के लिए सभी प्रमुख बाइबिल अनुवाद संगठनों के साथ मिल कर ‘आई वांट टू नो’ (मैं जानना चाहता हूँ) बाइबिल के अनुवाद का मिशन चला रहे हैं। इस मिशन के तहत वो अमेरिकन बाइबिल सोसाइटी, बाइबिलिका, डेफ बाइबिल सोसाइटी, लूथरन बाइबिल ट्रांसलेटर्स, पायनियर बाइबिल ट्रांसलेटर्स, सीड कंपनी, एसआईएल इंटरनेशनल, यूनाइटेड बाइबिल सोसाइटीज, द वर्ड फॉर द वर्ल्ड और वाईक्लिफ बाइबिल ट्रांसलेटर्स यूएसए के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।इस मिशन का लक्ष्य लगभग सभी ३८०० भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद करना है। अभी भी २००० से अधिक ऐसी भाषाएँ हैं, जिनमें बाइबिल का अनुवाद नहीं हुआ।

जॉन से लेकर मदर टेरेसा तक चलता रहा ‘धंधा

कहने को तो ईसा मसीह के सूली चढ़ने के बाद ही उनका संदेश को लेकर उनके शिष्य थॉमस भारत आ गए थे, लेकिन मतांतरण का खेल सही मायनों में वर्ष १५४२ में भारत में रोमन कैथोलिक चर्च की स्‍थापना के साथ ही शुरू हुआ।इसी चर्च से जुड़ी मिशनरीज ने सबसे पहले भारत के गरीब हिन्दू और आदिवासियों की अशिक्षा और गरीबी को देखते हुए उन्हें धन का लालच देकर ईसाई बनाया था।अंग्रेजों के जाने के बाद कॉन्ग्रेस की सरपरस्ती में मदर टेरेसा ने देशभर में व्यापक रूप से लोगों को ईसाई बनाया। मिशनरीज ऑफ चैरिटी बनाकर उन्होंने मानवता की आड़ जमकर गरीब हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन कराया। आज ईसाई मिशनरियों के कारण भारत के कई राज्यों के आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में तनाव की स्थि‍ति बन गई है।

भाजपा सरकार आने के बाद इन मिशनरीज को एनजीओ की आड़ में मिलने वाली फंडिंग पर रोक भी लगी है। कुछ राज्यों में मत -परिवर्तन के खिलाफ सख़्त कानून भी बने हैं। बावज़ूद इसके, इस जाल से निकलना हिंदू समाज के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। भारत का हिन्दू अभिमन्यु की तरह असहाय होकर मिशनरीज के चक्रव्यूह में फँसा है, जो इनसे लड़ तो सकता है मगर उसे चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं नज़र आता।

फरवरी २०२२ में छत्तीसगढ़ के आदिवासी गांव ब्रिम्डेगा में लगभग दो दर्जन लोगों की एक रंगा-रंग धार्मिक समारोह में हिन्दू धर्म में वापसी कराई गयी. समारोह का आयोजन करने वाले इस प्रक्रिया को ‘घर वापसी’ कहते हैं.इसका मतलब है हाल के सालों में हिन्दू से ईसाई बनाए जाने वालों की हिन्दू धर्म में फिर से वापसी.हिन्दू धर्म में ‘वापस’ होने वाले एक युवक परमेश्वर एक्का ने मुझसे कहा कि उसने कई महीनों तक अपने गुरु से विचार-विमर्श के बाद हिन्दू धर्म में फिर से वापिस लौटने का फ़ैसला किया, “हम लोग हिन्दू ही हैं शुरू से. अनजाने में ईसाई धर्म में साल-दो साल के लिए चले गए थे। उसमें विनती प्रार्थना करवाते थे कि ये प्रार्थना करो तो तुम्हारा दुःख, तकलीफ दूर हो जायेगा. साल भर गए लेकिन कुछ नहीं हुआ. फिर गुरु के द्वारा हमारा आज धर्म परिवर्तन हो गया. पैर धोकर हिन्दू धर्म में वापसी किए.”

ब्रिम्डेगा छत्तीसगढ़ के जशपुर ज़िले में है जो झारखण्ड और ओडिशा से सटा हुआ है. ये एक बड़ी आदिवासी बेल्ट है. इस पूरे क्षेत्र में सालों से लोगों को हिन्दू धर्म में वापस लाने का एक बड़ा अभियान चलाया जा रहा है जिसमें आर्य समाज, बीजेपी, आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और संघ परिवार के कई दूसरे संगठन शामिल हैं.जनगणना के अनुसार १९९१ के बाद से छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा के आदिवासी क्षेत्र में ईसाई आबादी बढ़ी है. इस क्षेत्र में इस अभियान का नेतृत्व बीजेपी के जाने-माने नेता प्रबल प्रताप सिंह जूदेव के हाथ में है जिनके पिता दिलीप सिंह जूदेव ने ये काम १९८५-८६ में शुरू किया था.

१६ फ़रवरी के दिन जब मैं ब्रिम्डेगा पहुंचा तो माहौल उत्साहपूर्ण था. आदिवासी सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन था.मिट्टी के एक बड़े घर में कई धर्मगुरु यज्ञ कर रहे थे और मन्त्र पढ़े जा रहे थे. साथ में बैठे गांव के लोग छोटे समूहों में बारी-बारी से इसमें शामिल हो रहे थे. आखिर में वो २२ लोग शामिल हुए जिनकी ‘घर वापसी’ के लिए इस समारोह का आयोजन किया गया था.प्रबल प्रताप सिंह गंगा जल से एक-एक करके उनके पैर धो रहे थे. “ये अनोखी परंपरा मेरे पिता जी ने शुरू की थी. वो गंगा जल से पैर धोकर जनजाति परिवारों की घर वापसी कराते थे.”शांत तबियत और ऊंचे क़द के जूदेव का कहना है कि वो इस अभियान का नेतृत्व ज़रूर कर रहे हैं लेकिन इसको आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी सभी हिन्दुओं की है.

वे कहते हैं, “ये किसी एक ख़ास पार्टी या संगठन का एजेंडा नहीं होना चाहिए। ये एक वास्तविकता है कि हिन्दू समुदाय एक क्राइसिस से डील कर रहा है, कन्वर्जन हो रहे हैं। भारत एक ही हिन्दू राष्ट्र बचा है, नेपाल को छोड़ कर. सवाल ये उठता है कि अगर हम सक्रिय नहीं होंगे अपनी प्राचीन संस्कृति को बचाने के लिए तो हमारा हिन्दू राष्ट्र बचेगा नहीं, सब कन्वर्ट हो जायेंगे। इसलिए ये सभी हिन्दुओं की ज़िम्मेदारी है.” लेकिन हिन्दू समाज में एक वर्ग ऐसा है जो ख़ुद को असुरक्षित महसूस करता है. ब्रिम्डेगा में तीन घंटे तक चलने वाले इस समारोह में शामिल कई लोगों ने मुझसे कहा कि “घर वापसी’, ‘लव जिहाद’ की तरह हिन्दू जागरण का नतीजा है और हिन्दू राष्ट्र के निर्माण का एक महत्वपूर्ण कार्य.”प्रबल प्रताप सिंह कहते हैं, “जशपुर में बहुत मतां तरण हो रहे हैं. जशपुर मतां तरण का एक गढ़ है. जशपुर एक ट्राइबल एरिया है, पिछड़ा एरिया है. यहाँ ज़्यादा षड्यंत्रकारी शक्तियां काम करती हैं. बाक़ी बॉर्डर पर झारखण्ड है. वहां भी बहुत धर्म परिवर्तन हुए हैं. काफ़ी हिन्दू कन्वर्ट हुए हैं”.ईसाई धर्म को अपनाने वालों और इसके प्रचार करने वालों पर अत्याचार की ख़बरें भी यहीं से सबसे अधिक आ रही हैं. लेकिन ये अकेला ऐसा क्षेत्र नहीं है.

. देश भर के लिए कोई एक मतांतरण विरोधी कानून नहीं है. लेकिन आठ राज्यों ने अपने-अपने कानून बनाए हैं जो जबरन मतांतरण को रोकने के लिए बनाए गए हैं. बीजेपी ने ऐसे एक राष्ट्रीय कानून की ज़रूरत की बात ज़रूर की है.पिछले साल उत्तर प्रदेश ने धर्मांतरण विरोधी कानून पारित किया और मध्य प्रदेश ने अपने १९६८ के कानून में संशोधन किया. कर्नाटक का धर्मांतरण विरोधी विधेयक विधान सभा द्वारा पारित कर दिया गया है लेकिन इसे विधान परिषद द्वारा पारित किया जाना बाकी है.

बनारस शहर के एक मोहल्ले में ईसाई धर्म को मानने वालों की आबादी अच्छी ख़ासी है। .पास्टर अब्राहम और उनकी पत्नी पास्टर प्रतिभा वहां मौजूद मर्द, औरतों और बच्चों के साथ ज़ोर से गाने के अंदाज़ में प्रार्थना करते थे। बाद में उन्होंने बाइबिल का पाठ भी पढ़ा.पास्टर अब्राहम और उनकी पत्नी को देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि वो हाल में ही जेल से रिहा होकर लौटे थे. पिछले साल नवंबर में उन्होंने मऊ में अपने निवास पर एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया था जिसके दौरान, पास्टर प्रतिभा के मुताबिक़, “मसीही विरोधी लोग २०२० के बाद दूसरी बार हमारे यहाँ आये. हमने अपने लोगों से कहा प्रार्थना करते रहो.”
बनारस के ही राजेश कुमार अपने कई मसीही साथियों के साथ एक प्रार्थना सभा में शामिल थे। राजेश एक समय हिन्दू थे लेकिन कई साल पहले वो ईसाई धर्म में शामिल हो गए. उनका कहना है कि उनका जीवन उस समय बदल गया जब १६ साल से बिस्तर पर पड़ी उनकी ब्लड कैंसर से पीड़ित बहन उनके बाइबिल पढ़ने के बाद उठकर चलने लगी. उनका कहना है इस चमत्कार ने उन्हें ईसाई बनाया.मैं कई ईसाइयों से मिला जिन्होंने हाल के वर्षों में चमत्कार से चंगई हासिल करने के दावे के बाद अपना धर्म परिवर्तन कर लिया.

शिवसेना के एक स्थानीय युवा नेता प्रमोद सोनकर के शब्दों में पहले वो ईसाईयों की प्रार्थना सभाओं को भंग किया करते थे और उन्हें मारा-पीटा करते थे लेकिन २०१४में वो ख़ुद ईसाई हो गए.उनका विश्वास है कि जब वो एक अस्पताल के आईसीयू में दो घंटे के लिए मर गए थे तो ईसाई धर्म ने उसे दोबारा जीवन दान दिया.वो कहते हैं, “मेरे दोनों गुर्दों में पत्थर थे. मेरे बचने की उम्मीद नहीं थी. मेरी बहन ने कहा ईसाई प्रार्थना सभा में जाओ और अगर चंगाई न मिले तो वापस हिन्दू धर्म चले जाओ.” प्रमोद कहते हैं उनका ऑपरेशन हुआ तो वो आईसीयू में मुर्दा घोषित कर दिए गए. दो घंटे तक उसी हाल में पड़े रहे लेकिन उनके शिव सेना के साथी और ईसाई दोस्त उनके लिए लगातार प्रार्थना कर रहे थे. आखिर वो खड़े हुए और बिलकुल ठीक हो गए. अब वो एक पास्टर हैं और अपने ईसाई धर्म को ज़ोर-शोर से फैलाते हैं.दुनिया भर में दैवीय हस्तक्षेप से रोगों के उपचार होने के जुड़े दावे किए जाते रहे हैं लेकिन अब तक इसे लेकर कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है.

निर्भय सिंह का कहना है कि ईसाई प्रचारक ऐसे ही ख़तरनाक अंधविश्वास का इस्तेमाल भोले-भाले हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए करते हैं वे कहते हैं, “सीधे-साधे हिन्दुओं को कभी पैसे और नौकरी का लालच देकर और कभी कभी ना ठीक होने वाली बीमारी की चंगाई का झूठा क़िस्सा गढ़कर ये उन्हें ईसाई धर्म में ले जाते हैं” ईसाई मिशनरी इन आरोपों को गलत बताती है।

मंदिरों के शहर में धर्मांतरण

बनारस मंदिरों का शहर है और हिन्दुओं का एक प्राचीन तीर्थ स्थान भी. यहाँ और पूर्वी उत्तरप्रदेश के दूसरे शहरों में भी ईसाई धर्म के प्रचारक काफ़ी सक्रिय हैं.
पिछले दो सालों में इस क्षेत्र के कई ग्रामीण इलाक़ों में ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ा है.अपनी शादी के बाद सालों पहले पास्टर प्रतिभा रांची से मऊ आकर बस गयीं. उनका केवल एक ही उद्देश्य था: अपने धर्म का प्रचार करना.वो कहती हैं, “कोई नहीं जानता था ईसा मसीह का नाम. लेकिन आज मऊ में इतना प्रभु का अनुग्रह हुआ कि आज बहुत सारे लोग मसीह में पाए जाते हैं.”

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा स्थापित हिन्दू युवा वाहिनी भी धर्मांतरण के विरोध में राज्य भर में काम कर रही है.उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में सरकारें बीजेपी की है। लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार कांग्रेस पार्टी की है और वहां राज्य की ईसाई संस्थाएं सरकार के ख़िलाफ़ झूठे आरोपों में ईसाईयों की गिरफ़्तारी का इलज़ाम लगातार लगाती आयी हैं। अरुण पन्नालाल, छत्तीसगढ़ क्रिस्चियन फ़ोरम के अध्यक्ष हैं. वो कहते हैं, “पुलिस झूठे इलज़ाम लगाती है और जेल भेज देती है. सब से अधिक यहीं अत्याचार के केसेज़ हैं हमारी चिंता सरकारी मशीनरी की नाकामी है.” यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम ईसाई समाज और इसके पूजा स्थलों पर हुए हमलों का डेटाबेस रखने के अलावा पीड़ितों के लिए एक हेल्पलाइन चलाता है. बल या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की रोकथाम के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की बीजेपी सरकारों ने धर्मांतरण विरोधी क़ानून लागू किये हैं और कर्नाटक में इस पर एक अधिनियम लाया गया है.इन क़ानूनों के अंतर्गत दोषी को साल की सज़ा मिल सकती है। उत्तर प्रदेश में इस नए क़ानून को पिछले साल सितम्बर में लागू किया था जिसके अंतर्गत अब तक ३५ से अधिक ईसाई प्रचारकों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.

एलायंस डिफेंडिंग फ्रीडम या एडीएफ इंटरनेशनल एक आस्था आधारित क़ानूनी वकालत करने वाला संगठन है. इसकी भारत शाखा के वकील मुनीश कुमार चंद्र के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में मतांतरण से सम्बंधित नए क़ानून के अंतर्गत उनके पास लगभग ४० कैसेज़ हैं.वो कहते हैं, “४० से ४५ ऐसे कैसेज़ हैं जिनमे एफ़आईआर दर्ज हैं, चार्जशीट या तो आनी या मुक़दमा शुरू हो चुका है. कुछ लोग अब भी जेलों में हैं। ” . एडीएफ़ इंडिया का कहना है कि नए क़ानून के तहत पुलिस ईसाई प्रचारकों पर सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन का मुक़दमा दर्ज कर रही है जिसमें ज़मानत मिलना मुश्किल होता है.

नए मतांतरण विरोधी क़ानून को चुनौती

इस नए क़ानून को इलाहबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी है. मध्यप्रदेश में भी पिछले साल इसी तरह का क़ानून पारित किया गया था जिसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया है. इन दोनों मामलों में वकील हैं इलाहाबाद के शाश्वत आनंद.वो कहते हैं, “एक सभ्य देश में ऐसा नहीं हो सकता. ये जो हमारा आर्टिकल २५ है जिसके अंतर्गत धर्म को मानने, इस पर चलने और इसका प्रचार करने का अधिकार शामिल है या आर्टिकल २१ है जिसके तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है। आर्टिकल १९ में बोलने की आज़ादी और आर्टिकल १४ जिसमें अधिकारों की समानता और समान सुरक्षा का प्रावधान है, ये सारे ही अधिकार ख़त्म हो गए इस नए क़ानून के तहत.” धर्मांतरण के क़ानून बनाने का सिलसिला कांग्रेस के दौर में शुरू हुआ था. विशेष रूप से बड़ी जनजातीय आबादी वाले कई राज्यों ने धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ कानून पारित किए थे. साल १९६७ में ओडिशा धार्मिक परिवर्तन के ख़िलाफ़ कानून पारित करने वाला पहला राज्य था. मध्यप्रदेश ने १९६८ में मतांतरण विरोधी क़ानून पारित किया था. अरुणाचल प्रदेश ने १९७८ में इसी तरह का क़ानून बनाया. इसके बाद २००२ में, तमिलनाडु ने जबरन धर्म को बदलने के ख़िलाफ़ क़ानून पास किया था.

मत – परिवर्तन के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने का नया दौर प्रधानमंत्री मोदी के दौर में शुरू हुआ. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश दोनों ने अपने नए क़ानून में ‘विवाह’ शब्द जोड़ा और कहा कि भले ही मत – परिवर्तन शादी के लिए किया गया हो, इसे अधिसूचित किया जाना अनिवार्य है.उत्तराखंड में, कानून ने मतांतरित होने वाले व्यक्ति के माता-पिता और भाई-बहनों को अधिकार दिया है कि यदि उन्हें लगता है कि नियमित प्रक्रिया का पालन किए बिना धर्मांतरण हो रहा है तो वे जिला मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकते हैं.उत्तर प्रदेश में पारित क़ानून में कहा गया है कि जबरन धर्म परिवर्तन एक संगीन और ग़ैर-ज़मानती अपराध है. सज़ा भी पहले की तुलना में बहुत अधिक है.

क़ानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि पुराने दौर वाले मतांतरण को रोकने वाले क़ानून के तहत शायद ही किसी को दोषी ठहराया गया हो या जेल की सज़ा हुई हो. नए क़ानून के तहत कुछ ही मुक़दमे इस समय ट्रायल स्टेज पर आये हैं. शाश्वत आनंद को पूरा विश्वास है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में उत्तर प्रदेश के नए क़ानून पर रोक लगा दी जायेगी। नए क़ानून के अंतर्गत धर्म परिवर्तन करने वालों को ६० दिन पहले प्रशासन को नोटिस देना पड़ता है.लेकिन ईसाई धर्म अपनाने वालों को नोटिस भेजने की ज़रुरत नहीं क्योंकि ईसाई मत के प्रचारकों के मुताबिक़ वो मत – परिवर्तन के बजाय ह्रदय परिवर्तन पर ज़ोर देते हैं ‘ यानी वो दस्तावेज़ पर हिन्दू ही रहते हैं. वो अपना नाम नहीं बदलते. ये अपने समाज से नहीं कटते. लेकिन धीरे-धीरे वो ईसा मसीह के भक्त हो जाते हैं. इस तरह क़ानूनी तौर पर उन्हें मत परिवर्तन की घोषणा करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती.

पास्टर प्रतिभा ने जेल में धर्म प्रचार करना शुरू कर दिया था.नवंबर में जेल में गुज़ारे कुछ दिनों को याद करते हुए वो कहती हैं, “जेल में जाना परमेश्वर का एक उद्देश्य था क्योंकि प्रभु चाहता था कि हम जेल में भी जाकर प्रचार करें ताकि जेल के लोगों का भी उद्धार हो.” दो प्रकार के ईसाई हैं जिन पर हमले हो रहे हैं – एक वे जो रोमन कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट जैसे स्थापित चर्च का हिस्सा हैं. ये लोग मतांतरण में अधिक सक्रिय नहीं हैं. दूसरे वो लोग जो फुल-टाइम उपदेशक हैं और जिनका किसी चर्च से जुड़ा होना ज़रूरी नहीं हैं. वे समाज में जाकर मसीह का संदेश फैलाते हैं. इन्हें इवैंजेलिकल ईसाई भी कहते हैं.

इवैंजेलिकल मसीही कहते हैं कि ईसा मसीह के पैग़ाम को फैलाने से उन्हें दुनिया की कोई शक्ति रोक नहीं सकती. वो धरती पर धर्म प्रचार के लिए ही भेजे गए हैं. मार खाना, जेल जाना या सताया जाना उनके काम में बाधा नहीं डाल सकता। मत – परिवर्तन हमेशा से विवादित मुद्दा रहा है और पेचीदा भी। अब ये एक राजनैतिक मुद्दा भी बन चुका है। भाजपा सरकार आने के बाद इन मिशनरीज को एनजीओ की आड़ में मिलने वाली फंडिंग पर रोक भी लगी है। कुछ राज्यों में मत -परिवर्तन के खिलाफ सख़्त कानून भी बने हैं। बावज़ूद इसके, इस जाल से निकलना हिंदू समाज के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। भारत का हिन्दू अभिमन्यु की तरह असहाय होकर मिशनरीज के चक्रव्यूह में फँसा है, जो इनसे लड़ तो सकता है मगर उसे चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं नज़र आता।

राजेश झा
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